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Saturday, January 27, 2018

Lost a leader : एक नेता खो गया


 एक नेता खो गया

एक आदमी भीड़ में खो गया है

लगता है वह नेता तो नही हो गया है

अरबों की जनसंख्या में आदमी खो जाये तो मिल जाता है

पर नेता को तो सी बी आई का प्रमुख भी नहीं पकड़ पाता है

किसी ने कहा श्रीमान जी आम जनता तो ज्यादा है नेता कुछ है

फिर भी जनता उसके सामने तुछ है

इतना बड़ा आनुपातिक अन्तर

उसके बाद भी नेता मदारी जनता बन्दर

विशिष्ट मि़़त्रों के अनुसार

समाचार सूत्रों के अनुसार

अरबों की जनसंख्या में नेता का खो जाना विशेष है

शून्य काल में बहस के लिए इस मुद्दे के अलावा कुछ न शेष है 


Monday, January 23, 2017

Some muktak : कुछ मुक्तक


1 मेरे दिल का यह सपना है कि सपना टूट न जाए।
किसी थोड़ी सी अनबन से कोई रिश्ता छूट न जाए।
सभी को अपना बनाने की कभी हसरत नहीं मेरी।
मेरी कोशिश है कि कोई अपना अपने से रूठ न जाए।

2 दिल से निकली है दिल के लिए दुआ।
अभी तक तू किसी का क्यों न हुआ।
कब तक रहेगा मौन यूं अकेले तू,
किसी वीणा की तार सा झंकृत क्यों न हुआ।

3 नव कोपल नव दीप जले हैं नव लय के नव छंदों में।
नए राग के नए तराने बजने लगे अब अनुबंधों में।
हृदय हमारा वरण हो गया नव पल्लव की ज्योति में,
सप्तपदी से पहले ही हम बंध गए वचनों के प्रतिबंधों में।

4 नव वर्ष पर तुम्हारा आगत कर रहा हूँ।
मैं दिल का थाल सजा कर नवागत कर रहा हूँ।
तुम प्रीत के आचमन से करलो वरण हमारा।
हृदय की कुटी में तुम्हारा स्वागत कर रहा हूँ।

5 हमारा दिल भी तुम्हारी यादों में बेचैन रहता है।
न सोता है न जगता है तड़फता दिन रैन रहता है।
इस कड़वाहट के दौर में कौन किसकी सुनता है।
फिर भी तुम चले आए सुनने कोई तो मीठे बैन कहता है।

6 श्वेत धरा पर हरीतिमा की एक अनौखी चादर देखी।
तुम पर मर मिटने को आतुर लाखों आंखें आतुर देखी।
हम शर्मिंदा क्यों हैं जिंदा ऐसे ऐसे नायक देखे।
हल का हलईया मरता देखा भाषण देती खद्दर देखी।

7 वह एक रितु मन भावन थी, अब लगते सारे मौसम फीके।
वह मधु की मधुर अंजूरी थी अब लगते सौ सौ घट भी रीते।
सारे जग को अपना कहना भी लगता जब बेईमानी है,
सब कुछ जीत कर हार गए जब लगा की एक हृदय न जीते।

8 न चांद मिला न चांदनी हम तो लुट गए तारों की तलाश में।
एक भी नहीं खोज पाए वो जो निकले थे सारों की तलाश में।
वो खोजते हैं दुश्मनों को हर गली-मौहल्ले-घाटी-बस्ती में।
हम तो हमेशा, हर जगह, हर देश में रहे यारों की तलाश में।

Monday, June 24, 2013

some poems : कविताएँ

 कुछ  कवितायेँ


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Saturday, July 21, 2012

poem aajkal : आजकल



मैं बड़ी उधेड़ बुन में जी रहा हूँ आजकल|
रिश्तों की गलती चादर सी रहा हूँ आजकल|
मर गई संवेदनाऐं या कहीं हैं खो गई|
संभ्रांत लोगों के बीच ढूँढ़ रहा हूँ आजकल|
क्या कहा पागल हूँ मैं सनकी हूँ मैं|
हूँ इसीलिए समझदारों को ढूँढ़ रहा हूँ आजकल|
बहुत धनुर्धारी इस सभा में बैठे हूए हैं|
मगर मैं एकलव्य ढूँढ़ रहा हूँ आजकल|
कौन कहता है मर गया आवाज का जादू|
ठीक सुनने वाला श्रोता ढूँढ़ रहा हूँ आजकल|

प्रदीप प्रसन्न

Saturday, May 12, 2012

How many sades of truth : सत्य तेरे कितने रूप

 सत्य तेरे कितने रूप
  आमिर खान द्वारा निर्मित कार्यक्रम  सत्य मेव जयते प्रथम शो के प्रदर्शन से ही बहु चर्चित हो गया |(कर दिया गया)
तमाम चैनल, अखबार,पत्र-पत्रिकाओं, ट्यूटर, कम्पूटर, फेसबुक आदि पर एक ही खबर, ‘आमिर का सत्य मेव जयते बहु संख्यकों द्वारा सराहा गया’ | सामजिक क्षेत्र में कन्याभ्रूण के कम होते लिंगानुपात पर आधारित कार्यक्रम सत्य मेव जयते बहुत ही ज्यादा हिट हुआ |
मूल प्रश्न है इस कार्यक्रम के हिट होने का ? क्या यह समस्या पहली बार उद्घाटित हुई है ?क्या यह समस्या नई है ? क्या इस समस्या से आज से पूर्व भारतीय समाज व यहाँ के लोग अनभिज्ञ थे ?क्या आम लोगों में इतनी चेतना आ गई है कि वे समाज व महिलाओं के प्रति बहुत सजग व सचेत हो गए हैं ? या इन सब से अलग भी कोई कारण है ? जैसे आमिर खान जैसे प्रतिष्ठित फिल्म अदाकार द्वारा यह कार्यक्रम प्रस्तुत करना ? या आमिर द्वारा साफ़ व संदेशात्मक फिल्मो की छवि के कारण सब के द्वारा  बिना सोचे समझे प्रशंसा करना या एक दूसरे को देखकर भेड़ चाल चलना ?
इससे भी आगे एक प्रश्न यह है की आज से पूर्व भी कन्या भ्रूण के घटते लिंगानुपात पर भारत के अलग अलग क्षेत्रों में भिन्न भिन्न माध्यमों से व भिन्न भिन्न लोगों द्वारा इस समस्या पर वास्तविक रूप से कार्य किया जा चुका है व समाज तथा सरकार के समक्ष रखा जा चुका है | परन्तु इस कार्यक्रम से पूर्व तो सरकार भी व आम लोग भी कुंभकर्ण की नींद ही ले रहे थे |
दूसरी बात माना यह कार्यक्रम बहुत अच्छा है |आमिर खान द्वारा समाज की एक बड़ी व ज्वलंत समस्या को उद्घाटित किया गया है, तो अब इस समस्या पर सकारात्मक रूप से कार्य कितने लोग करेगें ? क्या वे सब लोग जिन्होंने इस कार्यक्रम को देखा व प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इस कार्यक्रम को सराहा ,वे सभी सिर्फ स्वयं और स्वयं के परिवार में आज के बाद भ्रूण का लिंग परीक्षण व कन्या भ्रूण का गर्भ पात नहीं करवायेंगें ? कार्यकर्म व दर्शक श्रोताओं की असली प्रशंसा का परिणाम तो तभी सार्थक होगा जब ऐसा वास्तविक रूप से हो |
परन्तु होगा नहीं |वजह हमारी मानसिकता में इस तरह की तमाम बातें ऐसे घर कर गई है कि जब भी अपने उपर बात आती है तो हम,  बगलें झाँकने लगते हैं | सारे आदर्श ,नियम, कानून व संविधान –ताक  में रखे रह जाते हैं |
 यंहा सिर्फ आलोचना करने के निमित नहीं कहा जा रह है बल्कि यह भारतीय लोगों की मानसिकता का व दृश्य है जिसे हम गत कई सदियों से देखते आ रहें हैं और ज्यों ज्यों ज्यादा शिक्षित, विकसित, आधुनिक हुयें हैं –त्यों त्यों उस विक्षिप्त मानसिकता का अनुपात बढ़ा ही है घटा नहीं | क्योंकि सत्य मेव जयते सही है सिर्फ और सिर्फ पुस्तकों में |

प्रदीप प्रसन्न
  

Friday, January 20, 2012

poem : बात

यूँ ही नहीं बनता  हैं 
किसी बात का बतंगड़.
उसके लिए भी बहुत  सारे  
पापड़ बेलने पड़ते हैं .
मात्र दिखावा भी कह 
सकते हैं कुछ 
किताबी लोग  
किसी  भी प्रकार की गतिविधि को, 
क्योंकि 
 उनके पास नहीं होता है
 करने  को वह कार्य
 जो कर रहा है दूसरा. 
इसीलिए ऐसे लोग  ना
बात बना पाते हैं,
और  
ना बात का बतंगड़
और उनका सबसे बड़ा
पछतावा इसी बात का
होता है. 
वरना सब मिलके
 कुछ ना कुछ करें तो 
क्या संभव नहीं हैं -
भ्रष्ट का भ 
राजनीति का र 
टटपुन्जीयो का ट
चम्मचो का च 
रहिसों का र 
तोड़ के 
सब सामान्य कर दें 
मगर नहीं 
कुछ लोगो को राजनीति करने
में बहुत मजा आता है.

प्रदीप प्रसन्न 

poem : rachna : रचना

अब तो हर मौसम अपने रंग बदलने लगा है , 
नए नए तेवर के साथ सूरज भी ढलने लगा है |
कैसे कह दें की अब नहीं आती हमको उनकी याद
हमारे संग संग उनका साया भी चलने लगा है |
बहुत हो चुका तमाशा अब उठाओ मजमा अपना 
नई पीडी का खून अब रगों में मचलने लगा है |
बात थी व्यवस्था के बदलने की मगर अब तो  
व्यवस्था का मुखोटा ही खुद बदलने लगा है |
पूछा उसने मेल पर क्या हाल हैं गाँव के अब 
नई रौशनी में पुराना बरगद अब हिलने लगा है |

प्रदीप प्रसन्न

poem : कविता


 कविता
 सर्दी मे तपने के लिये
 एक अलाव है .
जो अपने भावो की 
 गर्माहट से
 सर्दी भगाती  नहीं,
सिर्फ
 गर्माहट का
 एहसास दिलाती है 
और 
 यह एहसास भी
 सिर्फ
 मनुष्य को होता है .
मनुष्य की खोल मे
 रह  रहे
 भेड़िये को नहीं  .

प्रदीप प्रसन्न 
 
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