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Friday, January 10, 2020

मजा ही नहीं सजा भी देता है नाटक


मजा ही नहीं सजा भी देता है नाटक
-डॉ. प्रदीप कुमार
द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ नाटक दिनेश भारती द्वारा लिखा गया है। यह नाटक हास्य-व्यंग्य शैली का नाटक है। लेकिन इसमें हास्य अधिक प्रभावी है। नाटक की कथा बहुत विशेष है और लेखक ने इसे पूरे नाट्कीय रूप में लिखकर इसे और अधिक प्रभावी तथा विशेष बना दिया है। कथा कुछ इस प्रकार है। एक राजा मास्टर नाम का टेलर है और एक उसका शागिर्द है। जिसका नाम दिलेनादां होता है। उन्हें लगता है कि टेलरिंग के काम में अब बरकत नहीं रह गई है। अधिक पैसा और नाम कमाने के लिए अब कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे आसानी के साथ सब चीजें मिल जाएं। राजा मास्टर और दिलेनादां दोनों ही विचार करते हैं कि ड्रामा कंपनी खोली जाए और एक स्क्रिप्ट लिखकर अपने इर्द-गिर्द के लोगों से उनमें काम करवाकर सफलता, शोहरत और पैसा हासिल किया जाए। राजा मास्टर और उसका चेला दिलेनादां मिलकर एक कंपनी खोलते हैं। जिसका नाम होता है-‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’। अपनी कंपनी के लिए दिलेनादां अपना पहला नाटक लिखते हैं-‘शहजादा सलीम उर्फ डाकू सुलेमान’। टेलरिंग कंपनी छोडकर ड्रामा कंपनी खोलने एवं पहला नाटक करने तथा इसके प्रचार के लिए राजा मास्टर अखबार वालों को बुलाकर उन्हें अपना इंटरव्यू देते हैं। अखबार के इंटरव्यू में नाटक के बारे में, अपने तजुर्बे के बारे में एवं नाटक के पहले शो के बारे में राजा मास्टर सब बयां करता है।
अपने आस काम करने वाले लोगों को वे नाटक में रोल देते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि सबको एक ही नाटक करने के बाद मुंबई का रास्ता दिखाई देता है या फिर पहली बार में, पहले ही नाटक में बड़ा रोल करके अपनी प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, पहचान बनाने की चाह होती है। आमतौर पर जैसा कि नाटक वाले करते हैं, वह सब राजा मास्टर के नाटक के कलाकार करते हैं। यथा-शराब पीना, लड़कियों से इश्क करना या एक दो नाटक करके मुंबई की ओर फिल्मों में जाने की इच्छा जाहिर करना। ये सब चीजें नाटक में बयां होती हैं। एन शो वाले दिन उन्हें पता चलता है कि उनका एक कलाकार लोटा मुरादाबादी जो डाकू खूंखार सिंह का रोल कर रहा था, नाटक की मुख्य नायिका गुलाब बाई जो अनारकली का रोल कर रही थी, उसे लेकर भाग गया। दूसरा कलाकार गाजर गाजीपुरी जो कि सलीम और डाकू सुलेमान का रोल कर रहा है, वह एन शो वाले दिन तक अपने डॉयलोग याद नहीं कर पाता है। उसके बाद आता है खदेरवा, जो कि नाटक में अकबर का रोल कर रहा है। लेकिन खदेरवा शराब बहुत पीता है और अमिताभ बच्चन की नकल करता है। वह शर्त रखता है कि बिना पिए स्टेज पर नहीं जाएगा और हाथ में तलवार नहीं बल्कि बोतल लेकर जाएगा। शराब अधिक पीने के कारण वह शो के लिए मंच पर आता ही नहीं है। अब राजा मास्टर के सामने समस्या यह खडी होती है कि अकबर किसे बनाएं। राजा मास्टर दिलेनादां को कहते हैं तुम बन जाओ अकबर। दिलेनादां अकबर बन जाता है। दिलेनादां राजा मास्टर को एक समस्या के बारे में और बताता है। वह कहता है नाटक का उद्घाटन करने वाले नेता नौरंगी लाल नहीं आ सकते, वे कब्रिस्तान का उद्घाटन करने गए है। अब क्या होगा? राजा मास्टर कहते हैं अपने पर्दे खिंचने वाले मंहगवा को नेता बनाकर उद्घाटन करवाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि बाकी सब तो हो गया लेकिन अनारकली कहां से लाएं? तब राजा मास्टर दिलेनादां को कहता है कि नुक्कड पर पान बेचने वाली चंपाकली को ले आ थोडी देर के लिए। अनारकली का रोल उसी से करवा लेते हैं। दिलेनादां चंपाकली को ले आता है। राजा मास्टर अनारकली को चंपाकली का रोल करने के लिए तैयार कर लेते हैं। लेकिन इतनी ही देर में चंपाकली की अम्मा उसके पीछे-पीछे आ जाती है और वह दिलेनादां और सलीम बने हुए गाजर गाजीपुर को पीट कर चली जाती है और अपनी बेटी चंपाकली को भी साथ ले जाती है। राजा मास्टर के सामने फिर मुसीबत आ जाती है, तो राजा मास्टर दिलेनादां से कहते हैं कि तुम अकबर का रोल करके और गाजर गाजीपुरी सलीम का रोल करके किसी तरह से नाटक को खत्म करो। दिलेनादां स्टेज पर जाते हैं लेकिन स्टेज पर जाकर वे गिर जाते हैं। गलतफहमी में दिलेनादां सलीम के डॉयलोग बोलते हैं और गाजीपुरी अकबर के। जबकी गाजीपुरी का मेकअप जवान का है और दिलेनादां का बूढे का। खूब हास्यास्पद स्थिति होती है। राजा मास्टर खूब माथा पीटते हैं और अंत में राजा मास्टर दोनों को गोली मार कर जैसे तैसे नाटक खत्म करते हैं।


यह सहज सी कहानी है नाटक ‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ की। लेकिन इस सामान्य सी कहानी को नाटक के लेखक दिनेश भारती ने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बयां किया है। यह तो हुआ नाटक का कथासार। अब नाट्य प्रस्तुति की समीक्षा लिखने से पहले नाटक के पूर्वाभ्यास की समीक्षा लिखनी जरूरी है जो कि निश्चित रुप से इस नाट्य प्रस्तुति का एक अभिन्न अंग है। नाटक का पूर्वाभ्यास प्रारंभ किया गया 22 अक्टूबर 2019 से। लेकिन दीपावली की वजह से 25 से 29 तक पूर्वाभ्यास नहीं हो सका। एक तरह से पूर्वाभ्यास प्रारंभ हुआ 1 नवंबर 2019 से। इस नाटक में कुल 11 पात्र हैं। 22 अक्टूबर से 24 अक्टूबर तक सभी कलाकार मौजूद थे। लेकिन दीपावली के बाद एक एक कलाकार गायब होता रहा। उस गायब होने के क्रम में नाटक के निर्देशक देशराज मीणा और स्टेज मैनेजर हितेश जैमन लगातार दूसरे कलाकारों को तलाश करते रहे और उन्हें रोल देते गए। लेकिन दिपावली के बाद एक भी रिहर्सल ऐसी नहीं हुई जिसमें सभी कलाकार मौजूद हों। यहां तक की नाटक में प्रमुख चार कलाकार हैं-राजा मास्टर, दिलेनादां, गाजीपुरी और खदेरवा, ये भी चारों एक साथ एक भी दिन मौजूद नहीं रहे। देशराज मीणा ने मुझे 20 अक्टूबर को ही कह दिया था कि अबकी बार आप बैक स्टेज रहिए और इस नाटक में प्रकाश व्यवस्था संभालिए। मैंने कहा ठीक है। क्योंकि प्रतिदिन किशनगढ से अलवर जाकर पूर्वाभ्यास करना संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए प्रकाश व्यवस्था संभालनी ही ठीक रहेगी। प्रकाश व्यवस्था के लिए नाटक के शो के एक या दो दिन पहले जाकर रिहर्सल देख लूंगा या उसी दिन स्टेज पर जो फाइनल रिहर्सल होगी उसे जाकर देख लूंगा। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तरह से मैं निश्चिन्त हो गया कि मुझे नाटक के शो के एक या दो दिन पूर्व जाना है बस। 

इसी मध्य राजा मास्टर का रोल कर रहे संदीप शर्मा अलवर छोडकर धोलपुर काम करने चले गए। अब वो रविवार को या छुट्टी के दिन ही रिहर्सल करते थे। इस नाटक के स्टेज मैनेजर एवं नाटक में दिलेनादां की भूमिका निभाने वाले हितेश जैमन का भी तबादला अलवर से हनुमानगढ़ हो गया। कुछ अन्य कलाकारा भी चले गए। अब समस्या यह आ गई कि दोनों ही मुख्य भूमिका निभाने वाले व्यक्ति अलवर से बाहर चले गए एवं अन्य कलाकार भी रिहर्सल पर नहीं आ रहे। कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से नाटक में काम करने से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में राजा मास्टर का रोल करने की नाटक के निर्देशक देशराज मीणा ने ठानी। संदीप शर्मा को गाजर गाजीपुरी का रोल दिया गया। इसी बीच चंपाकली की भूमिका करने वाली कलाकार का पैर फ्रैक्चर हो गया। चंपाकली की अम्मा की तलाश तो निर्देशक को पहले ही थी, अब चंपाकली भी ढूंढनी पडेगी। यानी एक के बाद एक मुसिबत नाटक की रिहर्सल के दौरान आती गईं। खदेरवा के रोल के लिए कैलाश वर्मा को फाइनल किया। मंहगवा के रोल के लिए नवीन शर्मा को फाइनल किया। लेकिन नवीन शर्मा रविवार को नहीं आ सकते थे। संदीप शर्मा रविवार को ही आ सकता थे। पत्रकारों की भूमिका निभाने वाले कलाकार वंशक और रजत रिहर्सल पर शाम 6.30 बजे बाद ही आते थे। कहने का तात्पर्य समस्याएं ही समस्याएं आ रही थी। लेकिन इस बीच हितेश जैमन ने दो चार दिन हनुमानगढ जाकर 1 दिसंबर 2019 तक छुट्टी ले ली। इस नाटक के दो शो फाइनल हो चुके थे। पहला 29 नवंबर को अलवर में एवं दूसरा 1 दिसंबर को फरिदाबाद में। इसी बीच चंपाकली और उसकी अम्मा का रोल करने वाली अभिनेत्रियां भी तलाश करली गईं। अब तारीख हो चुकी थी 23 नंवबर। मैं सोच रहा था मुझे कुछ खेती का काम है उसे दो चार दिन में खत्म करके, यदि समय मिला तो 28 को एक बार प्रकाश व्यवस्था के लिए रिहर्सल देखने जाऊंगा और यदि समय नहीं मिला तो 29 को ही जाऊंगा। 20 नंवबर के बाद मेरे पास देशराज का फोन भी नहीं आया था।
अचानक से 25 तारीख को रात 8 बजे मेरे पास देशराज मीणा का फोन आया। मैं उस समय खाना खा रहा था। इसलिए सोचा बाद में बात कर लूंगा। अक्सर देशराज मेरे पास एक ही बार फोन करते हैं, यदि मैं नहीं उठाता हूं तो वो फिर दो चार घंटे का गैप देकर बाद में करते हैं। लेकिन देशराज ने फिर फोन किया। मैंने खाने के मध्य में ही फोन उठाया, मैंने सोचा कुछ जरूरी है तभी देशराज ने लगातार फोन किया है। देशराज ने मुझसे कहा-‘प्रदीप जी नाटक में रोल कर लोगे?’ मैंने सोचा शायद कोई कम संवाद का रोल होगा, कोई कलाकार अब चला गया होगा। फिर भी मैंने मना कर दिया। क्योंकि खेती के काम की वजह से मेरे पास समय नहीं था। देशराज जी ने कहा-‘फिर या तो सब कैंनसिल करना होगा या.......?’ मैंने कहा क्यों ऐसा क्यों? तब उन्होंने मुझे बताया कि उनके पैर का फैक्चर हो गया है इसलिए। मैंने कहा अरे कैसे, कब, कहां? उन्होंने कहा वो सब तो बाद में बताऊंगा पहले यह बताओ रोल कर लोगे या नहीं? मैंने कहा यार खेती के काम में व्यस्त हूं। उधर कॉलेज भी है। इसलिए थोडा मुश्किल है लेकिन बताओ कौनसा रोल है। मैं कोशिश करता हूं। मैंने सोचा कोई कम संवाद वाला रोल होगा। लेकिन उन्होंने कहा राजा मास्टर का रोल है। मुख्य किरदार है नाटक का। मैंने पांच सेकिंड सोचा और कहा ठीक है, शो होगा आप नाटक की स्क्रिप्ट भेजो। मैंने पहले कई बार सुना था ‘शो मस्ट गो ऑन’ लेकिन उसे चरितार्थ नहीं किया था। उस समय मेरे मन में यह विचार आया कि यही है ‘शो मस्ट गो ऑन’। देशराज जी ने 9 बजे मुझे स्क्रिप्ट भेजी और कहा आप गाजर गाजीपुर का रोल याद करलो। राजा मास्टर का संदीप शर्मा कर लेगा, क्योंकि उसने रिहर्सल के प्रारंभ में राजा मास्टर की प्रोक्सी की थी और वह रोल भी किया था। इसलिए संदीप को राजा मास्टर के अधिकतर संवाद याद हैं और आप गाजीपुरी का कीजिए।’ मुझे खुद को नहीं पता था कि मैं आगे के 2 दिन कैसे एडजस्ट कर लूंगा। मैंने कहा ठीक है और मन में सोचा अच्छा है, गाजीपुर के कम संवाद होंगे उसे आसानी से एक दिन में याद किया जा सकता है। लेकिन स्क्रिप्ट पढने के बाद पता चला गाजीपुरी के भी संवाद काफी हैं। खैर मैं 26 तारीख को रिहर्सल पर गया। उस दिन भी सभी कलाकार नहीं थे। संदीप ही नहीं थे। संदीप 28 को आयेंगे ऐसा मुझे बताया गया। मेरे संवाद अधिकतर संदीप के साथ थे। इसलिए मैं 27 को रिहर्सल पर नहीं गया। 28 को भी सारे कलाकार एक साथ मौजूद नहीं थे लेकिन टुकडो में हमने रिहर्सल की।

इससे पहले मैं दो बार देशराज मीणा को कह चुका था मुझे नाटक की स्क्रिप्ट भेज दो, ताकि प्रकाश व्यवस्था के अनुसार नाटक को पढ सकूं और समझ सकूं। लेकिन वो किसी कारण से स्क्रिप्ट नहीं भेज पाए।
खैर 29 तराीख को शो वाले दिन स्टेज पर एक पूरी रिहर्सल की, जिसमें सभी कलाकार मौजूद थे। यह पहली रिहर्सल थी जब सभी कलाकार पूरी रिहर्सल में मौजूद थे। मैं थोडा असमंजस में था। क्योंकि मैं जो किरदार कर रहा था गाजर गाजीपुरी का, वह मैंने अपने तरीके से तैयार किया था। निर्देशक का अपना दृष्टिकोण क्या है, उस किरदार को लेकर यह मुझे बताया नहीं गया था। क्योंकि इतना समय ही नहीं था। लेकिन मेरे अलावा बाकी सारे कलाकार ऐसे थे जो रिहर्सल पर कम से कम 15 बार आ चुके थे और टुकड़ों में ही सही पर कभी कभी रिहर्सल भी कर चुके थे। उन्हें किस तरह से अपना किरदार अभिनीत करना है यह देशराज ने उन्हें समझा दिया था।
अब बात करते हैं नाटक की प्रस्तुति की। राजा मास्टर का किरदार अभिनीत किया संदीप शर्मा ने। संदीप शर्मा अलवर के मंजे हुए अभिनेता के रुप में जाने जाते हैं और पिछले कुछ वर्षों से लगातार आप नाटकों में मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। निसंदेह आपके अभिनय की ताकत निर्देशकों को आपकी ओर खींच लाती है और आपको मुख्य भूमिका करने के लिए मजबूर करती है। क्योंकि निर्देशक भी कई बार ऐसा सोचता है कि वह ऐसे कलाकार से अपना मुख्य किरदार अभिनीत करवाए जिससे वह नाटक को बेहतर प्रस्तुत कर सके। लेकिन ‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ नाटक में संदीप शर्मा को मुख्य भूमिका सहज नहीं मिली बल्कि करनी पड गई। फिर भी दो तीन दिन में संदीप शर्मा ने राजा मास्टर के किरदार को तैयार किया। यह उनकी काबिले तारीफ है। लेकिन मंच पर अभिनीत किए गए राजा मास्टर के साथ संदीप शर्मा पूर्णतः न्याय नहीं कर पाए। अनेक जगह पर संदीप शर्मा न की संवाद भूले बल्कि राजा मास्टर के किरदार में भी वे नहीं दिखाई दिए। अनेक जगह पर संवादों में जिस तरह का उतार चढ़ाव चाहिए था, वह टूटता नजर आया।
एक दो जगह कुछ संवाद या दृश्य उन्होंने छोड भी दिए। इन कारणों की वजह से दूसरे अभिनेताओं को भी दिक्कत हुई। क्योंकि राजा मास्टर के किरदार के लिए शारीरिक रूप से जिस तरह का अभिनेता चाहिए, उसमें संदीप शर्मा बहुत फिट नहीं होते हैं। लेकिन फिर भी बहुत अधिक असुविधा नाटक को प्रस्तुत करने में नहीं हुई। उसके पीछे दो कारण थे। पहला, यह नाटक इस तरह से लिखा गया है कि इसमें मंच पर भी स्क्रिप्ट देखी जा सकती है (हालांकि देखी नहीं गई) और कुछ तब्दीली भी की जा सकती है। दूसरा संदीप शर्मा का नाट्य अनुभव काम आया। संदीप शर्मा के अभिनय में जो परिपक्वता दिखाई देती है, उसकी झलक राजा मास्टरों के किरदार में भी दिखाई दी। संदीप शर्मा राजा मास्टर को किसी हद तक निकालने में सक्षम भी हुए तो सिर्फ उनके अनुभव और परिपक्वता के आधार पर। अन्यथा नाटक के पूर्वाभ्यास की कमजोरी नाट्य प्रस्तुति में साफ दिखाई दे रही थी।
दिलेनादां का किरदार अभिनीत किया हितेश कुमार जैमन ने। हितेश जैमन अलवर के एक कर्मठ, निष्ठावान और परिश्रमी कलाकार के रूप में उभर रहे हैं। वे लगातार अपने किरदारों के साथ न्याय कर रहे हैं। इसके पीछे कारण है रंगमंच के प्रति उनकी मेहनत, लगन और निर्देशक के द्वारा बताए गए किरदार के अनुसार बेहतर कार्य करना और होम वर्क करना। दरअसल इस नाटक में मुख्य किरदार राजा मास्टर न होकर दिलेनादां ही है। क्योंकि राजा मास्टर को नाटक में सिर्फ आदेश वाली भूमिका में रहना होता है। जबकि दिलेनादां को अन्य कार्य भी करने पडते हैं। साथ ही दिलेनादां को नाटक में दिलेनादां के अलावा अकबर की भूमिका भी अभिनीत करनी पडती है। नाटक के बाहर हितेश जैमन इस नाटक के स्टेज मैनेजर और थे। इसलिए नाटक के अंदर एवं बाहर हितेश जैमन दोहरी भूमिका में थे। क्योंकि स्टेज मैनेजर के रूप हितेश जैमन ने नाटक के प्रारंभ से अंत तक अनेक तरह की मुश्किलों का सामना और समाधान किया। नाटक की रिहर्सल के समय जितनी चिंता देशराज मीणा को नहीं थे, उससे अधिक हितेश जैमन को थी। इन सब जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने अपनी भूमिका नाटक के बाहर एवं नाटक के अंदर दिलेनादां के किरदार के रूप में बखूबी निभाई।
हितेश न तो नाटक में संवाद भूले और न नाटक को कहीं बाधित किया। इसके पीछे कारण यह था कि नाटक की रिहर्सल से मंचन तक यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन उपस्थित था तो वो हितेश जैमन था। इस कारण उन्हें अपने संवाद एवं ब्लोकिंग अच्छी तरह से याद थे । साथ ही अन्य कलाकारों के संवाद और पूरे नाटक की संरचना भी उन्हें याद थी। हितेश जैमन अलवर रंगमंच में अब एक ऐसा नाम बन गया है जो एक बेहतर व्यक्ति के साथ साथ एक संजीता अभिनेता के रूप में भी पहचाना जाता है। हितेश जैमन अपने काम के प्रति काफी ईमानदारी रखते हैं। उनकी मेहनत, ईमानदारी और समय के प्रति सचेत दृष्टि तथा समय की पाबंदी के कारण उनका कलाकार भी धीरे-धीरे निखरता जा रहा है। उनमें अभिनय के प्रति एवं कला के प्रति अलग रंग चढ़ा हुआ दिखाई देता है। सबसे बड़ी बात उनमें हमेशा सीखने की ललक रहती है। शांत स्वभाव से अपने काम के प्रति समर्पित यह जोशिला अभिनेता निश्चित रुप से अलवर का एक बड़ा सितारा बनेगा, ऐसी आशा और उम्मीद दोनों है।
पत्रकारों के रूप में तीन कलाकार थे। पत्रकार एक वंशक शर्मा, पत्रकार दो रजत शर्मा और पत्रकार तीन राहुल शर्मा। ये तीनों ही कलाकार अभी रंगमंच की दुनिया में नए अभिनेता हैं। इनमें उत्साह तो है लेकिन धैर्य की कमी है। विशेष रूप से रजत एवं वंशक में। अभी काम के प्रति एक जल्दबाजी दिखाई देती है। अपने संवाद अदा करने की बजाय उन्हें खत्म करना चाहते हैं और सिर्फ संवाद बोलने को ही अभिनय समझ रहे हैं। लेकिन अभी नए कलाकार हैं। धीरे धीरे सीखेंगे और बेहतर करेंगे, ऐसी आशा है।
ग्राहक की भूमिका निभाई ऋतिक चेलानी ने। ऋतिक चेलानी भी एक युवा कलाकार है। उसमें भी एक युवा और नए कलाकार में जो जल्दबाजी दिखाई देती है, वह दिखाई दी। ग्राहक के और पत्रकारों के कम संवादों के किरदारों में भी संभावना बहुत है। लेकिन ये युवा कलाकार उनके साथ अपना सामंजस्य ठीक से नहीं बैठा पाए। लेकिन इन चारों में रंगमंच के प्रति उत्साह है और सीखना चाहते हैं, यह अच्छी बात है। इन चारों में संभावना बहुत है। दरअसल रंगमंच बहुत धैर्य की मांग करता है। उसका इन चारों में अभी अभाव दिखाई देता है। लेकिन परिश्रम के साथ यदि लगातार ये रंगमंच से जुड़े रहे तो धीरे-धीरे 4-5 नाटकों के बाद उनके काम में निखार आने लगेगा। फिर इन्हें स्वयं भी महसूस होने लगेगा।
खदेरवा की भूमिका निभाई कैलाश वर्मा ने। कैलाश वर्मा बहुत अच्छे नर्तक हैं। समय-समय पर नाटकों में भी काम करते रहे हैं। कैलाश वर्मा द्वारा अभिनीत किया गया खदेरवा का किरदार काफी तक सफल रहा। कैलाश वर्मा को इस किरदार में अमिताभ बच्चन की नकल करनी थी। अमिताभ बच्चन की नकल करने में भी काफी हद तक कैलास वर्मा उसके आसपास नजर आए। लेकिन इस नाटक की स्क्रिप्ट के अनुसार खदेरवा का किरदार जिस तरह का होना चाहिए, वह कैलाश वर्मा अभिनीत नहीं कर पाए। कैलाश के साथ एक दिक्कत यह है कि वह एक नर्तक कलाकार है। अर्थात उसका अपना एक निश्चित दायरा है। उससे अधिक या उससे बाहर वह अभी जाता हुआ नहीं दिखाई देता। जिस दिन वे उस छवि से बाहर निकलेंगे उनके अभिनय में अलग प्रकार की चमक दिखाई देने लग जायेगी। किसी भी किरदार को अभिनीत करना उनके लिए फिर कठिन नहीं होगा। जैसे कि वे अपनी तरफ से कुछ नहीं करते हैं या करने में असमंजस की स्थिति महसूस करते हैं। निर्देशक ने जितना बताया है उतना ही कर पाते हैं। जबकि एक करैक्टर को विकसित करने के लिए कलाकार को अपनी तरफ से बहुत कुछ जोडना पडता है। प्रस्तुति में नहीं, रिहर्सल के दौरान ही। कैलाश वर्मा के व्यक्तित्व में एक मौलिक सहजता है। जो उनके किरदार पर भी हावी हो जाती है। इससे कैलाश को बाहर निकलना होगा। कैलाश वर्मा मंच पर पिछले 20 वर्षों से हैं। इसलिए मंच का डर उनमें नहीं है और मंच की समझ भी है। लेकिन नाटक के दृष्टिकोण से अभी वो मंच का बेहतर स्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
महंगवा का अभिनय किया वरिष्ठ रंगकर्मी नवीन शर्मा ने। महंगवा नाटक में पर्दा खींचने वाला होता है और नेता के नहीं आने पर राजा मास्टर महंगवा से उद्घाटन करवाता है, पर्दा खिंचवाता है। नाटक में महंगवा का एक भी संवाद नहीं है। सामान्यतः बिना संवाद के कोई भी व्यक्ति किसी नाटक में काम करने के लिए सहज रुप से तैयार नहीं हो पाता है। वह भी वरिष्ठ तो बिल्कुल नहीं। क्योंकि सबको बडा रोल चाहिए और बडा रोल अक्सर लोग उसे मानते हैं जिसके नाटक में सबसे अधिक संवाद होते हैं। जबकि संवादों से किसी भी रोल की लंबाई चौडाई नहीं मापी जा सकती। हां यह बात अलग है कि नाटक में जिस पात्र के संवाद अधिक होते हैं, उसे अधिक बोलना पडता है और जो कलाकार उस किरदार के संवाद उतनी देर तक बोल सके और उस किरदार में रह सके, वह रोल या कलाकार बडा होता है। इसलिए अधिक संवाद बोलने से वह रोल बडा नहीं हुआ बल्कि उस कलाकार के बेहतर निभाने से रोल बडा या छोटा बनता है। जब तक कलाकार मंच पर रहे, तब तक वह स्वयं न लगे। अपनी शारीरिक भंगिमा से, संवादों से, अपने साथी कलाकार से संवाद करते समय या अन्य प्रकार की अभिनयात्मक गतिविधि करते समय, वह किरदार लगे जो नाटक में अभिनीत कर रहा है। मान लीजिए रमेश नामक कलाकार किसी नाटक में एक शराबी का किरदार निभा रहा है। तो जितनी देर तक रमेश मंच पर रहे तो ऐसा लगे जैसे मंच पर रमेश नहीं एक शराबी है। यदि पूरे नाटक में रमेश की जगह शराबी नजर आता है, इसका मतलब रमेश का रोल बडा था। शराबी का रोल बडा नहीं था, बल्कि रमेश के अभिनय ने शराबी के रोल को बडा कर दिया। लेकिन नवीन कुमार शर्मा ने महंगवा का रोल किया और अपने अभिनय के द्वारा उन्होंने दर्शकों को खूब हंसाया और अपने किरदार के साथ काफी न्याय किया। हालांकि महंगवा के दृश्य का घटनाक्रम और स्थितियां कुछ इस तरह की हैं कि नवीन के अलावा कोई भी कलाकार होता तो निश्चित रूप से दर्शक खूब हंसते और उसका आनंद लेते। लेकिन जितनी सिद्दत के साथ नवीन शर्मा ने महंगवा को नाटक में जीवंत किया, उतना कोई नहीं कर पाता या नवीन शर्मा जैसा नहीं कर पाता। दर्शकों ने नवीन शर्मा के इस परिश्रम का पुरुस्कार भी भरपूर दिया।
चंपाकली का और उसकी अम्मा का किरदार निभाया मनीषा नावरिया और डिम्पल शर्मा ने। अलवर में ही नहीं बल्कि हर जगह पर नाटक के लिए महिला कलाकार मिलना बडी चुनौति है। ऐसी ही स्थिति रही इस नाटक के साथ। चंपाकली और उसकी अम्मा के किरदार के लिए दोहरी चुनौति थी। एक तो महिला कलाकार मिलना, दूसरा इन संवादों का लहजा भोजपुरी है। अतः भोजपुरी में बोलना। हालांकि संवाद बहुत बड़े नहीं थे, किन्तु भोजपुरी का लहजा और साथ में अभिनय दोनों ही बडी बात थी। उस पर भी नए कलाकारों के लिए निश्चित रुप से यह थोड़ा कठिन था।
लेकिन मनीषा और डिम्पल ने इसे अपनी तरफ से काफी बेहतर करने की कोशिश की और दोनों ही कलाकार इसमें किसी हद तक सफल भी रही। दोनों ही नवोदित कलाकार होने के बावजूद खडी बोली की बजाय भोजपुरी के संवादों को अपने अभिनय के साथ में प्रभावी रूप से प्रस्तुत कर पाईं। डिंपल शर्मा के साथ में कुछ पारिवारिक परेशानी थी, बावजूद इसके उन्होंने अम्मा का किरदार अच्छा किया। उनकी कोशिश निसंदेह एक सराहनीय कोशिश है।
इस नाटक में मंच पर कुल 11 कलाकार काम करते हैं। इनमें से 6 कलाकार ऐसे रहे जो नवोदित कहे जा सकते हैं। या जिनका यह दूसरा नाटक है। अतः इन कलाकारों में रंगमंच के अनुशासन की अपेक्षा उम्र का प्रभाव, उसके अनुसार कार्य और फोन से लगाव अधिक दिखाई दे रहा था। जिसका प्रभाव इनके किरदार और अभिनय पर भी पडा। जो कि इन्हें अभी महसूस नहीं हो रहा है। लेकिन अभी नए हैं, धीरे धीरे जानेंगे और सीखेंगे।
गाजर गाजीपुर का रोल अभिनीत किया प्रदीप प्रसन्न ने यानी मैंने। स्वयं की समीक्षा लिखना वास्तव में बडे न्याय के सिंहासन पर बैठना है और उसके लिए अधिक परिपक्वता चाहिए। मुझे लगता है वह अभी मुझमें नहीं है। दूसरी बात मुझे यह भी लगता है कि स्वयं की समीक्षा लिखना पता नहीं उचित या अनुचित? क्योंकि प्रशंसात्मक लिख दी जाएं तो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना है और सब कुछ नकारात्मक लिख दिया जाए तो यह समीक्षात्मक नीर-झीर विवेक नहीं हुआ। खैर, नाटक को अभिनीत करते हुए जो मुझे महसूस हुआ एवं दर्शकों की जैसी प्रतिक्रिया मिली (प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप से) उसके आधार पर मैं प्रदीप प्रसन्न के द्वारा अभिनीत किए गए गाजर गाजीपुरी के किरदार की समीक्षा करने की कोशिश कर रहा हूं।
दो-तीन जगह पर संवाद भूले। इससे नाटक में स्थिलता और रिक्तता दोनों दिखाई दी। नाटककार ने गाजर गाजीपुरी के संवादों को दिलीप कुमार की स्टाइल में बोलने का संकेत दिया है। लेकिन गाजर गाजीपुरी के किरदार में प्रदीप प्रसन्न, दिलीप कुमार नहीं प्रदीप प्रसन्न ही नजर आए। प्रदीप प्रसन्न ने अनेक नाटक किए हैं। अतः अनुभव के आधार पर उनसे गलतियां न हो ऐसी आशा की जाती है लेकिन वे आशा पर खरे नहीं उतरे। इन सबके पीछे बड़ी कमी रही पूर्वाभ्यास की। मात्र दो दिन में प्रदीप प्रसन्न गाजर गाजीपुरी के किरदार को बेहतर तरीके से नहीं समझ पाए और जितना समझने की उन्होंने कोशिश की वह अपने नजरिए से समझा। निर्देशक क्या चाहता है, यह नहीं पता लगा। क्योंकि पूर्वाभ्यास नहीं हुआ। अक्सर कलाकार जब किसी किरदार को तैयार करता है तो वह अपने ही किरदार के बारे में विचार करता है, कि वह डेवलप कैसे करेगा, उसका प्रभाव क्या होगा आदि। लेकिन नाटक का निर्देशक पूरे नाटक को देखकर हर किरदार के बारे में विचार करता है। वह सबको लेकर सोचता है। अर्थात एक तरह से कलाकार व्यक्तिगत रूप से सोचता है और निर्देशक सामाजिक रूप से। जबकि नाटक एक सामुहिक सामाजिक विधा है। और जब तक कोई कलाकार सिर्फ अपने ही बारे में या अपने ही किरदार के बारे में सोचेगा तब तक वह न स्वयं सामाजिक बन पायेगा और न वह प्रस्तुति सामाजिक बन पायेगी। अपवाद स्वरूप कुछ निर्देशक भी अपने बारे में सोचते हैं या किसी एक किरदार के बारे में सोचते हैं तो ऐसी स्थिति में किसी हद तक वह निर्देशक या कलाकार तो सफल हो सकते हैं लेकिन वह प्रस्तुति सफल नहीं कही जा सकती। इसलिए कलाकार को अपना किरदार तैयार करते समय, अपने सहयोगी कलाकार और विशेष रूप से निर्देशक के विचारों को आत्मसात करना चाहिए। यदि किसी मुद्दे पर असहमति हो तो बात की जा सकती है। क्योंकि नाटक एक सामुहिक कलात्मक प्रस्तुति है।
यह सामुहिक प्रस्तुति बहुत आकर्षक तभी बन सकती है जब सब लोग मिलके कार्य करें। अर्थात सिर्फ मंच पर अभिनय करने वाले कलाकार ही नहीं
, बल्कि उसका संगीत, रूप सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, मंच सज्जा एवं दर्शक। ये सब साथ होने चाहिएं। इनमें से कोई भी चीज अलग दिखाई दी तो इसका मतलब वह एक संपूर्ण सफल सामाजिक सामुहिक कलात्मक नाट्य प्रस्तुति नहीं है। उस सामुहिक प्रस्तुति में कोई व्यक्ति विशेष कम या ज्यादा कर सकता है। यह उसकी क्षमता-अक्षमता, अनुभव, आत्मविश्वास, समझ, समर्पण आदि पर निर्भर है। कई बार ऐसा होता भी है, कि कोई एक पात्र या एक कलाकार, अपने किरदार को बहुत ही अच्छे से अभिनीत कर जाता है और कोई एक पात्र या एक कलाकार अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाता है। तो ऐसी स्थिति में वह पात्र या अभिनेता तो सफल है लेकिन निर्देशक और वह नाटक सफल नहीं है। निर्देशक इसलिए सफल नहीं है क्योंकि निर्देशक अपनी तरफ से बहुत कुछ बताने की कोशिश तो करता है, लेकिन अभिनेता यदि उसे नहीं पकड़ पा रहा है, जैसा निर्देशक चाह रहा है तो यह उस कलाकार के साथ-साथ निर्देशक की भी कमी मानी जानी चाहिए। हालांकि इसमें बहुत सारे सवाल खड़े हो सकते हैं। क्योंकि रंगमंच के लिए कलाकारों का मिलना ही बड़ी मुश्किल बात है और उनमें भी ऐसी उम्मीद और आशा लगाना कि रंगमंच की समझ वाले कलाकार मिल जाएं। यह थोड़ा कठिन और चुनौतिपूर्ण है। विशेष रुप से अलवर में इस समय। इन सबके बावजूद ‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ नाटक ने दर्शकों को खूब हंसाया, गुदगुदाया और सोचने के लिए मजबूर किया। प्रस्तुति के समय एवं बाद में दर्शकों की टिप्पणी और उनकी प्रतिक्रियाओं से यही आभास होता है कि यह नाटक सफल रहा। किन्तु एक समीक्षक की दृष्टि से मुझे यह नाटक औसत लगा। क्योंकि नाटक के लेखन में एवं नाटक में काम करने वाले सभी कलाकारों में ऐसी क्षमता है कि यह नाटक और बेहतर हो सकता है। 
नाटक की प्रस्तुति पर दर्शक भरपूर आनंद ले रहे थे। इसका एक कारण यह है कि इस नाटक का कथासूत्र ही कुछ इस तरह का है कि दर्शक उससे तुरंत जुड जाता है। नाटक में घटना इस तरह से घटती हैं कि कुछ देर बाद ही दर्शक अपने आप हास्य रस के मोड़ पर चला जाता है। यदि कलाकार उसके अनुसार अपना अभिनय और घटना क्रम को सही रूप से गढ लें तो दर्शक उसके साथ सहज रूप से हास्य रस में बहता चला जायेगा। लेकिन जहां पर भी थोड़ी सी स्थिलता दिखाई देगी दर्शक तुरंत नाटक एवं कलाकार दोनों से पृथक हो जायेगा। क्योंकि हास्य की खास बात यह होती है कि वह उतरोत्तर बढ़ता जाता है और इसी रूप में उसकी श्रेष्ठता मानी जाती है। दर्शक यही अपेक्षा अभिनेता से करता है कि वह हास्य की जो आधारशिला रखता है, न कि उस पर कायम रहे अपितु आगे के संवाद, घटनाक्रम तथा दृश्य में हास्य और ऊंचाई पर जाए, और ऐसा होगा तभी दर्शक अपनी सहज प्रतिक्रिया प्रकट कर सकेगा। हास्य अपने आरोही क्रम में बढता जाता है तो दर्शक और अभिनेता दोनों एक दूसरे से जुडते जाते हैं। दोनों की ही अपेक्षा उतरोत्तर बढ जाती है। ‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ नाटक भी इसी तरह की स्थितियां पैदा करता है। नाटक की प्रस्तुति में दर्शकों की प्रतिक्रिया से ऐसा बार-बार आभास भी हुआ कि यह अपने आरोही क्रम में बढ़ा है। बीच बीच में कुछ जगह पर यह क्रम टूटा भी है। चाहे किसी भी कलाकार या वजह से टूटा और जब क्रम टूटा तो अभिनेता नाटक से, नाटक दर्शक से, दर्शक अभिनेता से और अभिनेता दर्शक से टूटे तथा सभी रस से टूटे। फिर भी एक अच्छी और यादगार प्र्रस्तुति कही जा सकती है ‘द ग्रेट राजा मास्टर ड्रामा कंपनी’ नाटक।

प्रकाश व्यवस्था नाटक के निर्देशक देशराज मीणा ने संभाली। मंच परिकल्पना भी उनकी ही रही। संगीत व्यवस्था राहुल शर्मा और ऋितिक चेलानी ने संभाली। रूप सज्जा मनीषा नावरिया, वस्त्र  सज्जा तथा अन्य तमाम जिम्मेदारियां स्टेज मैनेजर हितेश जैमन के कंधे पर रही। मंच संचालन एवं नाट्य प्रस्तुति में सहयोग दिया मनमोहन सिंह ने और अखिलेश ने।
प्रस्तुति-
डॉ. प्रदीप कुमार
ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर,
तहसील-किशनगढ़-बास, जिला-अलवर,
राजस्थान, पिन न. 301405, मोबाईल नं.-9460142690,






Sunday, November 18, 2018

Awesome rendition of a playful drama in Alwar : अलवर में रही फंदी नाटक की गजब की प्रस्तुती


राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर एवं रंग संस्कार थियेटर ग्रुप अलवर (इकाई -राज लोक विकास संस्थान, अलवर) के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय युवा नाट्य समारोह के अंतिम दिन आज महावर ऑडिटोरियम में डॉ शंकर शेष का लिखा हुआ एवं हरिप्रसाद वैष्णव द्वारा निर्देशित नाटक फंदी खेला गया. रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के संयोजक देशराज मीणा ने बताया की मूलत: हमारी संस्था का यही उद्देश्य है  कि लगातार रंगकर्म अलवर शहर में करते रहे. हम यह भी चाहते हैं कि अलवर शहर में जितनी भी संस्थाएं हैं वे भी  हर महा कोई न कोई प्रस्तुति देती रहे, तो निसंदेह अलवर शहर में कलात्मक रूप से नाटक  की गतिविधियां लगातार चलती रहे और इस से जो कई बार या कई जगह पर यह सवाल उठता है कि अलवर में रंगकर्म एक तरह से मर रहा है, वह खत्म हो. फिर या तो इस इस तरह के सवाल उठेंगे ही नहीं या उनका जवाब मिल जाएगा. दूसरा हमारा यह भी प्रयास रहता है की हर तरह के नाटक हमारे शहर में भी हो.  क्योंकि नाटक अलग अलग रंग और रस के होते हैं. कुछ नाटक सिर्फ हँसाते हैं, कुछ रुलाते हौं, कुछ सोचने के लिए विवश करते हैं, कुछ समाज में व्याप्त असंगतियों पर कटाक्ष करते हैं. अत: इन सबका अपना महत्त्व है. लेकिन यह भी सच है की हर रंग और हर रस हर किसी को पसंद नहीं आता है. लेकिन जिसको जो रंग या रस पसंद है वह उसी से सम्बंधित नाटक करें लेकिन अन्य रंग और रस के नाटक देखे जरुर. इसी से विविधता आती है. इसलिए रंग संस्कार थियेटर ग्रुप, अलवर (इकाई -राज लोक विकास संस्थान, अलवर) की यह भी कोशिश रहती  है कि देश के श्रेष्ठ नाटकों को अलवर में प्रस्तुत किया जाए. अलग अलग रंग अलग-अलग रस की नाटक प्रस्तुत हो सके. नाटकों की जो विशेषता है और विविधता है उसे समझ सके एवं उसका रस अलवर के दर्शन भी ले सके.
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इसी क्रम में आज फंदी नाटक का मंचन जोधपुर के कलाकरों द्वारा आज किया गया. फंदी  नाटक जीवन के सभी स्तरों पर सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक विसंगतियां हैं उन पर चोट करता है. डॉ. शंकर शेष ने फंदी  नाटक के माध्यम से मूल रूप से कानून-व्यवस्था पर और उसके साथ साथ असाध्य बीमारियों जैसे कि कैंसर, एड्स आदि जिनका इलाज काफी जटिल एवं असंभव सा है, उन मरीजों को इच्छा मृत्यु का अधिकार होना चाहिए ऐसी सवालों को बड़े ही तर्क पूर्ण ढंग से उठाया और इसके साथ ही समाज में व्याप्त छोटे-छोटे रूपों में फैला हुआ भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वत घोटाले  आदि पर भी बहुत करारा व्यंग्य किया है. इस नाटक में अनेक जगह पर सामाजिक सरोकारों की बात भी की गई है. जैसे चिकित्सकों के द्वारा मर्जी की फीस लेना. दवाई कंपनियों के द्वारा मनमर्जी के दाम लेना. कोर्ट कचहरी या बिजली घर में बैठे अफसर से लेकर चपरासी तक रिश्वत लेना आदि. इन सब कारणों की वजह से आम आदमी न तो अपना इलाज करवा पाता है और न  अपना काम करवा पाता है. कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के जाल में फंस  कर के वह अधमरा  हो जाता है और मानसिक रूप से इतना परेशान हो जाता है की इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या करना चाहता है. लेकिन सवाल यह है कि आत्महत्या भी वह अपनी मर्जी से नहीं कर सकता. उसे यह अधिकार भी मिलना चाहिए. इच्छा मृत्यु का.


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हरिप्रसाद वैष्णव ने अपने खूबसूरत निर्देशन के माध्यम से इस नाटक को बहुत ही गजब जा सजाया. उनकी मंच परिकल्पना एवं नाटक की प्रस्तुति से यह साफ जाहिर हो गया की एक निर्देशक नाटक को अलग दृष्टिकोण से देख कर के उसे इस तरह से भी प्रस्तुत कर सकता है कि दर्शक सोचने के लिए मजबूर हो जाए. फंदी  नाटक में मुख्य रूप से तीन पात्र हैं. जिनमे फंदी की भूमिका में महेश चोधरी. वकील की भूमिका में सुरेश पंवार और वार्डर की भूमिका में हरीश शर्मा. इन तीनों ही लोगों ने  बेहद खूबसूरत और गजब का अभिनय किया. महेश चौधरी ने अपने संजीदा एवं व्यंग्यात्मक लहजे के संवादों के माध्यम से दर्शकों को बार बार ताली बजाने के लिए मजबूर कर दिया. वकील के  अभिनय ने  सुरेश पवार ने अपने जबरदस्त कटाक्षों के माध्यम से यह साबित कर दिया की अभिनय की ताकत किसी भी रूप से कमजोर नहीं है. बॉर्डर के रूप में हरीश शर्मा ने अपने अभिनय से  लोगों की  खूब तारीफ बटोरी. मंच पर जिन लोगों की भूमिका इस नाटक को सजाने में रही उनमें मंच सज्जा कैलाश गहलोत, महावीर विश्नोई एवं  त्रिलोक गोस्वामी की रही. रूप सज्जा का कार्य किया कैलाश गहलोत ने किया. इस नाटक को खूबसूरत संगीत से सजाया रघुवर सिंह ने. संगीत नाटक को बहुत प्रभावी बनाता है और उसकी भूमिका कम नहीं होती है. फंदी नाटक में लोगों ने इस बात को महसूस भी किया. प्रकाश की व्यवस्था संभाली स्वयं नाटक के निर्देशक हरिप्रसाद वैष्णव ने. निश्चित रूप से संगीत एवं प्रकाश दोनों ही एक तरह से नाटक के पात्र होते हैं. नाटक के हिस्से होते हैं. क्योंकि नाटक के बारे में कहा जाता है कि संपूर्ण कलाओं का महाकुंभ है नाटक. फंदी नाटक एक बेहतरीन प्रस्तुति रही अलवर के दर्शकों के लिए. कार्यकर्म का संजीदा और प्रभावी संचालन किया वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश शर्मा ने. 
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Saturday, April 28, 2018

World Theater Day - Theater is a Life : विश्व रंगमंच दिवस - जिंदगी जीने का एक सलीका है रंगमंच


विश्व रंगमंच दिवस यानी रंगकर्मियों के लिए एक ऐसा त्यौहार जिसे वे कला के अनेक रंगों के साथ मनाते हैं। पूरी दुनिया में रंगमंच से जुडे़ सभी लोग इसे प्रस्तुतियों के माध्यम से या रंगमंच पर चर्चा-परिचर्चा के माध्यम से मनाते हैं। विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना फ्रांस में, 27 मार्च 1961 में नेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। तब से यह प्रति वर्ष 27 मार्च को विश्वभर के रंगकर्मियों द्वारा मनाया जाता है। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा भी इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संदेश होता है। इस संदेश को विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा दिया जाता है। इस संदेश में रंगमंच, नाटक तथा उसके द्वारा शांति, संस्कृति तथा कला की समृद्धि के संबंधित विचारों को व्यक्त किया जाता है। पहला अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संदेश 1962 में फ्रांस की प्रसिद्ध रंगकर्मी जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी/नाटककार गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया।
नाट्य कला एक ऐसी अद्भुत कला है जिसमें जीवन के लगभग सभी पक्ष निहित है। नाट्यशास्त्र के प्रणेता आचार्य भरतमुनि ने भी इस बात का हवाला देते हुए कहा है कि-
‘न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।
ना सौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।
अर्थात् कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या, कोई कला, कोई योग तथा कोई कर्म ऐसा नहीं है, जो नाट्य में न दिखाई देता हो।‘ नाटक कला व जीवन के इन सभी विषयों को अपना विषय बनाता रहा है।
माना जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों में लोग नाटक के विकास का सूत्र पाते हैं। संभवतः इन्हीं संवादों से प्रेरणा पाकर लोगों ने नाटक की रचना की होगी और इसी से नाट्यकला का विकास हुआ हो। यथासमय भरतमुनि ने उसे नाट्यशास्त्र के रूप में शास्त्रीय रूप दिया। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटकों के विकास की प्रक्रिया व्यक्त करते हुए बताया कि-सतयुग बीत जाने पर त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं ने ब्रह्मा से मनोरंजन का कोई ऐसा साधन उत्पन्न करने की प्रार्थना की, जिससे देवता अपना दुख भूल सकें और आनंद प्राप्त कर सकें। फलतः उन्होंने ऋग्वेद से कथोपकथन, सामवेद से गायन, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर नाटक का निर्माण किया और रंगमंच निर्माण का दायित्व निभाया विश्वकर्मा ने।
भरतमुनि द्वारा प्रणीत नाट्यशास्त्र को पंचम वेद की संज्ञा से भी विभूषित किया गया है। जिस प्रकार जीवन जीने के तमाम व्यवहारों को चारों वेदों में रेखांकित किया गया है ठीक उसी प्रकार जीवन के तमाम पक्षों का विस्तृत वर्णन नाट्यशास्त्र में किया गया है। नाटक/रंगमंच एक व्यापक कला है। नाटक अनेक कलाओं का कंुभ भी कहा जाता है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र और अनेक कलाओं का कुंभ नाटक की बहुआयामिता को दर्शाता है। भरतमुनि ने हर कार्य एवं कला नाटक में समाहित होने के निर्देश दिये हैं।
जीवन के रंगमंच पर नाटक/रंगमंच की विधाओं का सीधा नाता है। वे आईने के रूप में समाज की अभिव्यक्तियों को व्यक्त करती हैं। सभ्यता के विकास के साथ साथ रंगमंच की मूल विधाओ में परिवर्तन होता गया। आधुनिक परिदृश्य में लोकरंगमंच व लोक कलाओं की वास्तविकता से दूर इन दिनों आधुनिक माध्यमों यथा टेलीविज़न, सिनेमा और वेबमंच ने सांस्कृतिक गिरावट व व्यसायिकता को कला का मूल सूत्र बना दिया है। समाज एवं मानवता की सेवा में रंगमंच की असीम क्षमता प्रतिबिंबित है। रंगमंच शान्ति और सामंजस्य की स्थापना में एक ताकतवर औज़ार है। यह स्वतः स्फूर्त, मानवीय, कम खर्चीला और अधिक सशक्त विकल्प है व समाज का वह आईना है जिसमें सच कहने का साहस है। वह मनोरंजन के साथ शिक्षा भी देता है। लेकिन साथ ही साथ यह भी कहना पड़ेगा कि नाटक एवं रंगमंच के प्रति लोगों की जबरदस्त संकीर्णता भी है। यह एक बड़ा सोच का और शोध का विषय है। इसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? पूर्व की तुलना में हर जगह पर रंगमंच की गतिविधियों में कमी भी आई है तथा बदलाव भी हुए हैं। रंगमंचीय गतिविधियों में कमी आना एवं बदलाव होना दोनों ही स्थितियों में रंगमंच पर सवाल खड़े होते हैं। इन सवालों के जवाब तभी संभव है जब रंगमंच से जुड़ी हुई गतिविधियां निरंतर, सक्रिय एवं हर जगह, हर संभव होती रहें।
भारत में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों व मंडली से देश प्रेम तथा नवजागरण की चेतना ने तत्कालीन समाज में उद्भूत क्रांति की थी। उसके बाद कैफी आजमी, सफदर हाशमी, इब्राहिम अल्काजी, बी वी कारंत, हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे, जोहरा सहगल आदि रंगमनीषियों ने रंगमंच/नाटक में विशेष योगदान रहा है।
दरअसल, रंगमंच को जीने वाले, इसे ज़िंदगी जीने का सलीक़ा कहते हैं। रंगमंच के पथ पर चलकर जीवन को जानने, समझने और जीने का हुनर आता है। थिएटर से जुड़ा शख्स अपने जीवन को बहुकोणीय स्तर पर प्रस्तुत तो करता ही है साथ ही वह समाज के समक्ष भी बहुआयामिता प्रस्तुत करता है। लेकिन दिक्कत यही है कि रंगमंच एक ऐसी विधा है जो सामाजिकता तथा सामूहिकता की मांग करती है। जबकि इस चकाचौंध भरी तथाकथित आधुनिक दुनिया के अंदर जीवन सामाजिकता और सामूहिकता की बजाये एकाकीपन की ओर बढ़ता हुआ अधिक दिखाई दे रहा है। जिसके कारण व्यक्ति कला, संबंध, प्रेम, समाज, परिवार यहां तक कि सम्वेदनाओं से कटता हुआ, दूर होता हुआ दिखाई दे रहा है। जबकि रंगमंच या अन्य दूसरी कलाएं इन्हीं सभी तथ्यों को जोड़ने का, एकीकरण करने का, इनका पल्लवन करने का कार्य करती हैं। रंगमंच को संकीर्ण या भोंडी कला मान करके नहीं बल्कि इसे एक स्नेह संचरित सामूहिक उपकर्म के विस्तृत फलक पर देखने की जरूरत है।
अलवर में रंगमंच की बहुत संभावना है। यहां 1980-90 के दौर में अनेक उत्साही रंगकर्मी रहे। जिन्होंने अपने अथक प्रयास से अलवर रंगकर्म को जीवित रखा। आज भी अनेक रंगकर्मी इस विधा में सक्रिय हैं, लेकिन पूर्व की तुलना में उनकी संख्या कम है। अनेक वर्षों से राजश्री अभय समाज रंगमंच पर होने वाले नाटक महाराजा भर्तृहरी की प्रस्तुति भी अपने आप में अलवर रंगकर्म के लिए गौरव है। समय-समय पर अनेक संस्थाएं यहां नाटक करती रही हैं एवं आज भी कर रही हैं। जैसे-इप्टा, नाद, परिचय कला संस्थान, भरत कला संगम, संस्कार भारती, कौस्तुभ कलामंच, अक्षय नाट्य संस्थान, परशुराम कला संस्थान, अरावली आर्टिस्ट अकादमी, शिवरंजनी थियेटर ग्रुप, पलाश, आदि, कारवां फाउण्डेशन, रंग संस्कार थियेटर गु्रप, रंगसंभव थियेटर गु्रप, स्नेह कला मंच आदि। अवलर में चार-पांच प्रेक्षाग्रह भी हैं। इनमें से प्रताप ओडिटोरियम एवं महावर ओडिटोरियम तो नाटक के लिए उचित भी हैं। (हालांकि इनमें में तकनीकि रूप से या अन्य दृष्टिकोण से कुछ कमियां हैं। लेकिन तुलनात्मक रूप से दूसरों से बेहतर हैं।) जबकि दूसरे ओडिटोरियम में इको, विंग्स या अन्य परेशानियां आती हैं। उन्हें भी ठीक किया जा सकता है। अलवर का दर्शक भी नाटक के लिए समर्पित है। बस कुछ कार्य होने चाहिएं, जिससे कि अलवर रंगमंच की स्थिति बेहतर हो सके। जैसे-ओडिटोरियम का शुल्क कम हो। विशेष रूप से प्रताप ओडिटोरियम का, यह प्रेक्षाग्रह सरकारी है। इसे कला, साहित्य की प्रस्तुतियों के लिए ही निर्मित किया गया है। अतः रंगकर्मियों को 1000 रूप्ये प्रति दिन के हिसाब से यह मिलना चाहिए। अलवर में मत्स्य विश्वविद्यालय है। वहां पर नाटक/रंगमंच पर अध्ययन एवं शोध होना चाहिए। विद्यालय एवं महाविद्यालय में नाटक/रंगमंच पर हर महा गोष्ठी, कार्यशाला एवं प्रस्तुतियां आयोजित की जानी चाहिएं। ऐसा करने से यहां एक रैपट्री की स्थापना हो सकती है और रंगकर्मियों को नाटक करने के साथ साथ काम भी मिल सकता है। नाटक/रंगमंच के क्षेत्र में नये लोगों का न आना या कम आना भी इन सब स्थितियों के सुधार के साथ सुधर सकता है। विकास के पैमाने ने पैसे की भागदौड़ के पीछे प्रसिद्धि की पगडंडी पर चलने वाले को बड़ा व्यक्ति जब से साबित किया है। तबसे रंगमंच एवं इसी तरह की कलात्मक गतिविधियों के आम रास्ते सकड़े हो गए हैं या फिर बंद हो गए हैं। निश्चित रूप से इन रंगमंच की गतिविधियों के रास्तों पर जब कोई नहीं चलेगा तो उनकी जगह खरपतवार उगेगी और इस चमक चमक भरी दुनिया में आप सामने दो-चार रंगीन, खुशबूदार पौधे लगाकर उस खरपतवार को छुपा सकते हैं। क्योंकि आजकल हर कोई देखना भी चमक दमक ही चाहता है। खुरदरापन और खांटीपन किसी को पसंद नहीं हैं। जबकि रंगमंच चमकदार नहीं खुरदरापन और खांटीपन लिए हुए होता है। क्यांेकि वह तो एक तरह से प्रतिरोध का स्वर है। अन्याय, अत्याचार के विरूद्ध उठने वाली वह मशाल है जो तम के खिलाफ खड़ी होती है। रंगकर्मियों का काम इसे जलाए रखना है।


Monday, April 23, 2018

promise of laughing but crying Matsy Theater Festival : हंसाने का वादे करके रुला गया मत्स्य थियेटर फेस्टिवल


हंसाने का वादे करके रुला गया मत्स्य थियेटर फेस्टिवल
फाल्गुन का महिना भारतीय दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. इस माह में होली का बहुत ही खूबसूरत त्योहार आता है जो हर प्रकार के भेदभाव को मिटाकर सभी को अनेक रंग में रंग देता है. पूरे माहोल को रंगमय बना देता है. इस माह में फसल भी पक जाती है. इसी माह में 27 तारीख को रंगो का त्योहार आता है. जिसे नाटक करने वाले अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस के नाम से मनाते हैं. 27 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस के रूप में पूरे देश में थिएटर प्रेमी उत्सव के रूप में मनाते हैं. जिसके अंतर्गत गोष्ठियां, नाटक चर्चा एवं विशेष रूप से नाट्य प्रस्तुतियां की जाती हैं.

अलवर में भी लगातार नाटक एवं रंगकर्म को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ उत्साही युवा रंगकर्मी इस प्रयास में लगे हुए हैं की अलवर का नाटक जगत भी समृद्ध हो. इसी प्रयास के तहत रंग संस्कार थिएटर ग्रुप गत चार वर्षों से लगातार अलवर में रंगकर्म के माध्यम से यह कोशिश कर रहा है. इस वर्ष रंग संस्कार थियेटर ग्रुप (इकाई राज लोक विकास संस्थान अलवर) एवं संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से अलवर में अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस के अवसर पर तीन दिवसीय कार्यक्रम मत्स्य थिएटर फेस्टिवलके रूप में आयोजित किया गया। जिसके अंतर्गत देश के प्रख्यात नाटकों का मंचन किया गया। मत्स्य थियेटर फेस्टिवल की परिकल्पना अवलर के रंगकर्मियों की प्रस्तुति को लेकर की गई थी। लेकिन अफसोस की अलवर की एक भी नाट्य प्रस्तुति इस अवसर पर नहीं हो सकी। जबकि अलवर में रंगकर्म एवं नाट्य गतिविधियों को विकसित करने की कोशिश का ही नाम इस तरह के समारोह का आयोजन करना है। हालांकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि अलवर के रंगकर्मियों ने कोशिश नहीं की, परन्तु वे सफल नहीं हो पाये। दूसरी कल्पना इस फेस्टिवल के पीछे यह थी कि अलवर के रंगकर्मी एवं दर्शक देश में होने वाले नाटकों से यहीं अपने शहर में रूबरू हो सकें और नाटकों के महत्त्व को जान सकें। ऑडिटोरियम को लेकर अलवर में एक बड़ी समस्या है। इसका किराया बहुत-बहुत ज्यादा है। संभवतः लगातार नाट्य प्रस्तुतियां भी उस समस्या के समाधान का कोई मार्ग प्रशस्त कर सकें। ये सभी मुद्दे मत्स्य थियेटर फेस्टिवल की परिकल्पना में निहित थे। भविष्य में इनका समाधान होगा ऐसी आशा है।

मत्स्य थिएटर फेस्टिवल के अंतर्गत देश के चार प्रसिद्ध नाटकों का मंचन हुआ। 27 मार्च को दो नाटकों का मंचन हुआ-किंग ऑफ टेªजेडीऔर दो वर्दियां। पहला नाटक किंग ऑफ़  ट्रेजेडीखेला गया. किंग ऑफ़ ट्रेजेडीनाटक कुलदीप कुणाल द्वारा लिखित है और इसे निर्देशित किया के. डी. उर्फ कशिश देवगन ने. हास्य के बहुत बड़े जादूगर कहे जाने वाले चार्ली चैप्लिन के जीवन पर आधारित यह नाटक लोगों को बहुत पसंद आया. चार्ली चैप्लिन की जीवनी को संगीतमय प्रस्तुत कर कलाकारों ने लोगों को प्रभावित किया.
चार्ली चैप्लिन जो लोगों को अक्सर हंसाते हुए नजर आते हैं, निश्चित रूप से अपने चेहरे के हाव भाव से, एक्सप्रेशंस एवं एक्टिंग से हंसाने का माद्दा जितना चार्ली चैप्लिन में है संभवत इतना बड़ा कलाकार दुनिया में कोई और दूसरा नजर नहीं आता है. लेकिन इस हंसी के पीछे कितना अवसाद, कष्ट एवं कितनी दर्द भरी कहानी है इसका एक बेहतरीन नमूना किंग ऑफ ट्रेजेडीके कलाकारों ने अपनी बेहतरीन अदाकारी से स्टेज पर प्रस्तुत किया. किंग ऑफ़ ट्रेजेडीकी संगीतमय प्रस्तुति ने अलवर के दर्शकों को निश्चित रूप से बहुत प्रभावित किया. नाटक के कलाकारों ने अपनी खूबसूरत अभिनय क्षमता एवं प्रस्तुति के माध्यम से चार्ली चैप्लिन को प्रताप ऑडिटोरियम के रंगमंच पर जैसे साक्षात खड़ा कर दिया, इस तरह का आभास किंग ऑफ़ ट्रेजेडीनाटक को देखते हुए हुआ. किंग ऑफ़ ट्रेजेडीनाटक में मंच पर अभिनय करने वाले कलकारों में-अक्षय रावत-चार्ली चैप्लिन की भूमिका में, चार्ली चैप्लिन की मां हाना की भूमिका निभाई रूबी चौहान ने, चार्ली के फादर चार्ल्स स्पेंसर की भूमिका निभाई प्रयास दुबे ने, चार्ली के भाई सिंधे की भूमिका निभाई शिवम शर्मा ने, डॉलर करेंसी के रूप में समीर खान, नरेटर के रूप में शनि, दूसरे नरेटर के रूप में मनीला, कोरस में मानसी शर्मा, मैनेजर के रूप में अंकित. नाटक का डायरेक्शन, परिकल्पना एवं नृत्य संयोजन के डी उर्फ कशिश देवगन ने किया.

चार्ली चैप्लिन के बाद 8.30 बजे प्रस्तुत हुआ नाटक दो वर्दियांदो वर्दियांनाटक के लेखक हैं डॉ. जगबीर राठी एवं करण सैनी एवं निर्देशन किया डॉ. जगबीर राठी ने. दो वर्दियांनाटक एक पुलिस वाले की कहानी है. उसके पास एक आर्मी मैन आता है और वह पुलिसवाला आर्मी मैन को अपने जीवन की दास्तान सुनाता है. आमतौर पर पुलिस वाले देखने में हमें बहुत ही ठीक नहीं दिखाई देते हैं अर्थात हम उनको नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं एवं यह वास्तविकता भी है. अधिकतर पुलिसवाले नकारात्मक होते हैं लेकिन यह सोचने की आवश्यकता है की वे नकारात्मक पुलिस वाले बनते क्यों हैं. जबकि उस पुलिस वाले के पीछे भी एक व्यक्ति है. उसका भी अपना परिवार है. वह भी एक सामाजिक व्यक्ति है. वह भी अपने परिवार एवं समाज के बारे में सोचता है लेकिन उसकी भी अनेक मजबूरियां हैं. दो वर्दियांनाटक इसी तरह की अनेक सकारात्मक बातें सोचने के लिए मजबूर करता है. हरियाणवी भाषा के पुट के डायलॉग लगातार लोगों को प्रभावित करते हैं. पुलिसवाला आर्मी मैन को अपनी दास्तां सुनाता है कि किस प्रकार से उसके भी जीवन में अनेक तरह के कष्ट आए हैं. कैसे-कैसे लोगों से उनका पाला पड़ा है. बड़े अफसर एवं नेताओं का दबाव एवं डंडा उनके ऊपर कैसे घूमता रहता है तथा यह पुलिस वाला जो देश हित एवं देश की रक्षा के बारे में शपथ ले कर यह वर्दी धारण करता है लेकिन बड़े आकाओं के दबाव के आगे उसकी सारी शपथ धरी रह जाती है. इस नाटक में समाज के अनेक पक्षों पर गंभीर कटाक्ष किया गया है। जैसे आजकल की युवा पीढ़ी का भटकाव, बाबाओं के कारनामें, एक राजनेता द्वारा अपने ही पुत्र को सत्ता के लिए मरवाने की कोशिश आदि।
इन सब घटनाओं में पुलिस स्टेशन का दृश्य बहुत कुछ हकीकत कहता है। वहां होने वाली घटनाओं को नाटक बेहतर तरीके से प्रस्तुत करता है। डॉ. जगबीर राठी, करण सिंह एवं राजकुमार धमकड का अभिनय काफी प्रभावी रहा। अनेक प्रकार की विसंगतियों पर कटाक्ष करता हुआ दो वर्दियांनाटक निश्चित रूप से दर्शकों को सोचने के लिए मजबूर करता है. रोहतक से आए हुए कलाकारों के द्वारा प्रस्तुत दो वर्दियांनाटक अनेक प्रश्न खड़े करता है. बेहतरीन अदाकारी एवं खूबसूरत संवादों के लिए यह नाटक दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ पाया. दो वर्दियांनाटक में अभिनय करने वाले कलाकारों में डॉ. जगबीर राठी, करण सैनी, डॉ. प्रताप राठी, राजकुमार धमकड़, विश्व दीपक तिरका, अनिल बागड़ी, अलकेश दलाल, जोगिंद्र, अजमेर कुंदु आदि थे. मंच परे की व्यवस्था इन कलाकारों ने संभाली-संगीत अशोक शर्मा, कॉस्ट्यूम-अजमेर कुंदु, मेकअप-यशु दास, टेक्निकल मैनेजर-ऋषभ वर्मा, प्रोडक्शन-अनिल बागड़ी, सुपर विजन-डॉ. प्रताप राठी. ये दोनों ही नाटक हरियाणा कला परिषद मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर के सहयोग से खेले गए।

अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित मत्स्य थिएटर फेस्टिवल कि इन दोनों ही बेहतरीन नाटकों की प्रस्तुति के द्वारा संस्कार थिएटर ग्रुप ने साबित कर दिया कि अलवर में अच्छे नाटक प्रस्तुत हो सकते हैं. अच्छे नाटक देखे जा सकते हैं. रंग संस्कार थिएटर ग्रुप लगातार प्रयास कर रहा है की अलवर में प्रसिद्ध तथा बेहतर नाटक प्रस्तुत हों और धीरे-धीरे नाटक करने वाले, नाटक देखने वाले दोनों ही इस बात से प्रेरित हों और लगातार यहां पर भी रंगकर्म सक्रिय हो तथा रंगकर्म से जुड़ी समस्याओं का समाधान हो. अलवर के सभी रंगकर्मी मिलकर के साझा प्रयास करें तो इस तरह की समस्या का समाधान हो सकता है.
अनेक असुविधाएं एवं संकटों के बाद भी लगातार अलवर के युवा एवं उत्साही रंगकर्मी अलवर में रंगकर्म को सक्रिय रखने में पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. आधुनिक एवं तकनीक भरी इस दुनिया में रंगमंच जैसी कला सामाजिक सरोकारों से सीधा ताल्लुक रखती है. इस तरह की कलाओं को प्रोत्साहन देने के लिए आम लोगों का सहयोग बहुत जरूरी है. अलवर के दर्शक नाटक के प्रति विशेष रुचि रखते हैं. अलवर में प्रस्तुत नाटकों में दर्शकों की प्रतिक्रिया से यही प्रतीत होता है.

28 मार्च को जयपुर के कलाकारों के द्वारा राजपूतानानाटक प्रस्तुत किया गया। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि यह राजस्थान की कहानी पर आधारित नाटक है. राजस्थान का नाम पहले राजपूताना था. इस नाटक के अंतर्गत राजस्थान के अनेक पक्षों को उठाया गया है. रसों के राजा रसराज के पास पञ्च तत्त्व रस की तलाश में आते हैं. सर्वप्रथम रसराज उन्हें जिस विशेष क्षेत्र का नाम बताते हैं वह नाम होता है राजस्थान. रसराज उन्हें राजस्थान भेजते हैं और कहते हैं कि राजपूताना की नारी पूर्ण रुप से रसों का भंडार है. अतः आप वहां जाइए. वहां आपको श्रृंगार, सौंदर्य, अद्भुत, शौर्य, प्रेम, शांत, करुणा और सोम्य आदि रसों का एक अनूठा संगम राजपूनाता की नारी में दिखाई देगा.

पञ्च तत्व यह सुनकर बहुत प्रसन्न होकर राजस्थान की भूमि पर प्रवेश करते हैं. राजस्थान की भूमि में वहां की स्त्री को देखते हैं तो रसराज के द्वारा बताई गई नारी की वे तमाम विशिष्टताएं उसकी वीरता, शौर्य, सौंदर्य, करुणा आदि उन्हें उसमें कुछ भी दिखाई नहीं देता है. उन्हें राजपूनाता की जो स्त्री दिखाई देती है वह तो डरी-सहमी है, संकोची है, चुप है, समाज में हर तरफ से शोषित है. स्त्री के शौर्य और वीरता की अद्भुत गाथा कि जिस कल्पना में पंच तत्त्व राजस्थान की भूमि पर आते हैं, वह सारी कल्पना उनकी धराशाई हो जाती है. उन्हें लगता है की शायद रसराज ने उन्हें गलत जगह पर भेज दिया है. क्योंकि जिस राजपूताना प्रदेश की नारी की प्रशंसा रसराज कर रहे थे या तो वह राजपूताना प्रदेश यह नहीं है या फिर यहां की नारियां ऐसी नहीं हैं. लेकिन जब उन्हें पता लगता है की वे सही जगह पर आए हैं. लेकिन आधुनिक परिवेश के बदलाव में नारी का अस्तित्व, उसका सम्मान, उसकी वीरता, उसका शौर्य, साहस, बलिदान, करुणा, त्याग, तपस्या आदि कहीं खो गए हैं। तो वे  नारी को एहसास दिलाते हैं. याद दिलाते हैं उसे पुराने ऐतिहासिक क्षणों को और कहते हैं की  तुम वह नहीं हो जो दिखाई दे रही हो, तुम असीम क्षमताओं की भण्डार हो, तुम पुंज हो, ज्वाला हो, तेजस्विनी हो, सृजक हो, निर्मात्री हो. तुम अबला नहीं सबला हो. याद करों अपने इतिहास को कभी मीरा की भक्ति और श्रृंगार की मूरत के रूप में तुम जानी जाती थी. याद करो हाडी के साहस, वीरता और बलिदान की कहानी की निशानी तुम ही हो. वह तुम्हारी ही प्रतिछाया थी. इतिहास में तुम्हारी ही गाथाएं लिखी जाती थी. पन्नाधाय की अद्भुत बलिदानी कहानी तुम ही हो. सौंदर्य, प्रेम, स्वाभिमान और खुद्दारी का प्रतिक पदमावती हो तुम. इतनी बड़ी और अद्भुत शक्ति की पुंज होकर भी तुम क्यों चुप हो. नारी को अपने अतीत की याद आती है. वह शोषण की चक्की में पिस रही है इसलिए शोषण के विरुद्ध आवाज उठाती है. शोषण करने वालों को चेतावनी देती है की मुझे अपमानित मत करों. वह चिंगारी बनकर फिर से पैदा हो जाती है. जब नारी चिंगारी बनती है तो विस्फोट होता है. वह कहती है नारी की बेइज्जती मत कीजिए, उसका सम्मान कीजिए और उससे प्रेम कीजिए, उसे प्रेम दीजिए. क्योंकि यदि नारी चिंगारी बन जाएगी तो सब कुछ को खाक कर देगी. इन चारों स्त्रियों की कथा को कलाकारों ने मंच पर बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत कर नारी के विशिष्ट रूप को दिखाया। लंबे लंबे वस्त्रों एवं बांस के डंडों से निर्देशक ने अनेक दृश्यों को मंच पर कल्पित कर नाटक में अनेक प्रयोगात्मक कार्य किए जो दर्शकों को बहुत पसंद आए।

जयपुर से आए कलाकारों ने राजपूताना की बेहतरीन प्रस्तुति के माध्यम से लोगों को अंत तक नाटक से जोड़े रखा. नाटक की प्रकाश व्यवस्था ने नाटक को जीवंत कर दिया. नाटक में संवाद बहुत ही खूबसूरत हैं. निश्चित रूप से लेखक राजस्थान के ऐतिहासिक पक्ष की वह विशेषता यहां पर उजागर करता है जिसके लिए राजस्थान की अपनी अलग पहचान है. कलाकारों ने अपनी अभिनय क्षमता के आधार पर उसे साकार भी किया.
तपन भट्ट द्वारा निर्देशित और लिखित नाटक राजपूताना निश्चित रूप से अपने खूबसूरत संवादों की वजह से एक यादगार नाटक रहा. नाटक में मंच पर भूमिका निभाने वालों में विशाल भट्ट, अभिषेक झाँकल, संवाद भट्ट, अन्नपूर्णा शर्मा, रिमझिम भट्ट, अखिल चौधरी, झिलमिल भट्ट, शिप्रा शर्मा, अभिषेक शर्मा, विष्णु सैन, तपन भट्ट एवं सौरभ भट्ट थे. इस प्रस्तुति को खूबसूरत बनाने में सहयोग दिया हारमोनियम पर सौरभ भट्ट, ढोलक पर शैलेंद्र शर्मा, तबला-पुरुषोत्तम शर्मा. प्रकाश व्यवस्था संभाली शहजोर अली ने. रूप सज्जा-विष्णु सैन, प्रस्तुति नियंत्रक-वासुदेव भट्ट.


रंग संस्कार थिएटर ग्रुप लगातार सक्रिय एवं सुचारु से रंगमंच करने का प्रयास कर रहा है. 27 एवं 28 मार्च को ऑडिटोरियम में नाटक शुरू होने से पहले अलवर के रंगकर्मियों ने ऑडिटोरियम के बाहर एक नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया. नाटक का नाम था-होश में कब आओगे। नाटक देखने आए दर्शक एकदम से वहां पर रुकने लगे. नुक्कड़ नाटक का विषय था कि हम नाटक क्यों करते हैं एवं कहाँ करें. हास्य के माध्यम से लोगों को जोड़ते हुए कलाकारों ने बताया की हम नाटक क्यों करते हैं. नाटक की क्या विशेषताएं हैं एवं आप नाटक क्यों देखते हैं. नाटक करने के लिए हमारे पास पहले जगह नहीं थी. लेकिन अब ऑडिटोरियम उपलब्ध है. बड़ी समस्या यह है कि इस ऑडिटोरियम की दर बहुत महंगी है. अलवर के रंगकर्मियों के लिए बहुत बड़ी समस्या है ऑडिटोरियम बुक करवाना. हम रंगकर्मी ऑडिटोरियम बुक करवाने के लिए पैसे की व्यवस्था करें या नाटक की रिहर्सल करें. जयपुर में रविंद्र रंगमंच, जयपुर में बिरला ऑडिटोरियम, जोधपुर का टाउन हॉल या अन्य ऑडिटोरियम का किराया मात्र 2000 से 10000 हजार प्रतिदिन है लेकिन प्रताप ऑडिटोरियम जो अलवर में बना हुआ है जो निश्चित रूप से बहुत ही सुंदर बना हुआ है इसकी कीमत प्रतिदिन एक लाख के करीब बैठती है. राजस्थान में इस ऑडिटोरियम की कीमत सबसे अधिक है। ऐसी स्थिति में रंगकर्मी कैसे नाटक कर सकता है. जबकि अनेक जगह पर तो गैर सरकारी ऑडिटोरियम भी मात्र 10 से 15 या 20000 हजार में प्रतिदिन के हिसाब से मिल जाते हैं. 
जबकि प्रताप ऑडिटोरियम सरकारी है और यह सरकारी ऑडिटोरियम आम जनता के लिए, सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए, रंगमंच जैसी गतिविधि जो समाज एवं कला को जीवित रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है, उनके लिए होना चाहिए. और उनके लिए कम से कम किराये पर उपलब्ध होना चाहिए. जबकि यह बहुत महंगा है। इस तरह के अनेक सवाल नुक्कड़ नाटक के माध्यम से अलवर के रंगकर्मियों ने उठाए और दर्शकों से उन्होंने अपील की कि आप लोग भी इसके लिए सवाल उठाएं. दर्शको से कहा आप लोग एक एक पोस्ट कार्ड कलेक्टर को, यूआईटी चेयरमैन को भेजीए. अपना पूरा एड्रेस उसमें लिखिए और अपना सुझाव लिखिए. निश्चित रूप से अलवर के रंगकर्मियों के लिए यह एक बड़ी समस्या है. लेकिन फिर भी रंग संस्कार थियटर ग्रुप एवं अलवर के रंगकर्मी प्रशंसा के पात्र हैं. जो की इतनी जद्दोजहद एवं कठिन परिस्थितियों के बाद भी नाटक कर रहे हैं और लगातार कर रहे हैं. इस प्रभावी नुक्कड़ नाटक का लेखन एवं निर्देशन किया वरिष्ठ रंगकर्मी एवं लेखक दलीप वैरागी ने। दलीप वैरागी ने पूर्व में भी अनेक नुक्कड़ एवं लघु नाटकों को लेखन एवं निर्देशन किया है। हालांकि व्यस्तताओं के कारण हाल के दिनों में वे कम लिख रहे हैं। लेकिन बेहतर लिख रहे हैं। नुक्कड़ नाटक में अभिनय करने वाले कलाकारों में-अविनाश सिंह, राजेश महीवाल, अखिलेश, नरेन्द्र सिंह, बजरंग चौहान, हितेश जैमन, विश्वनाथ, संजय सैनी, सुनील, दलीप वैरागी, शुभम गुप्ता थे।  


29 मार्च को नटसम्राटनाटक का मंचन किया गया. आंखें, कांटे जैसी अनेक फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके जयंत देशमुख द्वारा निर्देशित नाटक नटसम्राटएक नाटककार की कहानी है. वि वा शिरवाडकर द्वारा लिखित नटसम्राटनाटक बहुत ही प्रसिद्ध एवं चर्चित है.
नटसम्राटएक अभिनेता के आत्मालाप की कहानी है. यह कहानी प्रसिद्ध सेक्सपीरियन  अभिनेता गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर की है. गणपतराव थियेटर का राजा अर्थात नटसम्राट की उपाधि प्राप्त होने के बाद थियटर से रिटायर हो चुका है. गणपतराव बेहद संजीदा और बेहतरीन अभिनेता रहे हैं. इसीलिए उन्हें नटसम्राट की उपाधि दी जाती है. गणपतराव नाटक करते एवं नाटक जीते हैं. थिएटर के लिए पूर्णतया समर्पित गणपतराव बहुत बड़े और विशिष्ट कलाकार के रूप में जाने जाते हैं. लेकिन उनकी पत्नी कावेरी सरकार एवं उनके दोनों बच्चे एक लड़का, लड़की यह मानते हैं कि गणपतराव बेलवलकर नाटक को घर पर ले आए हैं.अर्थात उनकी जीवनचर्या थिएटर आर्टिस्ट की ही बनी रहती है. गणपतराव बेलवलकर अपनी जिंदगी में सेक्सपियर के अनेक नाटक खेलते हैं. उन्होंने हेमलेट, जूलियस सीजर, किंग लियर, जैसे अनेक महान और प्रसिद्ध नाटक खेले हैं. इन सब नाटकों के किरदारों को करते हुए उन्हें बहुत गौरव महसूस हुआ है. अब उसकी अपनी जिंदगी भी किंग लियर की तरह हो गई है. गणपतराव से वह देखी नहीं जाती है. नाटक करने वाले कलाकार को आमतौर पर उसके परिवार वाले नापसंद करते हैं एवं परिवार का तालमेल नाटककार के जीवन से कैसे होता है उसी का एक ताना-बाना नाटक नटसम्राटप्रस्तुत करता है. एक नाटककार के वृद्ध जीवन का बहुत ही कडुआ सच इस नाटक में बयां होता है। सारी दुनिया जिसे अपनाती है, अपना ही परिवार, स्वयं के बेटे-बहु, बेटी-दामाद उसे ठुकराते हैं। यह वृद्ध दंपत्ति अपने घर से बेघर होकर फुटपाथ पर रहने को मजबूर होता है। सभी लोगों के दिल में राज करने वाला नाट्य कलाकार अपने ही घर के लोगों के दिल में चुबता है।

नाटक करके व्यक्ति सामाजिक रूप से सभी से जुड़ने का प्रयास करता है लेकिन यथार्थ में देखें तो अनेक नाटककार ऐसे हैं जो सबसे पहले परिवार से कटते हैं. घर परिवार उन्हें पसंद नहीं करता है और यह यथार्थ पूर्व में भी था एवं आज भी है. सामाजिक संरचना के दायरे में नाटक जैसे कि बाहर की चीज है. वह इस कैटेगरी में जैसे आता ही नहीं है. परिवार के सभी लोगो को बेचैनी होने लगती है. जबकि नाटक का काम यही बेचैनी पैदा करना है. क्योंकि नाटक करता भी वही व्यक्ति है जिसके मन में बेचैनी हो. समाज की विसंगतियों के प्रति, विद्रूपता के प्रति. सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि किसी भी प्रकार से होने वाले अन्याय के प्रतिरोध में खड़ा होने वाला यह नाटक, नाटक नहीं बल्कि सामाजिक समरसता की ओर कदम बढ़ाने वाली वह तलवार है, जो असामाजिकता, अन्याय एवं किसी भी प्रकार के असंगत को काटने के लिए खड़ी होती है.

नटसम्राटनाटक में नटसम्राट अर्थात गणपतराव बेलवलकर की प्रमुख भूमिका अदा करने वाले आलोक चटर्जी ने अपने खूबसूरत और बेहतरीन अभिनय से लोगों को अनेक जगह पर तालियां बजाने के लिए के साथ-साथ आंसू बहाने के लिए मजबूर कर दिया. आलोक चटर्जी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक हैं. अलोक चटर्जी अनेक सीरियलों एवं नाटकों में अभिनय कर चुके हैं. अनेक नाटककार एवं फिल्म अभिनेताओं के साथ भी अलोक चटर्जी काम कर चुके हैं. जैसे-इब्राहिम अल्काजी, राम गोपाल बजाज, देवेंद्र राज अंकुर, अनुराधा कपूर, रोबिन  दास, मोहन महर्षि, इरफान खान, राजपाल यादव, नसरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, हिमानी शिवपुरी आदि। देश के बहुत ही संजीदा और बेहतरीन अभिनेताओं में आलोक चटर्जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है. नटसम्राटनाटक में अन्य कलाकारों में कावेरी बेलवलकर की भूमिका मे थी रश्मि मजूमदार, नदंन की भूमिका में सुनील गायकवाड, शारदा की भूमिका में ज्योति दुबे, सुधाकर की भूमिका में राहुल तिवारी, नलिनी की भूमिका में अंजली सिंह, सुहासिनी की भूमिका में एंजेल चंदनानी, विठोबा की भूमिका में जैकी भावसार, महादेव की भूमिका में गौरव सराठे, मि. कलवंकर की भूमिका में हरीश वर्मा, मिसेज कलवंकर की भूमिका में रश्मि आचार्य, राजा की भूमिका में अंश पयान सिन्हा. इन सभी कलाकारों ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया।

नाटक में बहुत सारे लोग हमें दिखाई देते हैं अभिनय करते हुए, लेकिन इस अभिनय को और भी प्रभावी बनाने में जिन लोगों की बहुत बड़ी भूमिका होती है, वे अक्सर हमें दिखाई नहीं देते हैं लेकिन उनके बिना नाटक संभव नहीं। मेकअप, लाइट, सेट, रूप सज्जा आदि की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है नाटक में. इनको अभिनीत करने वाले हमे दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि वे मंच के पीछे होते हैं. ये कलाकार थे-मंच व्यवस्था-सुनील गायकवाड, मंच सज्जा-हरीश वर्मा व जैकी भावसार, प्रकाश परिकल्पना-कमलेश कुमार वर्मा व दिनेश नायर, वेशभूषा परिकल्पना-रश्मि आचार्य व गौरव सराठे, रूप सज्जा-हरीश वर्मा, मंच सामग्री-गौरव सराठे व प्रदीप, संगीत संचालन-शरद मोटवानी, मूल मराठी लेखक वि वा शिरवाडकर, नटसम्राट नाटक का अनुवाद किया सच्चिदानंद जोशी ने. नटसम्राट का बहुत ही संजीदा खूबसूरत संगीत तैयार किया उमेश तरकशवार ने. मंच परिकल्पना, प्रयोग एवं निर्देशन जयंत  देशमुख.

नटसम्राटनिश्चित रूप से एक बेहतरीन और खूबसूरत नाटक लिखा गया है और इस खूबसूरत नाटक को निर्देशित किया जयंत देशमुख ने. जयंत देशमुख देश के बहुत प्रसिद्ध फिल्म एवं टेलीविजन आर्ट प्रोडक्शन मैनेजर के रूप में जाने जाते हैं. देशमुख ने अनेक फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर एवं प्रोडक्शन मैनेजर के रूप में काम किया है. गोविंद निहलानी, प्रकाश झा, राम गोपाल वर्मा, अनुराग कश्यप जैसे फिल्मी निर्देशकों के साथ जयंत देशमुख काम कर चुके हैं. जयंत देशमुख ने राजनीति, आरक्षण, बवंडर, तेरे नाम, नमस्ते लंदन जैसी अनेक फिल्मों में प्रोडक्शन डिजाइन का काम किया है। तारक मेहता का उल्टा चश्मा, यह रिश्ता क्या कहलाता है, लाडो, शोभा सोमनाथ की, तेरे लिए आदि सीरियलों में भी आर्ट मैनेजर का काम किया है. इनकी एक मराठी फिल्म गणपति बप्पा एवं हिंदी फिल्म रिजवान अभी आने वाली है.
नाटक से पूर्व प्रेस वालों से बात करते हुए नटसम्राटनाटक के निर्देशक जयंत देशमुख ने कहा कि निश्चित रूप से अलवर जैसे शहर में इतना खूबसूरत ऑडिटोरियम होना एक बहुत बड़ी बात है. रंग संस्कार थिएटर ग्रुप एवं इस पूरे कार्यक्रम के संयोजक देशराज मीणा से बात हुई तो पता लगा कि यहां पर इस ऑडिटोरियम में अनेक समस्याएं हैं. उन समस्याओं के बावजूद भी देशराज मीणा एवं अलवर के रंगकर्मी लगातार थिएटर कर रहे हैं, यह बहुत बड़ी बात है. नटसम्राटनाटक मूलतः एक नाटककार की कहानी को बयां करता है और वह कहानी सीधे-सीधे परिवार से और समाज से जुड़ती है. एक नाटककार एवं उसके परिवार के जीवन में किस तरह की समस्याएं आती हैं, उन्हीं को बयाँ करता है नटसम्राट. हम नाटक नटसम्राट के अंदर नाटककार की अनेक समस्याएं आपके सामने इंगित कर रहे हैं लेकिन देशराज मीणा जैसे थिएटर के लगभग सभी लोग इन समस्याओं को यथार्थ जिंदगी में झेल रहे हैं। ऐसे जुनूनी, खुद्दारी और कला को समर्पित लोगों को हमें प्रोत्साहित करना चाहिए, इनकी हौसला अफजाई करनी चाहिए और लगातार इसी तरह के आयोजन कर सकें इसके लिए हमें उनका सहयोग करना चाहिए. अलवर की जनता यहां के प्रशासन एवं राजनेताओं से यह अपेक्षा और निवेदन करता हूं की अलवर जैसे शहर में जो दिल्ली और जयपुर के बीच में है, जहां पर इतना खूबसूरत ऑडिटोरियम बना हुआ है, उस का बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए. अलवर में बेहतर नाटक हो रहे हैं और भी हो सकते हैं, बशर्ते कि ऑडिटोरियम में जो कुछ थोड़ी-बहुत तकनीकी दिक्कत है, उसमें कुछ सुधार हो जाए और साथ ही साथ देशराज मीणा एवं रंग संस्कार थिएटर ग्रुप से जुड़े हुए हैं जो भी इसमें साथी हैं या अलवर के रंगकर्मी हैं जो नाटक करना चाहते हैं-प्रताप ऑडिटोरियम में उन्हें कम से कम किराये पर यह मिल सके. मैं पूरे देश में अनेक जगह पर नाटक कर रहा हूं, जितना जुनून यहां के नाटक प्रेमियों में नाटक कर्मियों में दिखाई देता है उतना अन्य जगह कम होता है. यदि इस ऑडिटोरियम की कीमत कम हो जाए एवं आप सब का सहयोग सकारात्मक रूप से इन अलवर के रंगकर्मियों के साथ हो तो मेरा मानना है कि मुंबई और दिल्ली से बेहतर रंगकर्म अलवर में होना शुरू हो जाएगा. आपको हो सकता है मेरी बात ठीक नहीं लगती हो लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं पूरे देश भर में जब मैं घूमता हूं तो देखता हूं, देशराज जैसा, उनकी टीम जैसा जुनून बहुत कम जगह एवं कम लोगों में दिखाई देता है. इन समस्याओं के कारण इन रंगकर्मियों का जुनून कहीं समाप्त न हो जाए, कहीं मर न जाए इसलिए आप सबसे निवेदन है सहयोग कीजिए और इस ऑडिटोरियम की खूबसूरती भी तभी है जब इसके अंदर कार्यक्रम हों, थिएटर हो, नाटक हो, कला, साहित्य, संस्कृति से जुड़ी गतिविधियां लगातार हों.

कार्यक्रम के प्रथम दिन का बेहतरीन संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश शर्मा ने किया। सतीश शर्मा ने कहा-इस तीन दिवसीय खूबसूरत मत्स्य थिएटर फेस्टिवल में जो भी प्रस्तुतियां आपको दिखाई दी. उन बेहतरीन खूबसूरत प्रस्तुतियों को पीछे से बहुत बड़ा सहयोग देने वाले अलवर के रंगकर्मियों का बहुत बड़ा योगदान है. इनके बिना यह संभव नहीं था. जिनमे विश्वनाथ मीणा, दलीप वैरागी, अखिलेश, हितेश कुमार जैमन, शुभम गुप्ता, संजय सैनी, विनीत भारती, अविनाश सिंह, राजेश महिवाल, नीलाभ ठाकुर, राजीव वर्मा एवं हेल्पिंग हैंड अलवर के अनेक साथी हैं.
प्रस्तुति-
डॉ. प्रदीप कुमार
ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर,
तहसील-किशनगढ़-बास, जिला-अलवर,
राजस्थान, पिन नं. 301405, मोबाईल नं.-9460142690,
ब्लॉग-दृश्य अदृश्य- http://pradeepprasann.blogspot.in,
youtube chainal-pradeep prasann





 
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