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Tuesday, February 15, 2022

हिन्दी एकांकी पार्ट-3 स्वातंत्रयोत्तर युग


हिन्दी एकांकी  पार्ट-3  स्वातंत्रयोत्तर युग



हिन्दी एकांकी के विकास की चौथी अवस्था


स्वतंत्रता के पश्चात् प्रारम्भ होती है, जिसे


स्वातंत्रयोत्तर युग के नाम से जाना जाता है।


इस अवस्था में हिन्दी एकांकियों पर रेडियो का


प्रभाव बड़ी गहराई से पड़ा है। रेडियो नाटकों


के रूप में नाटकों का नवीन रूप हमारे समक्ष


आया। रेडियो माध्यम होने के कारण श्रोतागण


इसमें रुचि लेने लगे। इसलिए रेडियो एकांकियों


की मांग इस युग में अधिक रही। डॉ. दशरथ


ओझा ने लिखा है कि ‘हिन्दी के जितने-नाटक


आज रेडियो स्टेशनों पर अभिनीत होते हैं उतने


सिनेमा की प्रयोगशालाओं में भी नहीं होते


होंगे। अतः नाट्यकला का भविष्य रेडियो-रूपक


के रचयिताओं के हाथ में है।’


स्वातंत्रयोत्तर युगीन हिन्दी एकांकी का स्वरूप


विविधता लिए हुए है। इनमें एक ओर परम्परागत


शैली में राष्ट्रीय भावना प्रधान एकांकी लिखे गये


तो दूसरी ओर ध्वनि नाट्य तथा गीति नाट्य का


भी विकास हुआ। इस युग के एकांकीकारों ने


सामाजिक, राजनीतिक, मानवतावादी तथा


यथार्थवादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर


एकांकियों की रचना की। इन एकांकीकारों का


दृष्टिकोण प्रगतिशील तत्त्वों से प्रभावित रहा।


जिससे इनकी रचनाओं में पूँजीवाद विरोध, वर्ग


संघर्ष, सड़ी-गली रूढ़ि़यों के प्रति अनास्था,


मानव अन्तर्मन की सूक्ष्म भावनाओं का विश्लेषण,


भ्रष्टाचार उन्मूलन, कृषक एवं मजदूर की दयनीय


स्थिति तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति असन्तोष


आदि विचार व्यक्त हुए।


इस क्षेत्र में विनोद रस्तोगी रचित ‘बहू की


विदा’, कणाद ऋषि भटनागर रचित ‘नया


रास्ता’, तथा ‘अपना घर’ दहेज की कुप्रथा का


पर्दाफाश करते हैं। विनोद रस्तोगी, जयनाथ


नलिन, लक्ष्मीनारायण लाल, राजाराम शास्त्री,


कैलाश देव, विष्णु प्रभाकर, प्रभाकर माचवे,


रेवतीसरण शर्मा, श्री चिरंजीत, भारत भूषण


अग्रवाल, कृष्ण किशोर, करतार सिंह दुग्गल,


स्वरूप कुमार बख्षी, गोविंद लाल माथुर आदि


ने समाज में परिव्याप्त विभिन्न सामाजिक


रूढ़ियों एवं विकृतियों के चित्र खींचे हैं। इस


युग के एकांकीकारों का यथार्थपरक दृष्टिकोण


एवं मानवीय मूल्यों के प्रति विशेष आग्रह रहा


है। विष्णु प्रभाकर के ‘बन्धन मुक्त’ में अछूतोद्धार,


‘पाप’ में अविवाहित युवती का अनुचित पैगाम,


‘साहस’ में निर्धनता और वेश्यावृत्ति, ‘प्रतिशोध’


तथा ‘इंसान’ में हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों से उत्पन्न


साम्प्रदायिकता की समस्या, ‘वीर पूजा’ में


शरणार्थी समस्या, ‘किरण और कुहासा’ में


अन्तर्जातीय-विवाह की सामाजिक समस्याओं का


चित्रण किया गया है। विष्णु प्रभाकर पर


गाँधीवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित


होता है। इनके ‘स्वतंत्रता का अर्थ’, ‘काम’,


सर्वाेदय, ‘समाज सेवा’, ‘नया काश्मीर’ आदि


एकांकियों में गांधीवादी सामाजिक एवं आर्थिक


विचारधाराओं की अभिव्यक्ति हुई है। चिरंजीत के


एकांकी यथार्थ एवं कल्पना का सम्मिलित रूप


प्रकट करते हैं। सामाजिक एकांकियों में इनका


यथार्थवादी आलोचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक


दृष्टिकोण रहा है। कणाद ऋषि भटनागर कृत


‘नया रास्ता’ तथा ‘लांछन’ में नारी स्वातंत्रय एवं


समानाधिकार का स्वर मुखरित हुआ है।


देवीलाल सामर कृत ‘परित्यक्त’, देवराज दिनेश


कृत ‘समस्या सुलझ गई’, विधवा पुनर्विवाह का


समर्थन करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि


स्वातंत्रयोत्तर एकांकीकारों ने अपनी रचनाओं में


उन विविध सामाजिक समस्याओं का चित्रण


किया है जो सहज ही मानव संवेदनाओं का


संस्पर्श करती हैं।


आलोच्य युग में हिन्दी एकांकी में राजनीतिक


जीवन, स्वाधीनता संघर्ष, बंगाल का अकाल,


भुखमरी, फासीवाद का विरोध, जागीरदारी और


देशी नरेशों का जीवन तथा अन्य अनेक राष्ट्रीय


एवं अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएं प्रकट हुई हैं। गाँधी


जी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु चलाये गये विभिन्न


आन्दोलनों एवं क्रिया-कलापों का चित्रण भी इन


एकांकियों में मिलता है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के


पश्चात् हिन्दी एकांकीकारों की लेखनी निर्बाध


रूप से निर्भय होकर चल पड़ी। अतः उन्होंने


अपनी लेखनी से ब्रिटिश प्रशासकों के काले


कारनामों का भी भण्डाफोड़ उन्मुक्त रूप से


किया तथा देशद्रोहियों की वैयक्तिक स्वार्थों की


पूर्ति हेतु ब्रिटिश सरकार के प्रति चाटुकारिता


की प्रवृत्ति का चित्रण करते हुए उनकी कटु


आलोचना भी की है। जयनाथ नलिन की राष्ट्रीय


रचनाओं में सृजनात्मक प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं।


देश की स्वतंत्रता, इसके लिए किया गया


बलिदान, त्याग, सतत उद्योग एवं कर्म की


आवश्यकता के महत्त्व का प्रतिपादन इनकी


रचनाओं में हुआ है। इनके ‘विद्रोही की


गिरफ्तारी’, ‘देश की मिट्टी’, ‘युग के बाद’,


‘लाल दिन’ आदि राष्ट्रीय भावना से परिपूर्ण


एकांकी हैं। विष्णु प्रभाकर ने जो राजनीतिक


भावना से परिपूर्ण एकांकी लिखे उनमें


राजनीतिक उथल-पुथल, समाज पर राजनीतिक


प्रभाव, स्वतंत्रता आन्दोलन तथा राजनीतिक


गौरव का चित्रांकन किया है। इस श्रेणी के


प्रमुख एकांकी-‘क्रांति’, ‘कांग्रेस मैन बनो’,


‘हमारा स्वाधीनता संग्राम’ आदि हैं। ‘हमारा


स्वाधीनता संग्राम’, संयम, स्वतंत्रता का अर्थ,


काम, सर्वाेदय आदि गांधीवादी भावना से


प्रभावित रचनाएं हैं। राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य एवं


जागरूकता का चित्रण प्रेमराज शर्मा कृत ‘गाँधी


की आंधी’। देवीलाल सागर ने ‘बहादुर शाह’,


‘वाजिद अली शाह’, तथा ‘शेरशाह सूरी’ में


परिपूर्णानन्द वर्मा ने राष्ट्रीय एकता एवं संगठन


का संकेत किया है। भारतीय नारी द्वारा


राजनीतिक क्षेत्र में दिये गये सक्रिय सहयोग का


चित्रण भी इन एकांकीकारों ने किया है।


प्रसादोत्तर युग में ऐतिहासिक राजनीतिक एकांकी


की धारा तीव्रवेग से प्रवाहित हो रही थी। इस


युग के एकांकीकारों ने प्राचीन ऐतिहासिक पात्रों


के महान चरित्रों को समक्ष रख भारतीय


इतिहास का गौरवमय चित्र सामने रखा तथा


देशद्रोहियों को उनके दुष्कृत्यी पर धिक्कारा।


इसी धारा का पोषण स्वातंत्रयोत्तर युगीन


एकांकीकारों ने उन्मुक्त हृदय से किया है। इन


एकांकीकारों ने मुगलकाल से लेकर ब्रिटिश


काल तक के इतिहास को अपनी एकांकी


रचनाओं में प्रस्तुत किया है। भारतीय स्वतंत्रता


की लड़ाई का इतिहास प्रस्तुत कर आगामी पीढ़ी


के लिए एक अमूल्य धरोहर प्रदान की है। साथ


ही गाँधीवाद से प्रभावित एकांकीकारों ने गांधी


के सत्य, अहिंसा एवं मानवतावादी एवं शान्तिपूर्ण


अहिंसात्मक आन्दोलन की स्वतंत्रता के युद्ध की


पृष्ठभूमि में अभिव्यक्ति की है। श्री विनोद


रस्तोगी ने ‘पुरुष का पाप’, ‘पत्नी परित्याग’,


‘साम्राज्य और सोहाग’, ‘प्यार और प्यास’ आदि


एकांकियों में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार


बना आधुनिक समस्याओं पर प्रकाश डाला है।


देवीलाल सागर ने ‘वीर बल्लू’, ‘ओ नीला घोड़ा


वा असवार’, तथा ‘जीवन दान’, शीर्षक


ऐतिहासिक एकांकियों में प्राचीन राजपूती शौर्य,


मातृभूमि प्रेम, स्वातंत्रय प्रेम तथा त्याग का


सुन्दर चित्रण किया है। प्रो. जयनाथ नलिन ने


‘देश की मिट्टी’, ‘विद्रोही की गिरफ्रतारी’ आदि


एकांकियों में देश की स्वतंत्रता, देश हेतु किए


गए शौर्यपूर्ण बलिदान, देश सेवा तथा देश के


प्रति कर्त्तव्य का सन्देश दिया है। श्री


परिपूर्णानन्द वर्मा ने ‘वाजिद अली शाह’,


‘शेरशाह सूरी’ तथा ‘बहादुरशाह’ आदि में तीनों


मुगल बादशाहों के शासन-काल की सुन्दर


झांकी प्रस्तुत की है। प्रेमनारायण टंडन ने


‘अजात शत्रु’, ‘गान्धार पतन’, ‘संकल्प’, ‘माता’


की रचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर की है। विष्णु


प्रभाकर रचित ‘अशोक’ शीर्षक एकांकी जहाँ


हिंसा पर अहिंसा, असत्य पर सत्य तथा दानवता


पर मानवता की विजय को चित्रित करता है वहीं


ऐतिहासिक पात्र कलिंग कुमार के देशभक्तिपूर्ण


बलिदान, शौर्य, वीरता एवं दृढ़ता का भी सुन्दर


उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस प्रकार ये


एकांकीकार ऐतिहासिक एकांकी प्रवृत्ति को आगे


बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।


स्वातन्त्रयोत्तर युगीन एकांकीकारों ने अपनी


रचनाओं में प्राचीन सांस्कृतिक, पौराणिक,


धार्मिक तथा नैतिक प्रसंगों की अभिव्यक्ति अपनी


एकांकी रचनाओं में नवीन विचारों तथा तर्क की


कसौटी पर नवीन ढंग से की है। प्रो. कैलासदेव


बृहस्पति ने अतीत भारत की सांस्कृतिक परम्परा


का पुनरुत्थान तथा उसके आदर्शमय अतीत


गौरव का चित्रांकन अपने पौराणिक तथा


ऐतिहासिक रूपकों में किया है। इसके ‘सागर


मंथन’, ‘विश्वामित्र’, ‘स्वर्ग में क्रान्ति’, आदि


महत्वपूर्ण रेडियो रूपक हैं जिनमें भारतीय


सांस्कृतिक गौरव का कलात्मक चित्रण किया


गया है। कणाद ऋषि भटनागर ने ‘आज का


ताजा अखबार’, में भारतीय संस्कृति की महत्ता


चित्रित की है। ओंकारनाथ दिनकर रचित


गणतंत्र की गंगा, अभिसारिका, सीताराम दीक्षित


रचित ‘रक्षाबन्धन’, देवीलाल सामर रचित ‘आत्मा


की खोज’, ‘ईश्वर की खोज’ आदि में पौराणिक


एवं धार्मिक कथानकों के आधार पर प्राचीन


भारतीय राजनैतिक, सांस्कृतिक मानवतावादी एवं


दार्शनिक आदर्शों की प्रतिष्ठा की है। इनमें से


कतिपय एकांकियों में गांधीवादी विचारधारा की


अभिव्यक्ति हुई है।


आलोच्य युगीन एकांकीकारों ने विभिन्न


वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक


समस्याओं का चित्रण हास्य व्यंग्य प्रधान शैली में


किया है। जैसे देवीलाल सामर ने ‘वल्लभ’,


‘तवायफ के घर बगावत’, ‘उपन्यास का


परिच्छेद’, ‘अमीर की बस्ती अछूत’ आदि में


आश्रयहीन तिरस्कृत विधवाओं, समाज के उनके


प्रति दुर्व्यवहार, छुआछूत, रूढ़ियों तथा परिवारों


में होने वाले छोटे-छोटे अत्याचारों पर व्यंग्य


किया है। प्रो. जयनाथ नलिन ने ‘संवेदना सदन’,


‘शान्ति सम्मेलन’, ‘वर निर्वाचन’, ‘नेता’, ‘मेल


मिलाप’ आदि व्यंग्य प्रधान एकांकी लिखे हैं।


लक्ष्मीनारायण लाल ने ‘गीत के बोल’, ‘मूर्ख’,


‘सरकारी नौकरी’, ‘कला का मूल्य’, ‘रिश्तेदार’


आदि भावना प्रधान कटु व्यंग्य मिश्रित एकांकियों


का सृजन किया है। कृष्ण किशोर श्रीवास्तव


रचित ‘मछली के आंसू’, जीवन का अनुवाद’,


‘आँख’, ‘बेवकूफ की रानी’ आदि में सामाजिक


यथार्थ चित्रण कर कटु व्यंग्यात्मक प्रहार किया


गया है। इसके अतिरिक्त राजाराम शास्त्री, श्री


चिरंजीत आदि को हास्य रस के छोटे-छोटे


व्यंग्यात्मक एकांकी लिखने में अच्छी सफलता


मिली है।


उपर्युक्त एकांकीकारों के अतिरिक्त स्वातंत्रयोत्तर


युग में अन्य अनेक प्रतिभा सम्पन्न एकांकीकार


भी उल्लेखनीय हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा का


परिचय देते हुए हिन्दी एकांकी को सम्पन्न एवं


समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया है। कुछ


एकांकीकारों ने मनोविश्लेषण प्रधान एकांकियों


की रचना की जिनमें मानसिक कुण्ठाओं एवं


जटिल भावना-ग्रन्थियों का तार्किक विश्लेषण


प्रस्तुत किया। इस युग में विविध विषयों एवं


समस्याओं को लेकर बहुत बड़ी संख्या में


एकांकियों की रचना हुई।


संक्षिप्ततः, हिन्दी एकांकी का विकास क्रमशः


भारतेन्दु-युग, प्रसाद-युग, प्रसादोत्तर-युग तथा


स्वतंत्रयोत्तर-युग में सम्पन्न हुआ। भारतेन्दु युग


में जो एकांकी लिखे गये वे प्रायः नाटक का ही


लघु रूप थे। इस युग में एकांकी का स्वतंत्र


रूप नहीं मिलता। किन्तु प्रसाद-युग से प्रारम्भ


होकर स्वातंत्रयोत्तर काल तक इसका स्वतंत्र


स्वरूप निश्चित हुआ जो निश्चित रूप से प्रगति


युग कहा जा सकता है। ऐसे विकास-क्रम को


देखते हुए कहा जा सकता है कि निश्चय ही


हिन्दी एकांकी का भविष्य उज्ज्वल होगा।

हिन्दी एकांकी पार्ट-2 प्रसादोत्तर-युग

 हिन्दी एकांकी 

पार्ट-2

प्रसादोत्तर-युग



प्रसादोत्तर-युग हिन्दी एकांकी के विकास की 

तीसरी अवस्था है जिसका समय सन् 1938 से 

1947 ई. (स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व) तक रहा। 

इसके भी हम दो उप-सोपान मान सकते हैं।

(१) 1938 ई. से 1940 ई. तक और

(२) 1941 ई. से 1947 ई. तक।

प्रथम सोपान अर्थात् इस काल के प्रारम्भिक 

समय में हिन्दी एकांकी में अपने समय की 

विभिन्न समस्याओं एवं परिस्थितियों पर 

तर्क-वितर्क मिलता है। तभी कुछ विचित्र एवं 

क्रांतिकारी परिस्थितियों ने विषय, शैली, और 

दृष्टिकोण को भी नया मोड़ दिया। हिन्दी के 

अनेक एकांकीकार इस समय पाश्चात्य नाट्य 

शैलियों एवं विकसित प्रवृत्तियों से प्रभावित हो 

उनका अनुकरण कर रहे थे। इब्सन, विल्यिम 

आर्चर, बर्नार्ड शॉ आदि ख्याति प्राप्त पाश्चात्य 

लेखकों का प्रभाव हिन्दी एकांकीकारों पर पड़ 

ही रहा था। अतः इस युग के एकांकीकारों ने 

परम्परागत एकांकी-तत्त्वों का निर्वाह करने के 

साथ-साथ अभिनव शिल्प-रूपों को भी स्थान 

दिया तथा विषय की दृष्टि से एकांकी को मात्र 

मनोरंजन की वस्तु न बनाकर उसमें मानव 

जीवन की सामयिक समस्याओं एवं विरूपताओं 

का चित्रण प्रारम्भ कर दिया। अर्थात् इस समय 

हिन्दी एकांकी आदर्शवाद के एकांगी घेरे से 

निकल कर यथार्थवाद की ओर बढ़ा। सन् 1940 

से 1947 तक का समय भारत के लिए आपत्तियों 

का समय था। युद्ध की विभीषिकाएं, बंगाल का 

अकाल, आजादी की हुंकार, विदेशी शासकों के 

लोमहर्षक अत्याचार, चोर बाजारी आदि इन्हीं 

सात वर्षों के भीतर की ही बातें हैं। इन सबने 

हमारे चिन्तन और हमारी कला को प्रभावित 

किया। एकांकी भी इनसे अछूता नहीं रह सका। 

कृत्रिमता की बजाय स्वाभाविक और सहज जीवन 

को प्रतिबिम्बित करने वाले एकांकी की रचना 

प्रारम्भ हुई। इन एकांकियों में नाटकीय अभिनय 

के स्थान पर सरल अभिनयात्मक संकेत दिये 

जाने लगे। इसमें परम्परागत रंगमंच-विधान 

सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया और उससे 

सहजता, सरलता, स्वाभाविकता एवं यथार्थ के 

दर्शन होने लगे। शिल्प विधान के अनावश्यक 

आडम्बर बन्धन से इस युग का एकांकी साहित्य 

मुक्त हो गया। संकलन त्रय को वस्तुतः इसी 

समय एकांकी का अनिवार्य अंग माना जाने 

लगा। अब एकांकी केवल साहित्यिक विधा ही न 

रह गयी अपितु इस युग में रंगमंच की स्थापना 

के साथ उसके स्वरूप में भी अन्तर परिलक्षित 

हुआ। इस समय तक ‘हंस’ तथा ‘विश्वमित्र’ 

आदि पत्रिकाओं में एकांकी नाटक एकांकी के 

नाम से प्रकाशित होने प्रारम्भ हो गये तथा 

इनकी प्रारम्भिक भूमिकाओं में एकांकी के शिल्प 

आदि पर विचार प्रस्तुत किये जाने लगे। जिस 

प्रकार भारतेन्दु-युग और प्रसाद-युग में हिन्दी 

एकांकी की विविध प्रवृत्तियाँ उभरी थीं उसी 

प्रकार प्रसादोत्तर युग में भी हिन्दी एकांकी की 

विविध प्रवृत्तियां परिलक्षित होती हैं। वास्तव में 

प्रस्तुत युग में भी पूर्वयुगीन प्रवृत्तियों को ही 

आधार बनाकर एकांकियों की रचना हुई किन्तु 

उनको आदर्शवाद के स्थान पर यथार्थवादी 

आधारभूमि पर निर्मित किया गया।

प्रसादोत्तर युग में यद्यपि एकांकी की अनेक 

प्रवृत्तियों को प्रश्रय मिला है तथापि सामाजिक 

एकांकी की प्रवृत्ति पर लगभग सभी युगीन 

एकांकीकारों ने अपनी लेखनी चलाई। प्रस्तुत 

युग के प्रमुख एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा ने 

तो अनेक सामाजिक समस्या प्रधान एकांकियों 

की रचना करके हिन्दी एकांकी साहित्य को 

बहुमूल्य धरोहर प्रदान की है। इन्होंने जीवन की 

वास्तविकता को अपने एकांकियों का आधार 

बनाया। इस दृष्टि से इनके ‘एक तोले अफीम 

की कीमत’, ‘अठारह जुलाई की शाम’, ‘दस 

मिनट’, ‘स्वर्ग का कमरा’, ‘जवानी की डिब्बी’, 

‘आंखों का आकाश’, ‘रंगीन स्वप्न’, आदि 

एकांकी सामाजिक एकांकी की प्रवृत्ति का 

प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्मा जी के समान 

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ का ध्यान भी विविध वैयक्तिक, 

पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं की ओर 

गया। इनकी एकांकी रचनाओं में ‘चरवाहे’, 

‘चिलमन’, ‘लक्ष्मी का स्वागत’, ‘पहेली’, ‘सूखी 

डाली’, ‘अन्धी गली’, ‘तूफान से पहले’, आदि 

सामाजिक दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय 

हैं। इनमें लेखक ने युगीन सामाजिक रूढ़ियों, 

परम्पराओं, विरूपताओं विकृतियों, एवं 

अज्ञानताओं का बड़ा ही प्रभावोत्पादक किन्तु 

व्यंग्यात्मक चित्र उपस्थित किया है। युगीन 

एकांकीकार भुवनेश्वर-रचित ‘श्यामा एक 

वैवाहिक विडम्बना’, ‘स्ट्राइक’, ‘एक साम्यहीन 

साम्यवादी’ तथा ‘प्रतिमा का विवाह’ आदि प्रसिद्ध 

हैं। इसमें सामाजिक बाह्याडम्बर, स्त्री-पुरुष 

सम्बन्ध, यौन विषयक समस्याओं एवं प्राचीन 

अप्रगतिशील मान्यताओं का चित्रण किया गया है 

जो मानव जीवन के विकास पथ को अवरुद्ध 

किए हैं। श्री जगदीश चंद्र माथुर का दृष्टिकोण 

भी सामाजिक जीवन की समस्याओं के प्रति 

स्वस्थ एवं उदार रहा है। वे उन एकांकियों को 

सफल नहीं मानते जो समाज से निरपेक्ष होकर 

मात्र साहित्यिक विधा बनकर रह जाते हैं। 

उन्होंने ‘ओ मेरे सपने’ के पूर्व निवेदन में लिखा 

है कि ‘कौन ऐसा लेखक होगा कि जिसकी 

कलम पर सामाजिक समस्याएँ सवार न होती हों 

अनजाने ही या डंके की चोट के साथ?’ इस 

विचार के अनुसार उनके ‘मेरी बाँसुरी’, ‘खिड़की 

की राह’, ‘कबूतर खाना’, ‘भोर का तारा’, 

‘खंडहर’, आदि एकांकी उल्लेखनीय हैं। इनमें 

सामाजिक बन्धनों के प्रति तीव्र विद्रोही भावना 

व्यक्त हुई है। श्री शम्भुदयाल सक्सेना रचित 

‘कन्यादान’, ‘नेहरू के बाद’, ‘मुर्दाे का व्यापार’, 

‘नया समाज’, ‘नया हल नया खेत’, ‘सगाई’, 

‘मृत्युदान’ आदि एकांकी सामाजिक समस्याओं 

को प्रस्तुत करते हैं। सक्सेना जी पर गाँधीवादी 

जीवन का प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है। यही 

कारण है कि इनकी रचनाओं में सादा जीवन का 

महत्त्व, मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा, 

नैतिक उन्नयन के प्रति आग्रह, बाह्याडम्बर के 

प्रति घृणा एवं कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता के 

दर्शन होते हैं। हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘बादलों के 

पार’, ‘वाणी मन्दिर’, ‘सेवा मन्दिर’, ‘घर या 

होटल’, ‘निष्ठुर न्याय’ आदि एकांकी रचनाओं में 

विविध सामाजिक समस्याओं का अंकन किया है 

जिनमें विधवा समस्या, ‘नारी की आधुनिकता’, 

वर्ग वैषम्य, जातीय बन्धन की संकीर्णता, प्राचीन 

परम्पराओं एवं मान्यताओं की अर्थहीनता, पुरुष 

की वासना, लोलुपता एवं दुश्चरित्रता आदि का 

चित्रण प्रमुख रूप के किया है। भगवतीचरण 

वर्मा कृत ‘मैं और केवल मैं’, ‘चौपाल में’ तथा 

‘बुझता दीपक’, में पीड़ित मानव की अन्तर्वेदना 

का करुण स्वर उभर कर सामने आया है। श्री 

रामवृक्ष बेनीपुरी रचित ‘नया समाज’, ‘अमर 

ज्योति’, तथा ‘गाँव का देवता’ आदि रचनाएं 

सामाजिक समस्या प्रधान हैं। श्री सद्गुरुशरण 

अवस्थी ने भारतीय संस्कृति के आदर्शों को 

उपयुक्त एवं उचित तर्काे की कसौटी पर कसकर 

उनको समाज के लिए उपयोगी सिद्ध किया 

जिनमें बुद्ध, तर्क एवं विवेक का प्राधान्य है। इस 

दृष्टि से ‘हाँ में नहीं का रहस्य’, ‘खद्दर’, ‘वे 

दोनों’ आदि विशेष महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। इनके 

अतिरिक्त चन्द्रगुप्त विद्यालंकार रचित ‘प्यास’ 

तथा ‘दीनू’, श्री यज्ञदत्त शर्मा कृत ‘छोटी-बात’, 

‘साथ’, ‘दुविधा’, एस.सी. खत्री रचित,‘बन्दर की 

खोपड़ी’, ‘प्यारे सपने’, श्री सज्जाद जहीर रचित 

‘बीमार’ आदि रचनाओं में सामाजिक जीवन के 

सत्य को उभारते हुए और उनका सर्वपक्षीय 

चित्रण किया गया है।

प्रसादोत्तर युग राजनीतिक क्रांति का युग था। 

गाँधी जी का प्रभाव राजनीतिक जीवन में विशेष 

रूप से पड़ रहा था। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार 

का दमन चक्र भी राजनीतिक क्रांति को कुचलने 

के लिए तीव्र गति से चल रहा था। एकांकीकारों 

ने तत्कालीन राजनीतिक समस्याओं एवं 

गतिविधियों का चित्रण करना तथा देशवासियों 

में देशप्रेम एवं स्वतंत्रता की भावना को प्रबल 

करना अपना महान कर्त्तव्य समझा। श्री भगवती 

चरण वर्मा ने ‘बुझता दीपक’ में राजनीतिक दृष्टि 

से कांग्रेस के उच्च पदाधिकारियों अथवा नेताओं 

के खोखलेपन पर भी व्यंग्यात्मक प्रहार किया 

है। श्री हरिकृष्ण प्रेमी ने अपनी राजनीतिक 

रचनाओं में राष्ट्र के नवनिर्माण, देशभक्तों 

भारतीय नेताओं एवं जनता के स्वतंत्रता प्राप्ति 

हेतु किये जाने वाले कार्यों, हिन्दू-मुस्लिम 

संघर्ष, साम्प्रदायिक एकता की आवश्यकता, 

दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए कृत 

संकल्प देशभक्तों की चारित्रिक महानता आदि 

को चित्रित किया है। इस दृष्टि से इनकी ‘राष्ट्र 

मन्दिर’, ‘मातृ-मन्दिर’, ‘मान-मन्दिर’ तथा ‘न्याय 

मन्दिर आदि उल्लेखनीय रचनाएं हैं। श्री लक्ष्मी 

नारायण मिश्र रचित ‘देश के शत्रु’ शीर्षक 

एकांकी में उन स्वार्थलोलुप व्यक्तियों पर 

व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है जो अपने क्षुद्र 

स्वार्थों की पूर्ति हेतु देश के प्रति अपने कर्त्तव्य 

को भुलाकर देशद्रोही बन बैठे हैं। जगदीश चंद्र 

माथुर रचित ‘भोर का तारा’ शीर्षक एकांकी में 

देशभक्त कवि के महान बलिदान की कहानी है। 

डा. सुधीन्द्र रचित ‘खून की होली’, ‘नया वर्ष’, 

‘नया संदेश’, ‘राखी’, ‘संग्राम’ आदि तथा 

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार रचित ‘कासमोपोलिटन 

क्लबों’ आदि रचनाएँ राजनीतिक भावना से 

ओतप्रोत हैं। इस प्रकार युगीन एकांकीकारों ने 

राजनीतिक भावना से प्रभावित होकर राष्ट्रीयता 

का स्वर अपनी रचनाओं में प्रस्फुटित किया है।

आलोच्य युग में कुछ देशद्रोही वैयक्तिक स्वार्थों 

के कारण ब्रिटिश शासकों का साथ दे रहे थे। 

ऐसे देश-द्रोहियों को देशभक्ति की शिक्षा देने 

की दृष्टि से एकांकीकारों ने ऐतिहासिक पात्रों 

के आदर्श एवं त्यागमय चरित्र को प्रस्तुत करके 

प्राचीन भारतीय गौरव की ओर ध्यान भी 

आकर्षित करवाया। डॉ. वर्मा के ऐतिहासिक 

एकांकियों में ‘चारुमित्रा’, ‘पृथ्वीराज की आँखें’, 

‘दीपदान’, ‘रात का रहस्य’, ‘प्रतिशोध’, ‘राज 

श्री’, आदि प्रमुख हैं। जगदीशचन्द्र माथुर ने 

‘कलिंग विजय’, तथा ‘शारदीया’, शीर्षक 

एकांकियों की रचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर की 

है तथा भारतीय सांस्कृतिक वातावरण का 

प्रभावोत्पादक स्वरूप चित्रित किया है। राष्ट्रीय 

ऐतिहासिक भावना पर ‘सिकन्दर’, ‘जेरुसलम’ 

आदि एकांकियों की रचना करके भुवनेश्वर 

प्रसाद ने अपने देश प्रेम का परिचय दिया है।

हरिकृष्ण प्रेमी रचित ‘मान मन्दिर’, ‘न्याय 

मन्दिर’, ‘मातृ भूमि का मान’, ‘प्रेम अन्धा है’, 

‘रूपशिखा’ आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत 

ऐतिहासिक रचनाएं हैं। श्री यज्ञदत्त शर्मा रचित 

‘प्रतिशोध’ तथा ‘हेलन’ में भारत के गौरवमय 

अतीत की झाँकी प्रस्तुत की गई है। डा. सत्येन्द्र 

रचित ‘कुणाल’, ‘प्रायश्चित, ‘विक्रम का आत्ममेघ’ 

में प्राचीन कथानक लेकर स्वस्थ तथा तार्किक 

विचारधारा का प्रतिपादित किया गया है। 

भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठा, अतीत 

कालीन भारतीय गौरव की महत्ता तथा नागरिकों 

के चारित्रिक बल की अभिवृिद्ध करने वाले 

आदर्श पात्रों की सृष्टि करके लेखक ने राष्ट्रीय 

पुनर्निर्माण में सहयोग प्रदान किया है। 

गिरिजाकुमार माथुर रचित ‘विषपान’, ‘कमल और 

रोटी’, ‘वासवदत्ता’ आदि में देशभक्तिपूर्ण आत्म 

बलिदान तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये 

गये शौर्यपूर्ण कार्यों का चित्रण है। श्री रामवृक्ष 

बेनीपुरी रचित ‘संघमित्रा’, ‘सिंहल विजय’, 

‘नेत्रदान’, ‘तथागत’, आदि इतिहास प्रसिद्ध 

घटनाओं पर आधारित हैं। इस प्रकार स्पष्ट है 

कि प्रसादोत्तर युग में अनेक एकांकीकारों ने 

बहुत बड़ी संख्या में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के 

आधार पर एकांकियों की रचना करके प्राचीन 

भारतीय गौरव को वर्तमान के समक्ष रखा है।

धर्म-प्रधान देश के नागरिक होने के कारण 

भारतीय हिन्दी एकांकीकारों ने अपने एकांकियों 

की रचना धार्मिक आधार पर करने की प्रवृत्ति 

इस युग में भी नहीं छोड़ी। श्री शम्भुदयाल 

सक्सेना ने विशेष रूप से धार्मिक पौराणिक 

प्रसंगों पर आधारित एकांकियों की रचना की है। 

इन्होंने प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक गौरव की 

प्रतिष्ठा करने की दृष्टि से उन गौरवशाली चित्रों 

को उपस्थित किया जिन्होंने भारतीय हिन्दू 

संस्कृति की मर्यादा को बनाये रखा। इनके द्वारा 

रचित ‘सीताहरण’, ‘शिला का उद्धार’, ‘उतराई’, 

‘सोने की मूर्ति’, ‘विदा’, ‘वनपथ’, ‘तापसी’, 

‘पंचवटी’ आदि एकांकी प्रमुख हैं। लगभग सभी 

एकांकियों में हिन्दू संस्कृति की महत्ता भारतीय 

आर्य सभ्यता के उच्चादर्शों, बौद्ध धर्म की भव्यता 

तथा भारतीय नैतिक दृष्टिकोण की श्रेष्ठता के 

स्वरूप का चित्रण किया गया है। डॉ. रामकुमार 

वर्मा ने ‘अन्धकार’ तथा ‘राजरानी सीता’, शीर्षक 

एकांकियों में पाप, पुण्य, प्रेम तथा वासना संबंधी 

प्रश्नों को उठाते हुए यह चित्रित किया है कि 

प्रेम के बिना वासना असम्भव है। लक्ष्मीनारायण 

मिश्र रचित ‘अशोक वन’, शीर्षक एकांकी में 

लेखक ने सीता के आदर्श चरित्र की 

विशेषताओं, पतिव्रत, चारित्रिक बल, तार्किक बुद्ध 

तथा सात्विक प्रवृत्ति की आकर्षक झांकी प्रस्तुत 

करके नीति एवं मर्यादा पर विशेष बल दिया है।

प्रो. सद्गुरुशरण अवस्थी रचित ‘कैकेयी’, 

‘सुदामा’, ‘प्रींद’, ‘शम्बूक’, ‘त्रिशंकु’ आदि 

एकांकियों में प्राचीन पौराणिक एवं धार्मिक पात्रों 

को मौलिक ढंग से नवीन तर्क, विचार, आदर्श 

एवं नैतिक तत्वों सहित प्रस्तुत किया है तथा इन 

पात्रों के माध्यम से प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं 

संस्कृति का गौरव गुणगान किया है। अवस्थी 

जी ने अतीत की व्याख्या आधुनिक तथा नवीन 

दृष्टिकोण से की है।

आलोच्य युग में अनेक एकांकीकारों ने अनेक 

हास्य व्यंग्य प्रधान एकांकियों की रचना करके 

विभिन्न समसामयिक समस्याओं की अभिव्यक्ति 

एवं समाधान प्रस्तुत किया है। इन एकांकीकारों 

ने उन विभिन्न समस्याओं पर व्यंग्यात्मक प्रहार 

किया है। जो सामाजिक, साहित्यिक एवं 

राजनीतिक जीवन के लिए अभिशाप बनी हुई 

थीं। उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ने विशेष रूप से इस 

श्रेणी के एकांकियों की रचना की। इनकी 

‘कइसा साब काइसी बीबी’, ‘जोंक’, ‘पक्का 

गाना’, ‘घपले’ आदि रचनाएँ हास्य व्यंग्य प्रधान 

हैं। भगवती चरण वर्मा रचित ‘दो कलाकार’ 

तथा ‘सबसे बड़ा आदमी’, में हास्यमय वातावरण 

की सृष्टि करते हुए व्यंग्यात्मक प्रहार किये गये 

हैं। गिरिजाकुमार माथुर ‘बरात चढ़े’, ‘मध्यस्थ’, 

‘पिकनिक’, श्री पृथ्वीनाथ शर्मा रचित ‘मुक्ति’ 

तथा डॉ. रामकुमार वर्मा रचित ‘रूप की बीमारी’ 

आदि रचनाएं हास्य व्यंग्य प्रधान हैं।

मनोवैज्ञानिक एकांकी की प्रवृत्ति का जन्म भी 

प्रसादोत्तर युग में हुआ। पाश्चात्य एकांकीकारों 

के प्रभावस्वरूप हिन्दी एकांकीकारों ने भी पात्रों 

के मन की गहराइयों में पहुंचकर उनके 

मनोभावों के चित्रण को परमावश्यक समझा। 

जगदीशचन्द्र माथुर रचित ‘मकड़ी का जाला’ 

शीर्षक एकांकी में अतीत की घटनाओं को स्वप्न 

के माध्यम से चित्रित करते हुए अवचेतन मन की 

ग्रंथियों का अत्यन्त कलात्मक ढंग से चित्रण 

किया है। ‘भुवनेश्वर प्रसाद’ रचित ‘ऊसर’, 

‘प्रतिमा का विवाह’ तथा ‘लाटरी’ आदि 

मनोविश्लेषण प्रधान मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। 

इन रचनाओं पर फ्रायड के मनोविज्ञान का स्पष्ट 

प्रभाव है। श्री शम्भुदयाल सक्सेना रचित ‘जीवन 

धारणी’, ‘नन्दरानी’, ‘पंचवटी’ आदि, 

गिरिजाकुमार माथुर रचित ‘अपराधी’, श्री 

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ रचित ‘छटा बेटा’, ‘भंवर’, 

‘अंधी गली’, ‘मेमना’, ‘सूखी डाली’ आदि 

मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। इन एकांकियों में मन 

की अतृप्त इच्छाओं, महत्वकांक्षाओं तथा मन की 

दबित अनुभूतियों का सजीव चित्रण किया गया 

है।

इस प्रकार, प्रसादोत्तर युग में पहुंचकर, हर दृष्टि 

से एकांकी साहित्य का एक स्वतंत्र अस्तित्व 

परिलक्षित होता है। अनेक पाश्चात्य नाटककारों 

जैसे इब्सन, शॉ, गाल्सवर्दी, चेखव आदि 

एकांकीकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद 

प्रारम्भ हो गया था। इन अंग्रेजी एकांकियों के 

हिन्दी अनुवादों की माँग रेडियो के क्षेत्र में 

अधिक थी। प्रो. अमरनाथ गुप्त ने ए. ए. मिलन 

के एकांकी का हिन्दी अनुवाद किया। कामेश्वर 

भार्गव द्वारा ‘पुजारी’ शीर्षक हिन्दी अनुवाद प्राप्त 

हुआ जो ‘विशप्स कैन्डिलस्टिक्स’ का हिन्दी 

अनुवाद है। इसके अतिरिक्त हैराल्ड व्रिगहाउस 

की रचनाओं के भी हिन्दी अनुवाद हुए। इस 

प्रकार आलोच्य युगीन एकांकीकारों ने विभिन्न 

नवीन प्रयोगों के द्वारा हिन्दी एकांकी साहित्य 

को समृिद्धशाली बनाया।


Monday, February 14, 2022

हिंदी व्याकरण, हिंदी भाषा - के महत्त्व को जानिए



 

हिन्दी एकांकी - का उद्भव और विकास पार्ट-2 - प्रसादोत्तर-युग

हिन्दी एकांकी का उद्भव और विकास 

पार्ट-2

प्रसादोत्तर-युग



प्रसादोत्तर-युग हिन्दी एकांकी के विकास की 

तीसरी अवस्था है जिसका समय सन् 1938 से 

1947 ई. (स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व) तक रहा। 

इसके भी हम दो उप-सोपान मान सकते हैं।

(१) 1938 ई. से 1940 ई. तक और

(२) 1941 ई. से 1947 ई. तक।

प्रथम सोपान अर्थात् इस काल के प्रारम्भिक 

समय में हिन्दी एकांकी में अपने समय की 

विभिन्न समस्याओं एवं परिस्थितियों पर 

तर्क-वितर्क मिलता है। तभी कुछ विचित्र एवं 

क्रांतिकारी परिस्थितियों ने विषय, शैली, और 

दृष्टिकोण को भी नया मोड़ दिया। हिन्दी के 

अनेक एकांकीकार इस समय पाश्चात्य नाट्य 

शैलियों एवं विकसित प्रवृत्तियों से प्रभावित हो 

उनका अनुकरण कर रहे थे। इब्सन, विल्यिम 

आर्चर, बर्नार्ड शॉ आदि ख्याति प्राप्त पाश्चात्य 

लेखकों का प्रभाव हिन्दी एकांकीकारों पर पड़ 

ही रहा था। अतः इस युग के एकांकीकारों ने 

परम्परागत एकांकी-तत्त्वों का निर्वाह करने के 

साथ-साथ अभिनव शिल्प-रूपों को भी स्थान 

दिया तथा विषय की दृष्टि से एकांकी को मात्र 

मनोरंजन की वस्तु न बनाकर उसमें मानव 

जीवन की सामयिक समस्याओं एवं विरूपताओं 

का चित्रण प्रारम्भ कर दिया। अर्थात् इस समय 

हिन्दी एकांकी आदर्शवाद के एकांगी घेरे से 

निकल कर यथार्थवाद की ओर बढ़ा। सन् 1940 

से 1947 तक का समय भारत के लिए आपत्तियों 

का समय था। युद्ध की विभीषिकाएं, बंगाल का 

अकाल, आजादी की हुंकार, विदेशी शासकों के 

लोमहर्षक अत्याचार, चोर बाजारी आदि इन्हीं 

सात वर्षों के भीतर की ही बातें हैं। इन सबने 

हमारे चिन्तन और हमारी कला को प्रभावित 

किया। एकांकी भी इनसे अछूता नहीं रह सका। 

कृत्रिमता की बजाय स्वाभाविक और सहज जीवन 

को प्रतिबिम्बित करने वाले एकांकी की रचना 

प्रारम्भ हुई। इन एकांकियों में नाटकीय अभिनय 

के स्थान पर सरल अभिनयात्मक संकेत दिये 

जाने लगे। इसमें परम्परागत रंगमंच-विधान 

सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया और उससे 

सहजता, सरलता, स्वाभाविकता एवं यथार्थ के 

दर्शन होने लगे। शिल्प विधान के अनावश्यक 

आडम्बर बन्धन से इस युग का एकांकी साहित्य 

मुक्त हो गया। संकलन त्रय को वस्तुतः इसी 

समय एकांकी का अनिवार्य अंग माना जाने 

लगा। अब एकांकी केवल साहित्यिक विधा ही न 

रह गयी अपितु इस युग में रंगमंच की स्थापना 

के साथ उसके स्वरूप में भी अन्तर परिलक्षित 

हुआ। इस समय तक ‘हंस’ तथा ‘विश्वमित्र’ 

आदि पत्रिकाओं में एकांकी नाटक एकांकी के 

नाम से प्रकाशित होने प्रारम्भ हो गये तथा 

इनकी प्रारम्भिक भूमिकाओं में एकांकी के शिल्प 

आदि पर विचार प्रस्तुत किये जाने लगे। जिस 

प्रकार भारतेन्दु-युग और प्रसाद-युग में हिन्दी 

एकांकी की विविध प्रवृत्तियाँ उभरी थीं उसी 

प्रकार प्रसादोत्तर युग में भी हिन्दी एकांकी की 

विविध प्रवृत्तियां परिलक्षित होती हैं। वास्तव में 

प्रस्तुत युग में भी पूर्वयुगीन प्रवृत्तियों को ही 

आधार बनाकर एकांकियों की रचना हुई किन्तु 

उनको आदर्शवाद के स्थान पर यथार्थवादी 

आधारभूमि पर निर्मित किया गया।

प्रसादोत्तर युग में यद्यपि एकांकी की अनेक 

प्रवृत्तियों को प्रश्रय मिला है तथापि सामाजिक 

एकांकी की प्रवृत्ति पर लगभग सभी युगीन 

एकांकीकारों ने अपनी लेखनी चलाई। प्रस्तुत 

युग के प्रमुख एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा ने 

तो अनेक सामाजिक समस्या प्रधान एकांकियों 

की रचना करके हिन्दी एकांकी साहित्य को 

बहुमूल्य धरोहर प्रदान की है। इन्होंने जीवन की 

वास्तविकता को अपने एकांकियों का आधार 

बनाया। इस दृष्टि से इनके ‘एक तोले अफीम 

की कीमत’, ‘अठारह जुलाई की शाम’, ‘दस 

मिनट’, ‘स्वर्ग का कमरा’, ‘जवानी की डिब्बी’, 

‘आंखों का आकाश’, ‘रंगीन स्वप्न’, आदि 

एकांकी सामाजिक एकांकी की प्रवृत्ति का 

प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्मा जी के समान 

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ का ध्यान भी विविध वैयक्तिक, 

पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं की ओर 

गया। इनकी एकांकी रचनाओं में ‘चरवाहे’, 

‘चिलमन’, ‘लक्ष्मी का स्वागत’, ‘पहेली’, ‘सूखी 

डाली’, ‘अन्धी गली’, ‘तूफान से पहले’, आदि 

सामाजिक दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय 

हैं। इनमें लेखक ने युगीन सामाजिक रूढ़ियों, 

परम्पराओं, विरूपताओं विकृतियों, एवं 

अज्ञानताओं का बड़ा ही प्रभावोत्पादक किन्तु 

व्यंग्यात्मक चित्र उपस्थित किया है। युगीन 

एकांकीकार भुवनेश्वर-रचित ‘श्यामा एक 

वैवाहिक विडम्बना’, ‘स्ट्राइक’, ‘एक साम्यहीन 

साम्यवादी’ तथा ‘प्रतिमा का विवाह’ आदि प्रसिद्ध 

हैं। इसमें सामाजिक बाह्याडम्बर, स्त्री-पुरुष 

सम्बन्ध, यौन विषयक समस्याओं एवं प्राचीन 

अप्रगतिशील मान्यताओं का चित्रण किया गया है 

जो मानव जीवन के विकास पथ को अवरुद्ध 

किए हैं। श्री जगदीश चंद्र माथुर का दृष्टिकोण 

भी सामाजिक जीवन की समस्याओं के प्रति 

स्वस्थ एवं उदार रहा है। वे उन एकांकियों को 

सफल नहीं मानते जो समाज से निरपेक्ष होकर 

मात्र साहित्यिक विधा बनकर रह जाते हैं। 

उन्होंने ‘ओ मेरे सपने’ के पूर्व निवेदन में लिखा 

है कि ‘कौन ऐसा लेखक होगा कि जिसकी 

कलम पर सामाजिक समस्याएँ सवार न होती हों 

अनजाने ही या डंके की चोट के साथ?’ इस 

विचार के अनुसार उनके ‘मेरी बाँसुरी’, ‘खिड़की 

की राह’, ‘कबूतर खाना’, ‘भोर का तारा’, 

‘खंडहर’, आदि एकांकी उल्लेखनीय हैं। इनमें 

सामाजिक बन्धनों के प्रति तीव्र विद्रोही भावना 

व्यक्त हुई है। श्री शम्भुदयाल सक्सेना रचित 

‘कन्यादान’, ‘नेहरू के बाद’, ‘मुर्दाे का व्यापार’, 

‘नया समाज’, ‘नया हल नया खेत’, ‘सगाई’, 

‘मृत्युदान’ आदि एकांकी सामाजिक समस्याओं 

को प्रस्तुत करते हैं। सक्सेना जी पर गाँधीवादी 

जीवन का प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है। यही 

कारण है कि इनकी रचनाओं में सादा जीवन का 

महत्त्व, मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा, 

नैतिक उन्नयन के प्रति आग्रह, बाह्याडम्बर के 

प्रति घृणा एवं कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता के 

दर्शन होते हैं। हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘बादलों के 

पार’, ‘वाणी मन्दिर’, ‘सेवा मन्दिर’, ‘घर या 

होटल’, ‘निष्ठुर न्याय’ आदि एकांकी रचनाओं में 

विविध सामाजिक समस्याओं का अंकन किया है 

जिनमें विधवा समस्या, ‘नारी की आधुनिकता’, 

वर्ग वैषम्य, जातीय बन्धन की संकीर्णता, प्राचीन 

परम्पराओं एवं मान्यताओं की अर्थहीनता, पुरुष 

की वासना, लोलुपता एवं दुश्चरित्रता आदि का 

चित्रण प्रमुख रूप के किया है। भगवतीचरण 

वर्मा कृत ‘मैं और केवल मैं’, ‘चौपाल में’ तथा 

‘बुझता दीपक’, में पीड़ित मानव की अन्तर्वेदना 

का करुण स्वर उभर कर सामने आया है। श्री 

रामवृक्ष बेनीपुरी रचित ‘नया समाज’, ‘अमर 

ज्योति’, तथा ‘गाँव का देवता’ आदि रचनाएं 

सामाजिक समस्या प्रधान हैं। श्री सद्गुरुशरण 

अवस्थी ने भारतीय संस्कृति के आदर्शों को 

उपयुक्त एवं उचित तर्काे की कसौटी पर कसकर 

उनको समाज के लिए उपयोगी सिद्ध किया 

जिनमें बुद्ध, तर्क एवं विवेक का प्राधान्य है। इस 

दृष्टि से ‘हाँ में नहीं का रहस्य’, ‘खद्दर’, ‘वे 

दोनों’ आदि विशेष महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। इनके 

अतिरिक्त चन्द्रगुप्त विद्यालंकार रचित ‘प्यास’ 

तथा ‘दीनू’, श्री यज्ञदत्त शर्मा कृत ‘छोटी-बात’, 

‘साथ’, ‘दुविधा’, एस.सी. खत्री रचित,‘बन्दर की 

खोपड़ी’, ‘प्यारे सपने’, श्री सज्जाद जहीर रचित 

‘बीमार’ आदि रचनाओं में सामाजिक जीवन के 

सत्य को उभारते हुए और उनका सर्वपक्षीय 

चित्रण किया गया है।

प्रसादोत्तर युग राजनीतिक क्रांति का युग था। 

गाँधी जी का प्रभाव राजनीतिक जीवन में विशेष 

रूप से पड़ रहा था। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार 

का दमन चक्र भी राजनीतिक क्रांति को कुचलने 

के लिए तीव्र गति से चल रहा था। एकांकीकारों 

ने तत्कालीन राजनीतिक समस्याओं एवं 

गतिविधियों का चित्रण करना तथा देशवासियों 

में देशप्रेम एवं स्वतंत्रता की भावना को प्रबल 

करना अपना महान कर्त्तव्य समझा। श्री भगवती 

चरण वर्मा ने ‘बुझता दीपक’ में राजनीतिक दृष्टि 

से कांग्रेस के उच्च पदाधिकारियों अथवा नेताओं 

के खोखलेपन पर भी व्यंग्यात्मक प्रहार किया 

है। श्री हरिकृष्ण प्रेमी ने अपनी राजनीतिक 

रचनाओं में राष्ट्र के नवनिर्माण, देशभक्तों 

भारतीय नेताओं एवं जनता के स्वतंत्रता प्राप्ति 

हेतु किये जाने वाले कार्यों, हिन्दू-मुस्लिम 

संघर्ष, साम्प्रदायिक एकता की आवश्यकता, 

दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए कृत 

संकल्प देशभक्तों की चारित्रिक महानता आदि 

को चित्रित किया है। इस दृष्टि से इनकी ‘राष्ट्र 

मन्दिर’, ‘मातृ-मन्दिर’, ‘मान-मन्दिर’ तथा ‘न्याय 

मन्दिर आदि उल्लेखनीय रचनाएं हैं। श्री लक्ष्मी 

नारायण मिश्र रचित ‘देश के शत्रु’ शीर्षक 

एकांकी में उन स्वार्थलोलुप व्यक्तियों पर 

व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है जो अपने क्षुद्र 

स्वार्थों की पूर्ति हेतु देश के प्रति अपने कर्त्तव्य 

को भुलाकर देशद्रोही बन बैठे हैं। जगदीश चंद्र 

माथुर रचित ‘भोर का तारा’ शीर्षक एकांकी में 

देशभक्त कवि के महान बलिदान की कहानी है। 

डा. सुधीन्द्र रचित ‘खून की होली’, ‘नया वर्ष’, 

‘नया संदेश’, ‘राखी’, ‘संग्राम’ आदि तथा 

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार रचित ‘कासमोपोलिटन 

क्लबों’ आदि रचनाएँ राजनीतिक भावना से 

ओतप्रोत हैं। इस प्रकार युगीन एकांकीकारों ने 

राजनीतिक भावना से प्रभावित होकर राष्ट्रीयता 

का स्वर अपनी रचनाओं में प्रस्फुटित किया है।

आलोच्य युग में कुछ देशद्रोही वैयक्तिक स्वार्थों 

के कारण ब्रिटिश शासकों का साथ दे रहे थे। 

ऐसे देश-द्रोहियों को देशभक्ति की शिक्षा देने 

की दृष्टि से एकांकीकारों ने ऐतिहासिक पात्रों 

के आदर्श एवं त्यागमय चरित्र को प्रस्तुत करके 

प्राचीन भारतीय गौरव की ओर ध्यान भी 

आकर्षित करवाया। डॉ. वर्मा के ऐतिहासिक 

एकांकियों में ‘चारुमित्रा’, ‘पृथ्वीराज की आँखें’, 

‘दीपदान’, ‘रात का रहस्य’, ‘प्रतिशोध’, ‘राज 

श्री’, आदि प्रमुख हैं। जगदीशचन्द्र माथुर ने 

‘कलिंग विजय’, तथा ‘शारदीया’, शीर्षक 

एकांकियों की रचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर की 

है तथा भारतीय सांस्कृतिक वातावरण का 

प्रभावोत्पादक स्वरूप चित्रित किया है। राष्ट्रीय 

ऐतिहासिक भावना पर ‘सिकन्दर’, ‘जेरुसलम’ 

आदि एकांकियों की रचना करके भुवनेश्वर 

प्रसाद ने अपने देश प्रेम का परिचय दिया है।

हरिकृष्ण प्रेमी रचित ‘मान मन्दिर’, ‘न्याय 

मन्दिर’, ‘मातृ भूमि का मान’, ‘प्रेम अन्धा है’, 

‘रूपशिखा’ आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत 

ऐतिहासिक रचनाएं हैं। श्री यज्ञदत्त शर्मा रचित 

‘प्रतिशोध’ तथा ‘हेलन’ में भारत के गौरवमय 

अतीत की झाँकी प्रस्तुत की गई है। डा. सत्येन्द्र 

रचित ‘कुणाल’, ‘प्रायश्चित, ‘विक्रम का आत्ममेघ’ 

में प्राचीन कथानक लेकर स्वस्थ तथा तार्किक 

विचारधारा का प्रतिपादित किया गया है। 

भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठा, अतीत 

कालीन भारतीय गौरव की महत्ता तथा नागरिकों 

के चारित्रिक बल की अभिवृिद्ध करने वाले 

आदर्श पात्रों की सृष्टि करके लेखक ने राष्ट्रीय 

पुनर्निर्माण में सहयोग प्रदान किया है। 

गिरिजाकुमार माथुर रचित ‘विषपान’, ‘कमल और 

रोटी’, ‘वासवदत्ता’ आदि में देशभक्तिपूर्ण आत्म 

बलिदान तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये 

गये शौर्यपूर्ण कार्यों का चित्रण है। श्री रामवृक्ष 

बेनीपुरी रचित ‘संघमित्रा’, ‘सिंहल विजय’, 

‘नेत्रदान’, ‘तथागत’, आदि इतिहास प्रसिद्ध 

घटनाओं पर आधारित हैं। इस प्रकार स्पष्ट है 

कि प्रसादोत्तर युग में अनेक एकांकीकारों ने 

बहुत बड़ी संख्या में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के 

आधार पर एकांकियों की रचना करके प्राचीन 

भारतीय गौरव को वर्तमान के समक्ष रखा है।

धर्म-प्रधान देश के नागरिक होने के कारण 

भारतीय हिन्दी एकांकीकारों ने अपने एकांकियों 

की रचना धार्मिक आधार पर करने की प्रवृत्ति 

इस युग में भी नहीं छोड़ी। श्री शम्भुदयाल 

सक्सेना ने विशेष रूप से धार्मिक पौराणिक 

प्रसंगों पर आधारित एकांकियों की रचना की है। 

इन्होंने प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक गौरव की 

प्रतिष्ठा करने की दृष्टि से उन गौरवशाली चित्रों 

को उपस्थित किया जिन्होंने भारतीय हिन्दू 

संस्कृति की मर्यादा को बनाये रखा। इनके द्वारा 

रचित ‘सीताहरण’, ‘शिला का उद्धार’, ‘उतराई’, 

‘सोने की मूर्ति’, ‘विदा’, ‘वनपथ’, ‘तापसी’, 

‘पंचवटी’ आदि एकांकी प्रमुख हैं। लगभग सभी 

एकांकियों में हिन्दू संस्कृति की महत्ता भारतीय 

आर्य सभ्यता के उच्चादर्शों, बौद्ध धर्म की भव्यता 

तथा भारतीय नैतिक दृष्टिकोण की श्रेष्ठता के 

स्वरूप का चित्रण किया गया है। डॉ. रामकुमार 

वर्मा ने ‘अन्धकार’ तथा ‘राजरानी सीता’, शीर्षक 

एकांकियों में पाप, पुण्य, प्रेम तथा वासना संबंधी 

प्रश्नों को उठाते हुए यह चित्रित किया है कि 

प्रेम के बिना वासना असम्भव है। लक्ष्मीनारायण 

मिश्र रचित ‘अशोक वन’, शीर्षक एकांकी में 

लेखक ने सीता के आदर्श चरित्र की 

विशेषताओं, पतिव्रत, चारित्रिक बल, तार्किक बुद्ध 

तथा सात्विक प्रवृत्ति की आकर्षक झांकी प्रस्तुत 

करके नीति एवं मर्यादा पर विशेष बल दिया है।

प्रो. सद्गुरुशरण अवस्थी रचित ‘कैकेयी’, 

‘सुदामा’, ‘प्रींद’, ‘शम्बूक’, ‘त्रिशंकु’ आदि 

एकांकियों में प्राचीन पौराणिक एवं धार्मिक पात्रों 

को मौलिक ढंग से नवीन तर्क, विचार, आदर्श 

एवं नैतिक तत्वों सहित प्रस्तुत किया है तथा इन 

पात्रों के माध्यम से प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं 

संस्कृति का गौरव गुणगान किया है। अवस्थी 

जी ने अतीत की व्याख्या आधुनिक तथा नवीन 

दृष्टिकोण से की है।

आलोच्य युग में अनेक एकांकीकारों ने अनेक 

हास्य व्यंग्य प्रधान एकांकियों की रचना करके 

विभिन्न समसामयिक समस्याओं की अभिव्यक्ति 

एवं समाधान प्रस्तुत किया है। इन एकांकीकारों 

ने उन विभिन्न समस्याओं पर व्यंग्यात्मक प्रहार 

किया है। जो सामाजिक, साहित्यिक एवं 

राजनीतिक जीवन के लिए अभिशाप बनी हुई 

थीं। उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ने विशेष रूप से इस 

श्रेणी के एकांकियों की रचना की। इनकी 

‘कइसा साब काइसी बीबी’, ‘जोंक’, ‘पक्का 

गाना’, ‘घपले’ आदि रचनाएँ हास्य व्यंग्य प्रधान 

हैं। भगवती चरण वर्मा रचित ‘दो कलाकार’ 

तथा ‘सबसे बड़ा आदमी’, में हास्यमय वातावरण 

की सृष्टि करते हुए व्यंग्यात्मक प्रहार किये गये 

हैं। गिरिजाकुमार माथुर ‘बरात चढ़े’, ‘मध्यस्थ’, 

‘पिकनिक’, श्री पृथ्वीनाथ शर्मा रचित ‘मुक्ति’ 

तथा डॉ. रामकुमार वर्मा रचित ‘रूप की बीमारी’ 

आदि रचनाएं हास्य व्यंग्य प्रधान हैं।

मनोवैज्ञानिक एकांकी की प्रवृत्ति का जन्म भी 

प्रसादोत्तर युग में हुआ। पाश्चात्य एकांकीकारों 

के प्रभावस्वरूप हिन्दी एकांकीकारों ने भी पात्रों 

के मन की गहराइयों में पहुंचकर उनके 

मनोभावों के चित्रण को परमावश्यक समझा। 

जगदीशचन्द्र माथुर रचित ‘मकड़ी का जाला’ 

शीर्षक एकांकी में अतीत की घटनाओं को स्वप्न 

के माध्यम से चित्रित करते हुए अवचेतन मन की 

ग्रंथियों का अत्यन्त कलात्मक ढंग से चित्रण 

किया है। ‘भुवनेश्वर प्रसाद’ रचित ‘ऊसर’, 

‘प्रतिमा का विवाह’ तथा ‘लाटरी’ आदि 

मनोविश्लेषण प्रधान मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। 

इन रचनाओं पर फ्रायड के मनोविज्ञान का स्पष्ट 

प्रभाव है। श्री शम्भुदयाल सक्सेना रचित ‘जीवन 

धारणी’, ‘नन्दरानी’, ‘पंचवटी’ आदि, 

गिरिजाकुमार माथुर रचित ‘अपराधी’, श्री 

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ रचित ‘छटा बेटा’, ‘भंवर’, 

‘अंधी गली’, ‘मेमना’, ‘सूखी डाली’ आदि 

मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। इन एकांकियों में मन 

की अतृप्त इच्छाओं, महत्वकांक्षाओं तथा मन की 

दबित अनुभूतियों का सजीव चित्रण किया गया 

है।

इस प्रकार, प्रसादोत्तर युग में पहुंचकर, हर दृष्टि 

से एकांकी साहित्य का एक स्वतंत्र अस्तित्व 

परिलक्षित होता है। अनेक पाश्चात्य नाटककारों 

जैसे इब्सन, शॉ, गाल्सवर्दी, चेखव आदि 

एकांकीकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद 

प्रारम्भ हो गया था। इन अंग्रेजी एकांकियों के 

हिन्दी अनुवादों की माँग रेडियो के क्षेत्र में 

अधिक थी। प्रो. अमरनाथ गुप्त ने ए. ए. मिलन 

के एकांकी का हिन्दी अनुवाद किया। कामेश्वर 

भार्गव द्वारा ‘पुजारी’ शीर्षक हिन्दी अनुवाद प्राप्त 

हुआ जो ‘विशप्स कैन्डिलस्टिक्स’ का हिन्दी 

अनुवाद है। इसके अतिरिक्त हैराल्ड व्रिगहाउस 

की रचनाओं के भी हिन्दी अनुवाद हुए। इस 

प्रकार आलोच्य युगीन एकांकीकारों ने विभिन्न 

नवीन प्रयोगों के द्वारा हिन्दी एकांकी साहित्य 

को समृिद्धशाली बनाया।


एकांकी - हिन्दी एकांकी का उद्भव और विकास पार्ट-1

एकांकी

हिन्दी एकांकी का उद्भव और विकास

पार्ट-1



आधुनिक हिन्दी साहित्य की जिन गद्यात्मक 

विधाओं का विकास विगत एक शताब्दी में हुआ 

है, उनमें एकांकी का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। 

किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से, हिन्दी-साहित्य में 

इसका उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम 

चतुर्थांश में माना जाता है। यदि इसके 

संवादात्मक स्वरूप एवं एक नाट्य विधा के 

अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाय तो 

इसके सूत्र हमें अत्यन्त प्राचीन समय से मिलने 

लगते हैं।

आधुनिक एकांकी वैज्ञानिक युग की देन है। 

विज्ञान के फलस्वरूप मानव के समय और शक्ति 

की बचत हुई है। फिर भी जीवन संघर्ष में मानव 

की दौड़-धूप अव्याहत जारी है। जीवन की 

त्रस्तता और व्यस्तता के कारण आधुनिक मानव 

के पास इतना समय नहीं है कि वह बड़े-बड़े 

नाटकों, उपन्यासों, महाकाव्यों आदि का 

सम्पूर्णतः रसास्वादन कर सके और इसलिए 

गीत, कहानी, एकांकी आदि साहित्य के लघुरूपों 

को अपनाया जा रहा है। किन्तु एकांकी की 

लोकप्रियता का एकमात्र कारण समयाभाव ही 

नहीं है। भोलानाथ तिवारी के शब्दों में ‘‘यह 

नहीं कहा जा सकता कि चूंकि हमारे पास 

बड़ी-बड़ी साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के लिए 

समय नहीं है, इसलिए हम गीत, कहानी, एकांकी 

आदि पढ़ते हैं। बात यह है कि हम जीवन की 

महत्त्वपूर्ण घटनाओं और समस्याओं आदि को 

क्रमबद्ध एवं समग्र रूप से भी अभिव्यक्त देखना 

चाहते हैं और उन अभिव्यक्तियों का स्वागत 

करते हैं मगर साथ ही साथ किसी एक 

महत्त्वपूर्ण भावना, किसी एक उद्दीप्त क्षण, किसी 

एक असाधारण एवं प्रभावशाली घटना या 

घटनांश की अभिव्यक्ति का भी स्वागत करते हैं। 

हम कभी अनगिन फूलों से सुसज्जित सलोनी 

वाटिका पसन्द करते हैं और कभी भीनी सुगन्धि 

देने वाली खिलने को तैयार नन्हीं सी कली का। 

दोनों बातें हैं, दो रुचियाँ हैं, दो पृथक किन्तु 

समान रूप से महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण हैं, समय के 

अभाव या अधिकता की इसमें कोई बात नहीं।’’

इस प्रकार, समयाभाव के अतिरिक्त एकांकी की 

लोकप्रियता के अन्य भी कई कारण हैं यथा देश 

में सिनेमा के बढ़ते हुए प्रभाव के विरुद्ध हिन्दी 

रंगमंच के उद्धार द्वारा जीवन और साहित्य में 

सुरुचि का समावेश करना, रेडियो से हिन्दी 

एकांकियों की मांग, केन्द्रीय सरकार के 

शिक्षा-विभाग की ओर से आयोजित ‘यूथ 

फेस्टीवल’ में एकांकी नाटक का भी प्रतियोगिता 

का एक विषय होना, विश्वविद्यालयों में विशेष 

अवसरों पर एकांकी नाटकों का अभिनय आदि। 

इन सब कारणों के परिणामस्वरूप एकांकी 

नाटक आज एक प्रमुख साहित्यिक विधा बन 

गया है।

एकांकी ने नाटक से भिन्न अपना स्वतंत्र स्वरूप 

प्रतिष्ठित कर लिया है। एकांकी बड़े नाटक की 

अपेक्षा छोटा अवश्य होता है परन्तु वह उसका 

संक्षिप्त रूप नहीं है। बड़े नाटक में जीवन की 

विविधरूपता, अनेक पात्र, कथा का साँगोपांग 

विस्तार, चरित्र-चित्रण की विविधता, कुतूहल की 

अनिश्चित स्थिति, वर्णनात्मकता की अधिकता, 

चरम सीमा तक विकास तथा घटना-विस्तार 

आदि के कारण कथानक की गति मन्द होती है 

जबकि एकांकी में, इसके विपरीत, जीवन की 

एकरूपता, कथा में अनावश्यक विस्तार की 

उपेक्षा, चरित्र-चित्रण की तीव्र और संक्षिप्त 

रूप-रेखा, कुतूहल की स्थिति, प्रारम्भ से ही 

व्यंजकता की अधिकता और प्रभावशीलता, चरम 

सीमा तक निश्चित बिन्दु में केन्द्रीयकरण तथा 

घटना-न्यूनता आदि के कारण कथानक की गति 

क्षिप्र होती है। सद्गुरुशरण अवस्थी का कथन है 

कि ‘‘जीवन की वास्तविकता के एक स्फुलिंग को 

पकड़कर एकांकीकार उसे ऐसा प्रभावपूर्ण बना 

देता है कि मानवता के समूचे भाव जगत् को 

झनझना देने की शक्ति उसमें आ जाती है।’’

ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी-एकांकी के 

विकास-क्रम को निम्नलिखित प्रमुख 

काल-खण्डों में विभाजित किया जा सकता है।

(१) भारतेन्दु-द्विवेदी युग (1875-1928)

(२) प्रसाद-युग (1929-37)

(३) प्रसादोत्तर-युग (1938-47)

(४) स्वातंत्रयोत्तर-युग (1948 से अब तक)

वास्तव में प्रारम्भिक एकांकी-प्रयोगों में भी 

भटकती हुई नाट्य-दृष्टि ही प्रमुखता से 

उभरकर सामने आई है किन्तु विकास की दृष्टि 

से उन्हें नकारा नहीं जा सकता।

1 भारतेन्दु-द्विवेदी युग

हिन्दी का प्रथम एकांकी कौनसा है, इस बात में 

विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान जयषंकर 

प्रसाद के ‘एक घूंट’-1929, को प्रथम एकांकी 

मानते हैं। जबकि कुछ लोग रामकुमार वर्मा के 

‘बादल की मृत्यु‘-1930, को हिन्दी का प्रथम 

एकांकी मानते हैं। जिस प्रकार भारतेन्दु हिन्दी 

में अनेकांकी नाटकों के लिखने वालों में प्रथम 

नाटककार माने जाते हैं। उसी प्रकार हिन्दी में 

सबसे पहला एकांकी भी उन्होंने ही लिखा। 

यद्यपि इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद अवश्य 

है। फिर भी कुछ विद्वान भारतेन्दु-प्रणीत 

‘प्रेमयोगिनी’ (1875 ई.) से हिन्दी एकांकी का 

प्रारम्भ मानते हैं। आलोच्य युग में विषयगत  

दृष्टिकोण को सामने रखकर सामाजिक, 

राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक 

प्रवृत्तियाँ उभरीं। समाज में प्रचलित प्राचीन 

परम्पराओं, कुप्रथाओं एवं स्वस्थ सामाजिक 

विकास में बाधक रीति-रिवाजों को दूर करने 

का प्रयास उन सामाजिक समस्या-प्रधान 

रचनाओं के माध्यम से किया गया। इन 

एकांकीकारों ने जहाँ सामाजिक कुरीतियों पर 

हास्य एवं व्यंग्यपूर्ण प्रहार किये वहीं सामाजिक 

नवनिर्माण के लिए भी समाज को प्रेरित एवं 

जाग्रत किया। इन रचनाओं के पात्र भारतीय 

जन-जीवन के जीवित एवं सजीव पात्र हैं 

जिनके संवादों द्वारा भारतीय भद्र जीवन में 

प्रविष्ट पाखण्ड एवं व्यभिचार का भण्डाफोड़ 

होता है। इस दृष्टि से भारतेन्दु-रचित 

‘भारत-दुर्दशा’, प्रतापनारायण मिश्र रचित ‘कलि 

कौतुक रूपक’, श्री शरण-रचित ‘बाल-विवाह’, 

किशोरीलाल गोस्वामी-रचित ‘चौपट चपेट’, 

राधाचरण गोस्वामी-रचित ‘भारत में यवन लोक’, 

‘बूढ़े मुंह मुहासे’ आदि महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं 

जिनमें धार्मिक पाखण्ड, सामाजिक रूढ़ियों एवं 

कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किये गये हैं। 

देवकीनन्दन रचित ‘कलियुगी उनेऊ’, ‘कलियुग 

विवाह’, राधाकृष्णदास रचित ‘दुखिनी बाला’, 

काशीनाथ खत्री रचित ‘बाल विधवा’ आदि 

रचनाएं भारतीय नारी के त्रस्त विवाहित जीवन 

का यथार्थ चित्रण हैं। सामाजिक भ्रष्टाचार का 

चित्रण कातिक प्रसाद खत्री-रचित ‘रेल का 

विकट खेल’ में मिलता है। जिसमें रेलवे विभाग 

में रिश्वत लेने वालों का भण्डा-फोड़ किया गया 

है। समाज सुधार की परम्परा के पोषक इन 

एकांकीकारों के प्रयास के फलस्वरूप भारतीय 

समाज का यथार्थ चित्रण समाज के समक्ष 

उपस्थित हुआ तथा इन्हीं के द्वारा जन सामान्य 

को नवीन एवं प्रगतिशील विचारों को ग्रहण 

करने की प्रेरणा भी मिली। इन्हीं के प्रयासों का 

परिणाम था कि भारतीय जनता समाज में 

प्रचलित रूढ़ियों एवं परम्पराओं के प्रति घृणाभाव 

से भर उठी तथा उनके उन्मूलन के लिए कृत 

संकल्प हो गयी।

इस प्रकार भारतेन्दु युग नवचेतना और जागृति 

का युग था। देशभक्ति और राष्ट्रीयता का उन्मेष 

होने से इस काल के एकांकीकारों ने 

जन-जागृति के विचारों को मुखरित करने वाले 

नाटक लिखे। जिनमें भारत की तत्कालीन 

दुर्दशा, पराधीनता पर क्षोभ, अतीत की स्मृति, 

राष्ट्र में आत्म गौरव की भावना का जागरण, 

राष्ट्रहित, आशा-निराशा का द्वन्द्व, उज्ज्वल 

भविष्य आदि का चित्रण किया गया है। इस युग 

में सामाजिक नवजागरण के साथ-साथ 

राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने का प्रयत्न भी 

किया गया है। इस सम्बन्ध में भारतेन्दु-कृत 

‘भारत दुर्दशा’ एवं ‘भारत-जननी’, राधाकृष्ण 

गोस्वामी-कृत ‘भारत माता’ और ‘अमरसिंह 

राठौर’, राधाकृष्ण दास-कृत ‘महारानी 

पद्मावती’, रामकृष्ण वर्मा-कृत ‘पद्मावती’ ‘दीर 

नारी’ आदि उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु-कालीन 

एकांकियों की धार्मिक पौराणिक धाराके अन्तर्गत 

वे एकांकी आते हैं, जिनमें धार्मिक कथानकों के 

आधार पर भारतीय संस्कृति का आदर्श रूप 

प्रस्तुत किया गया है। इस क्षेत्र में भारतेन्दु जी 

के ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ और ‘धनंजय’, लाला 

श्रीनिवासदास का ‘प्रींद चरित्र’, बदरीनारायण 

प्रेमघन का ‘प्रयाग राजा-गमन’, राधाचरण 

गोस्वामी का ‘श्रीदामा’ और ‘सती चन्द्रवली’ 

बालकृष्ण भट्ट का ‘दमयन्ती स्वयंवर’, जैनेन्द्र 

किशोर का ‘सोमावती’ अथवा ‘धर्मवती’, कार्तिक 

प्रसाद का ‘ऊषाहरण’, ‘गंगोत्तरी’, ‘द्रोपदी चीर 

हरण’ और ‘निस्सहाय हिन्दू’, मोहनलाल 

विष्णुलाल पाण्डया का ‘प्रींद’, खड्गबहादुर मल्ल 

का ‘हरतालिका’ आदि में धार्मिक कथानकों पर 

आधारित पौराणिक एकांकियों के माध्यम से 

सांस्कृतिक आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया 

गया।

आलोच्य युग में हास्यव्यंग्य-प्रधानएकांकी 

सर्वाधिक लिखे गए जो प्रहसन की श्रेणी में आते 

हैं। ये प्रहसन धार्मिक और सामाजिक दोनों 

प्रकार के विषयों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। 

इन प्रहसनों पर पारसी रंगमंच का सर्वाधिक 

प्रभाव है इसलिए उच्चकोटि का हास्य एवं व्यंग्य 

इनमें नहीं मिलता। फिर भी सामाजिक क्षेत्र में 

बाल-विवाह, अनमेल विवाह, वेश्यागमन, मद्यपान, 

विलासप्रियता आदि पर व्यंग्य किया गया है और 

धार्मिक क्षेत्र में धार्मिक संकीर्णता और उसकी 

आड़ में किया पाखण्ड, पंडागिरी, कर्मकाण्ड, 

ज्योतिषियों की धोखेबाजी आदि पर आक्षेप किए 

गए हैं। इस प्रकार के एकांकियों में कमलाचरण 

मिश्र का ‘अद्भुत नाटक’, श्री जगन्नाथ का ‘वर्ण 

व्यवस्था’, माधोप्रसाद का ‘वैसाखनन्दन’, 

घनश्यामदास का ‘वृद्धावस्था-विवाह’, दुर्गाप्रसाद 

मिश्र का ‘प्रभात मिलन’, अम्बिकादत्त व्यास का 

‘गौ-संकट’ और ‘मन की उमंग’, देवकीनन्दन 

त्रिपाठी का ‘जय नरसिंह की’, ‘सैकड़ों में 

दस-दस’, ‘कलयुगी जनेऊ’, ‘कलियुगी विवाह’, 

‘एक एक के तीन तीन’, ‘बैल छः टके का’, 

‘वेश्याविलास’ आदि, बालकृष्ण का ‘शिक्षादान’, 

खघगबहादुर मल्ल का ‘भारत-आरत’ आदि 

उल्लेखनीय हैं।

उपर्युक्त रचनाओं में से कुछ का उल्लेख नाटक 

के अन्तर्गत भी किया जाता है। वास्तव में ये 

एक अंक के नाटक ही हैं। एकांकी की परम्परा 

में आते हुए भी इन्हें सभी दृष्टियों से पूर्ण 

‘एकांकी’ नहीं कहा जा सकता। इनमें एकांकी 

के कुछ तत्त्व अवश्य ढूँढ़े जा सकते हैं।

कुल मिलाकर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा 

कि उस काल के एकांकी-साहित्य को प्रेरित 

करने वाली कई नाट्य शैलियाँ थीं। 

(क) संस्कृत की नाट्य परम्परा 

(ख) अंग्रेजी, बंगला, पारसी रंगमंच 

(ग) लोक नाटक। 

आलोच्य युग के सभी एकांकीकारों ने इन्हें 

आत्मसात् किया। इस प्रकार इस युग में परम्परा 

के प्रभाव की प्रधानता रही। नए-नए प्रयोग होते 

रहे। इसलिए कला की सूक्ष्म दृष्टि इस काल के 

एकांकीकारों में भले न हों, पर वे आधुनिक 

एकांकियों के पूर्वगामी अवश्य हैं।

प्रसाद-युग

हिन्दी एकांकी के विकास की दृष्टि से द्वितीय 

युग प्रसाद के युग से जाना जाता है। इस संदर्भ 

में आधुनिक एकांकी-साहित्य की प्रथम मौलिक 

कृति के रूप में प्रसाद के ‘एक घूँट’ का उल्लेख 

किया जा सकता है। यह रचना सन् 1929 में 

प्रकाशित हुई। यहीं से हम एकांकी के शिल्प में 

महत्वपूर्ण परिवर्तन देखते हैं। रसोद्रेक के लिए 

संगीत-व्यवस्था, संस्कृत नाट्य प्रणाली का 

विदूषक, स्वगत कथन आदि प्राचीन परम्पराओं 

के निर्वाह के साथ ही स्थल की एकता, पात्रों 

का मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण, गतिशील 

कथानक, आदि आधुनिक एकांकी की सभी 

विशेषताएं ‘एक घूंट में’ मिलती है। अतः 

भारतेन्दु ने यदि आधुनिक एकांकी की नींव 

डाली है तो उसे पल्लवित और पुष्पित करने का 

श्रेय प्रसाद जी को ही है।

वास्तव में आधुनिक ढंग से हिन्दी एकांकियों का 

विकास प्रसाद-युग में ही हुआ। क्योंकि इस युग 

में कुछ महत्त्वपूर्ण नवीन प्रयोग एकांकी क्षेत्र में 

हुए। इस युग में एकांकीकारों ने पाश्चात्य 

अनुकरण पर नवीन शैली में एकांकी लिखना 

प्रारम्भ किया तथा पाश्चात्य टेकनीक को 

अपनाया। स्पष्टतः इस युग में एकांकी नाटकों में 

पाश्चात्य नाट्य सिद्धान्तों की प्रेरणा एवं प्रभाव 

विद्यमान है। पाश्चात्य नाटककारों हैनरिक, 

इब्सन, गाल्सवर्दी तथा बर्नार्ड शॉ आदि का 

प्रभाव इस युग के एकांकियों पर प्रत्यक्ष रूप से 

पड़ा तथा इससे एकांकी साहित्य को परिपक्वता 

की स्थिति पर पहुंचने में सहायता मिली। 

भारतेन्दु युग में जो एकांकी संस्कृत परिपाटी पर 

विरंचित हुआ था, इस युग में आकर वह नवीन 

रूपों में विकसित होने लगा। प्राचीनता का मोह 

छोड़कर नवीन ढंग के एकांकी नाटक लिखे गये 

जो कथानक की दृष्टि से मानव जीवन के 

अत्यधिक निकट थे। प्राचीन कथावस्तु में जो 

कृत्रिमता होती थी उसके स्थान पर सामाजिक, 

पारिवारिक एवं दैनिक समस्याओं को एकांकी का 

विषय बनाना प्रारम्भ किया गया। ये रचनाएं 

समाजिक यथार्थ के निकट आयीं। प्राचीन कृत्रिम 

प्रणाली, काव्यमय कथोपकथन, प्राचीन रंगमंच 

एवं अस्वाभाविकता के बहिष्कार का स्वर इस 

युग की रचनाओं में प्रमुखतया प्राप्त होता है। 

नई समस्याएँ, विचारधारा एवं गद्यात्मक शिष्ट 

भाषा का प्रयोग प्रारम्भ हुआ।

इस युग के अधिकांश एकांकी रंगमंच को दृष्टि 

में रखकर लिखे गये जिससे उनका अभिनय हो 

सके और प्रेक्षक अपना ज्ञानवर्धन कर सकें। 

एकांकी में प्रयुक्त संवादों में सजीवता, संक्षिप्तता 

एवं मार्मिकता की ओर ध्यान दिया गया। प्रहसन, 

फेंटेसी, गीति-नाट्य, ओपेरा, संवाद या 

सम्भाषण, रेडियो प्ले, झांकी तथा मोनोड्रामा 

आदि एकांकी से नवीन रूपों का विकास इसी 

युग में हुआ। युगीन सामाजिक, राजनैतिक एवं 

धार्मिक पृष्ठभूमि का प्रभाव आलोच्य युगीन 

एकांकीकारों की रचनाओं पर पड़ने के कारण 

कतिपय प्रवृत्तियों का जन्म हुआ जिनमें 

सामाजिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियां 

प्रमुख हैं।

प्रसाद-युग में जिन सामाजिक एकांकियों की 

रचना हुई उन पर युगीन सामाजिक पृश्ठभूमि 

का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। इस 

युग के अनेक एकांकीकारों ने सामाजिक जीवन 

की विभिन्न पक्षीय समस्याओं का चित्रण किया 

है तथा उसमें प्रचलित विभिन्न जीर्ण-शीर्ण 

रूढ़ियों को अपनी आलोचना का केन्द्र बनाया 

है। बाल-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह, जातीयता, 

अस्पृश्यता की समस्या, मद्यपान, जुआ तथा 

समाज में फैला व्यभिचार आदि समस्याएँ जिस 

रूप में भारतेन्दु युग में परिव्याप्त थीं वह अभी 

तक उसी रूप में बनी हुई थी। यद्यपि भारतेन्दु 

युगीन एकांकीकारों ने भी इन पर प्रहार किया 

था, किंतु इनका निवारण अथवा उन्मूलन सरल 

नहीं था क्योंकि इनकी जड़ें समाज में बहुत 

गहरी थीं। अतः प्रसाद युगीन एकांकीकारों ने भी 

विषय-रूप में इन सामाजिक समस्याओं को 

अपनी रचनाओं में चित्रित किया।

तत्कालीन समाज की नग्न विकृतियों का 

चित्रणकरने वाले अनेक एकांकियों की रचना इस 

युग में हुई। जीवानन्द शर्मा कृत ‘बाला का 

विवाह’ सुधारवादी दृष्टिकोण को प्रकट करता 

है। हरिकृष्ण शर्मा कृत ‘बुढ़ऊ का ब्याह’ वृद्ध 

अनमेल विवाह एवं दहेज समस्या पर कुठाराघात 

है। जी. पी. श्रीवास्तव रचित ‘गड़बड़झाला’ में 

वृद्धों की अनियंत्रित काम वासना एवं समाज के 

लोगों का भ्रष्टाचार चित्रित किया गया है। 

रामसिंह वर्मा कृत ‘रेशमी रूमाल’ में पतिव्रत धर्म 

की प्रतिष्ठा, शैक्षिक वृत्तियों एवं रोमांस की 

त्रुटियों का चित्रण है। प्रेमचन्द कृत ‘प्रेम की 

देवी में’ लेखक ने अन्तर्जातीय विवाह का 

समर्थन प्रबल रूप में किया है। श्री बदरीनाथ 

भट्ट कृत ‘विवाह विज्ञापन’ में आधुनिक शिक्षित 

वर्ग की रोमांस वृत्ति पर व्यंग्यात्मक प्रहार है। 

डॉ. सत्येन्द्र कृत ‘बलिदान’ में दहेज समस्या का 

चित्रण है। जी. पी. श्रीवास्तव-कृत ‘भूलचूक’ से 

विधवा विवाह समर्थन, ‘अच्छा उर्फ अक्ल की 

मरम्मत’ में शिक्षित पति एवं अशिक्षित पत्नी के 

मध्य उत्पन्न कटुता, ‘लकड़बग्घा’ में ऋण 

समस्या आदि पर व्यंग्य किया गया है। इनके 

अतिरिक्त ‘बंटाधार’, ‘दुमदार आदमी’, ‘कुर्सीमैन’, 

‘पत्र पत्रिका सम्मेलन’, ‘न घर का न घाट का’, 

‘चोर के घर मोर’ आदि रचनाओं में श्रीवास्तव 

जी का दृष्टिकोण सुध ारवादी रहा है। श्रीवास्तव 

जी का ‘अछूतोद्वार’ एकांकी अछूत समस्या पर 

लिखा गया है। श्री चण्डीप्रसाद हृदयेश कृत 

‘विनाश लीला’ में भारतीय नारी के जन्म से 

अन्त तक के सामाजिक कष्टों का चित्रण है। पं. 

हरिशंकर शर्मा कृत ‘बिरादरी विभ्राट’, ‘पाखण्ड 

प्रदर्शन’, तथा ‘स्वर्ग की सीधी सड़क’ सामाजिक 

छुआछूत तथा वर्ग वैषम्य की हानियों को चित्रित 

करते हैं। श्री सुदर्शन कृत ‘जब आँखें खुलती 

हैं’ में वेश्या का हृदय-परिवर्तन स्वाध ीनता 

संग्राम के वातावरण में चित्रित किया गया है। 

आलोच्य युग में श्री रामनरेश त्रिपाठी कृत 

‘समानाधिकार’, ‘सीजन डल है’, ‘स्त्रियों की 

काउन्सिल’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र-कृत ‘चार 

बेचारे’, बेचारा सम्पादक’, बेचारा सुधारक’, श्री 

रामदास-कृत ‘नाक में दम’, ‘जोरू का गुलाम’, 

‘करेन्सी नोट’, ‘लबड़ धौं धौं’ आदि एकांकियों 

को भी विशेष ख्याति प्राप्त हुई है।

भारतेन्दु युग में जिस राजनीतिक एकांकी की 

प्रवृत्ति का उदय हुआ था वह प्रसाद-युग में 

आकर और अधिक गतिशील हो गई। इस युग 

में राष्ट्रीयता का स्वर सर्वाधिक मुखरित हुआ है। 

राजनीतिक भावना से प्रभावित होकर 

एकांकीकारों ने अपनी रचनाओं से 

स्वतंत्रता-आन्दोलन, विदेशी शासन के प्रति 

आक्रोश एवं घृणा तथा स्वतंत्रता की भावनाओं 

का स्वर मुखरित किया है। इस संदर्भ में मंगल 

प्रसाद विश्वकर्मा कृत ‘शेरसिंह’, सुदर्शन कृत 

‘प्रताप प्रतिज्ञा’, ‘राजपूत की हार’, तथा ‘जब 

आंखें खुलती हैं’ आदि राष्ट्रीय भावना से 

ओतप्रोत एकांकी रचनाएं हैं। श्री ब्रजलाल 

शास्त्री रचित ‘दुर्गावती’ में विद्रोह एवं स्वातंत्रय 

भावना की प्रधानता है। ‘पन्ना धाय’ में 

स्वामिभक्ति एवं अपूर्व बलिदान का चित्रण है। 

बदरीनाथ भट्ट कृत ‘बापू का स्वर्ग समारोह’ में 

राष्ट्रपिता बापू के अपूर्व त्याग एवं बलिदान युक्त 

चरित्र का उद्घाटन किया गया है। श्री वृन्दावन 

लाल वर्मा रचित ‘दुरंगी’ में भारतीय नारियों को 

देश प्रेम की भावना जाग्रत करने में रत दिखाया 

गया है। रामनरेश त्रिपाठी रचित ‘सीजन डल है’ 

में विदेशी बहिष्कार एवं स्वदेश की भावना का 

चित्रण है। सेठ गोविन्द दास के ‘अपरिग्रह की 

पराकाष्ठा’ में गांधीवाद के अपरिग्रह के सिद्धान्त 

का चित्रण है। इस प्रकार हम देखते हैं कि 

प्रसाद युग में विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों को 

लेकर एकांकियों की रचना हुई। उन्होंने प्राचीन 

भारतीय राष्ट्रीय गौरव की स्थापना करते हुए 

भविष्य में उसकी प्राप्ति की ओर संकेत किया 

है। भारत भूमि की स्वतंत्रता राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्र 

भक्ति की भावधारा का भारतीय मानव के 

अन्तःकरण में उद्रेक करना इनका उद्देश्य रहा 

है। चूंकि ये एकांकीकार स्वयं देशप्रेम की भावना 

से आपूरित थे। अतः उसके चित्रण में 

स्वाभाविकता एवं प्रभावोत्पादकता का प्राधान्य 

रहा है। इनकी रचनाओं का परिणाम यह हुआ 

कि पूर्व प्रसाद-युग में अंकुरित राष्ट्र-प्रेम की 

भावना इस युग के एकांकीकारों के विचारों की 

खाद प्राप्त करके भारतीय जनता के हृदय में 

अधिक पुष्पित एवं पुल्लवित हो उठी।

प्रसाद-युगीन एकांकीकारों ने अनेक ऐतिहासिक 

एकांकियों की रचना करके प्राचीन भारतीय 

गौरव एवं अतीत के स्वरूप का स्मरण भारतीय 

जनता को कराया। यद्यपि विदेशी सरकार का 

भय होने के कारण ये भावना प्रत्यक्ष रूप से 

प्रगट न हुई किन्तु इसमें निरन्तर विकास के 

चिन्ह अंकित होते चले गये। जैसे-जैसे स्वतंत्रता 

आन्दोलनों में तीव्रता आई, त्यों-त्यों उनका स्वर 

एकांकियों में अधिकाधिक मुखरित होने लगा। 

इन एकांकीकारों ने भारतीय नारी के पतिव्रत 

धर्म के महान आदर्श, उनकी त्याग एवं 

बलिदानमयी भावना अपने राष्ट्र के हित के लिए 

सर्वस्व त्याग की भावना, राष्ट्रहित के लिए प्राणों 

की वलि चढ़ाना, कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता 

आदि सद्गुणों का चित्रण अपनी कृतियों में 

किया है।

मंगलाप्रसाद विश्वकर्मा कृत ‘शेरसिंह’ में 

राष्ट्रीयता, स्वातंत्रय प्रेम तथा भारतीय अतीत के 

गौरवशाली स्वरूप की प्रतिष्ठा है। श्री आनन्दी 

प्रसाद श्रीवास्तव कृत ‘नूरजहां’, ‘चाणक्य और 

चन्द्रगुप्त’, ‘शिवाजी और भारत राजलक्ष्मी’ 

ऐतिहासिक कृतियाँ हैं। श्री ब्रजलाल शास्त्री 

रचित ‘दुर्गावती’, ‘पप्रिनी’, ‘पन्ना’, ‘तारा’, ‘किरण 

देवी’, आदि ऐतिहासिक आदर्शवाद से प्रभावित 

अतीत गौरव को स्पष्ट करने वाली रचनाएं हैं। 

श्री सुदर्शनकृत ‘राजपूत की हार’, ‘प्रताप 

प्रतिज्ञा’, आदि में राजपूती शौर्य, राजपूती स्त्रियों 

का स्वदेश हित हेतु कर्त्तव्य का पालन एवं देश 

प्रेम की भावना का प्रभावपूर्ण वर्णन हुआ है। सेठ 

गोविन्ददास ने तो बहुत बड़ी संख्या में 

ऐतिहासिक एकांकियों की रचना की है, जिनमें 

‘बुद्ध के सच्चे स्नेही कौन’? ‘बुद्ध की एक 

शिष्या’, ‘सहित या रहित’, ‘अपरिग्रह की 

पराकाष्ठा’, ‘चौतन्य का संन्यास’, ‘सूखे संतरे’ 

आदि ऐतिहासिक धारा के अन्तर्गत आते हैं। 

इनमें प्राचीन भारतीय गौरव एवं संस्कृति की 

प्रतिष्ठा, आचार-विचार का प्रतिपादन सेठ जी 

का प्रमुख उद्देश्य रहा है। गोविन्द वल्लभ पंत के 

‘विष कन्या’, ‘भस्म रेखा’, ‘एकाग्रता की परीक्षा’ 

आदि ऐतिहासिक कथावस्तु पर आधारित हैं। 

इस प्रकार प्रसाद युग में अनेक ऐतिहासिक 

एकांकियों की रचना हुई जिनके माध्यम से 

भारत के अतीतमय गौरव एवं संस्कृति पर 

दृष्टिपात किया गया।

प्रसाद-युगीन कुछ एकांकीकारों ने धार्मिक 

पौराणिकक्षेत्र में भी प्रवेश किया है। प्रसाद-युग 

के धार्मिक एकांकी अपने पूर्व युग में विरचित 

एकांकी नाटकों से भिन्न थे। भारतेन्दु-युग में 

इनका विषय प्रधान रूप से राम तथा कृष्ण की 

कथाओं से ही सम्बद्ध रहा। प्रसाद युग में अन्य 

पौराणिक कथाओं को भी महत्त्व दिया गया 

क्योंकि सामाजिक सुधार की प्रवृत्ति का प्राधान्य 

होने के कारण धार्मिक एकांकियों से जनता 

सन्तुष्ट नहीं होती थी। जनता की धार्मिक 

अश्रद्धा का कारण धार्मिक भ्रष्टाचारों का प्रधान्य 

एवं वास्तविक धर्म के स्वरूप का लोप होना था। 

अतः वह धार्मिक क्षेत्र में सुधार परमावश्यक 

समझती थी। अतः कुछ धार्मिक कथाओं को 

आधार रूप में ग्रहण कर भारत के प्राचीन 

धार्मिक आदर्शों को प्रस्तुत करना इस युग के 

कलाकारों को युक्ति संगत प्रतीत हुआ। धार्मिक 

पौराणिक एकांकी धारा को प्रवाहित करने में 

राधेश्याम कथावाचक कृत ‘कृष्ण-सुदामा’, 

‘शान्ति के दूत भगवान’, ‘सेवक के रूप में 

भगवान कृष्ण’, जयदेव शर्मा रचित ‘न्याय और 

अन्याय’, जयशंकर प्रसाद कृत ‘सज्जन’ और 

‘करुणालय’ आनन्दी प्रसाद-कृत ‘पार्वती और 

सीता’, चतुरसेन शास्त्री कृत ‘सीताराम’, 

‘राधा-कृष्ण’, ‘हरिश्चन्द्र शैव्या’, आदि के नाम 

उल्लेखनीय हैं। इस प्रकार प्रसाद-युग में कुछ 

एकांकीकारों ने धार्मिक पौराणिक एकांकी की 

प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया।


भारतेन्दु-युग में जिस हास्य-व्यंग्य-प्रधान धारा 

को सामाजिक सुधार-हेतु माध्यम के रूप में 

स्वीकार किया गया था उसका निर्वाह 

प्रसाद-युग में भी दृष्टिगोचर होता है। इन 

एकांकीकारों ने समाज में प्रचलित अनेक 

जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों, कुप्रथाओं एवं परम्पराओं 

पर व्यंग्य किये हैं। उनका लक्ष्य सामाजिक, 

धार्मिक एवं राजनीतिक सुधार ही अधिक रहा 

है। श्री बद्रीनाथ भट्ट रचित ‘चुंगी की उम्मेदवारी’ 

में चुनाव की प्रणाली पर व्यंग्य किया गया है। 

श्री जी. पी. श्रीवास्तव रचित ‘दुमदार आदमी’, 

‘पत्र-पत्रिका सम्मेलन’, ‘अच्छा उपर्फ अक्ल की 

मरम्मत’, ‘न घर का न घाट का’, ‘गड़बड़झाला’, 

‘लकड़बग्घा’, ‘घर का मनेजर’ आदि हास्य व्यंग्य 

प्रधान एकांकी हैं जिनमें विभिन्न धार्मिक एवं 

सामाजिक कुरीतियों व रूढ़ियों पर व्यंग्यात्मक 

प्रहार किये गये हैं। इन रचनाओं में लेखक ने 

दहेज समस्या, विवाह समस्या तथा सामाजिक 

विरूपताओं एवं मिथ्या प्रदर्शन की भावना पर 

सुन्दर व्यंग्य किया है। इसी सन्दर्भ में 

द्वारिकाप्रसाद गुप्त रचित ‘बशर्ते कि’ बद्रीनाथ 

रचित ‘लबड़ धौं-धौं’, ‘पुराने हकीम का नया 

नौकर’, ‘मिस अमेरिकन’, ‘रेगड़ समाचार के 

एडीटर की धूल दच्छना’ आदि हास्य व्यंग्य 

प्रधान रचनाएं हैं जिनमें मध्यम तथा अल्प 

शिक्षित वर्ग की समस्याओं का चित्रण किया गया 

है। भट्ट जी का यह हास्य शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण 

बन पड़ा है। श्री रामचन्द्र रघुनाथ रचित 

‘पाठशाला का एक दृष्य’, ‘सभी हा: हा’, ‘मदद 

मदद’, ‘यमराज का क्रोध’, रूप नारायण पांडेय 

रचित ‘समालोचना रहस्य’, गरीबदास कृत ‘मियाँ 

की जूती मियां के सिर’, मुकन्दीलाल श्रीवास्तव 

कृत ‘घर का सुख कहीं नहीं है’, श्री गोविन्द 

वल्लभ पंत रचित ‘140 डिग्री.’, ‘काला जादू’, 

पांडेय बेचन शर्मा उग्र कृत ‘चार बेचारे’, ‘बेचारा 

अध्यापक’, ‘बेचारा सुध ारक’, सेठ गोविन्ददास 

कृत ‘हंगर स्ट्राइक’, ‘उठाओ खाओ खाना अथवा 

बफेडिनर’, ‘वह मेरा क्यों?’ आदि रचनाएं इसी 

श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रसाद-युग में भी 

विभिन्न एकांकीकारों ने विविध क्षेत्रीय समस्याओं 

एवं परिस्थितियों के उद्घाटन हेतु हास्य व्यंग्य 

को महत्व दिया तथा उसका सफलतापूर्वक 

प्रयोग भी किया। प्रसाद-युग के उपर्युक्त 

प्रतिभाशाली एकांकीकारों के अतिरिक्त अन्य 

अनेक एकांकीकार भी हुए जिन्होंने एकांकी के 

क्षेत्र में अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय 

दिया है। अनेक एकांकीकारों ने अन्य भाषाओं में 

लिखित एकांकियों का हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत 

किया। यद्यपि इस युग में आधुनिक युग की 

अपेक्षा विकास नगण्य कहा जाता है किन्तु इसमें 

संदेह नहीं कि प्रसाद-युग में आकर नाट्यकला 

विषयक मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस युग 

ने आगामी एकांकीकारों को एक पुष्ट आधारभूमि 

प्रदान की जिसमें आधुनिक एकांकी साहित्य और 

भी स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ।


आत्मकथा अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं तत्व

 आत्मकथा 



अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं तत्व

आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में ‘आटोबायोग्राफी’ 

शब्द प्रचलित है। जब लेखक स्वयं के जीवन का 

क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है, तो उसे 

आत्मकथा कहा जाता है। आत्म कथा में स्वयं 

की अनुभूति होती है। इसमें लेखक उन तमाम 

बातों का विवरण देता है, जो बातें उसके जीवन 

में घटी होती हैं। आत्मकथा में लेखक अपने 

अन्तर्जगत को बहिर्जगत के सामने प्रस्तुत करता 

है, इसमें आत्मविश्लेषण होता है। हिंदी साहित्य 

में आत्मकथा एक अपेक्षाकृत आधुनिक विधा है। 

आत्मकथा सत्य पर आधारित होती है, क्योंकि 

लेखक उसमें अपने दोषों को भी निर्ममता से 

उजागर करता है। हालॉकि कौंन कितना अपने 

दोषों को उजागर करता है यह बात तो लेखक 

की ईमानदारी पर ही निर्भर करती है। 

आत्मकथा में लेखक अपने जीवन के बारे में 

लिखता है तथा समाज के सामने स्वयं को 

प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करता है। जिससे समाज 

उसके जीवन के पहलुओं से परिचित होता है। 

आत्मकथा विधा के कई पयार्यवाची नाम भी 

मिलते हैं। आत्मकथा को परिभाषित करने से 

पहले हमको इस शब्द की उत्पत्ति एवं अर्थ को 

जान लेना चाहिए। ‘‘आत्म यह शब्द आत्मन 

शब्द से उत्पन्न हुआ है। इस का अर्थ लिया 

जाता है ‘स्वयं का’ आत्मचरित, आत्मकथा, 

आत्मकथन इन शब्दों का सामान्यतः एक ही अर्थ 

लिया जाता है। ‘‘अंग्रेजी के ंनजवइपवहतंचील 

को ही हिन्दी में आत्मकथा या आत्मवृत्त कहा 

जाता है। ‘स्वयं’ द्वारा लिखा गया जीवन चरित्र, 

जीवनी, आपबीती, आत्मकहानी आदि।

आत्मकथा की अवधारणा पर अनेक विद्वानों ने 

अपने विचार रखे हैं इन विचारों के आधार पर 

यह कहा जाता है कि जो आत्मकथाकार होता है 

वह अपने जीवन की प्रमुख घटनाओं, मानवीय 

अनुभूतियों, भावों विचारों तथा कार्यकलापों को 

निष्पक्षता एवं स्पष्टता से आत्मकथा में समाहित 

करता है। इसमें उसके जीवन की उचित एवं 

अनुचित घटनाओं का सच्चा चित्रण होता है। 

इसमें लेखक स्वयं के जीवन की स्मृतियों को 

प्रस्तुत करता है, जो आत्मनिरीक्षण, आत्मज्ञान 

तथा आत्म-न्याय के आधार पर होती हैं। 

इस़लिए आत्मकथा को हम सम्पूर्ण व्यक्तित्व के 

उद्घाटन की विधा के रूप में भी स्वीकार करते 

हैं।

आत्मकथा लेखन में लेखक के द्वारा कही गयी 

बातों पर विश्वास करते हुए उसको सच माना 

जाता है, क्योंकि उसके लिए लेखक स्वयं साक्षी 

एवं जिम्मेदार होता है। आत्मकथा लेखन 

आत्मकथाकार के जीवन के व्यक्तित्व उद्घाटन, 

ऐतिहासिक तत्वों की प्रामाणिकता तथा उद्देश्य 

के कारण महान होता है। आत्मकथा का उद्देश्य 

लेखक द्वारा स्वयं का आत्मनिर्माण करना, 

आत्मपरीक्षण करना तथा उसके साथ-साथ 

अतीत की स्मृतियों को पुनर्जीवित करना होता 

है। आत्मकथा लेखक इसके द्वारा आत्मॉकन, 

आत्मपरिष्कार तथा आत्मोन्नति भी करना चाहता 

है। इसका लाभ अन्य लोगों को भी मिलता है। 

इससे अन्य पाठक भी कुछ प्रेरणा ग्रहण कर 

सकते हैं।

आत्मकथा की विशेषताएं

1. आत्मविश्लेषण- आत्मकथा में लेखक खुद 

का विश्लेषण करता है। अपनी अच्छाइयों और 

बुराइयों का विश्लेषण करता है। इसमें लेखक 

उन तथ्यों को भी उजागर करता है जिससे 

उसके जीवन में सकारात्मक या नकारात्मक 

प्रभाव पड़ा। आत्मकथा लेखन को काफी हिम्मत 

का काम माना जाता है। क्योंकि हर व्यक्ति में 

इतना साहस नहीं होता कि वह अपनी 

कमजोरियों को समाज के सामने रख सके, 

शायद इसीलिए हिंदी में आत्मकथा लेखन का 

उद्भव काफी बाद में हुआ।

2. आत्मालोचन- आत्मलोचन आत्मकथा की 

काफी महत्वपूर्ण विशेषता है। आत्मकथा लेखक 

खुद को काफी करीब से देखता है तथा अपने 

सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं का काफी 

निकटता से अवलोकन करता है। जिन घटनाओं 

ने उसके जीवन को प्रभावित किया या उसके 

जीवन के विकास में योगदान दिया, उन्हें 

उद्घाटित करता है।

3. लेखक का समाज से परिचय- आत्मकथा में 

लेखक का समाज से परिचय भी होता है। 

समाज लेखक की आत्मकथा को पढ़कर उसके 

जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। 

इससे समाज का लेखक के जीवन की उन 

घटनाओं और तथ्यों से परिचय होता है, जिससे 

समाज आज तक अनभिज्ञ था। इसमें बहुत बार 

वो बातें सामने आती हैं जिनके बारे में किसी 

को पता नहीं होता। इन बातों का परिचय 

आत्मकथा से ही होता है। आत्मकथाएं बहुत बार 

समाज को प्रेरणा प्रदान करने का काम भी 

करती हैं। समाज जब उन महान व्यक्तियों की 

आत्मकथा पड़ता है, जिन्होंने समाज के लिए 

अपना जीवन न्यौछावर कर दिया या जिन्होंने 

तमाम संघर्षों के बाद अपने जीवन में सफलता 

पाई, इस प्रकार की आत्मकथाओं से समाज को 

प्रेरणा मिलती है, जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा 

और मार्गदर्शन का काम करती हैं।

4. घटनाओं का विवरण- आत्मकथा में लेखक 

अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण भी 

प्रस्तुत करता है। उस के साथ जो घटनाएं होती 

हैं, लेखक अपनी आत्मकथा में उसका 

सिलसिलेवार विवरण देता है। आत्मकथा उसके 

जीवन की घटनाओं को बयाँ करती है।

5. वास्तविक जीवन से परिचय- आत्मकथा 

लेखक के जीवन से वास्तविक परिचय कराती 

है। क्योंकि उसमें उन बातों का भी विवरण 

होता है, जिन बातों से पाठक वर्ग अनभिज्ञ होता 

है। क्योंकि हर आदमी के जीवन में वे बातें 

होती हैं, जो बस उसी से संबंधित होती हैं। उन 

बातों को लेखक अपनी आत्मकथा में उकेरता 

है। इसलिए आत्मकथा पाठक वर्ग को लेखक के 

वास्तविक जीवन से परिचय कराती है।

आत्मकथा के तत्व

किसी भी विधा को समझने के लिए उसके तत्वों 

को समझना आवश्यक है। जिसके आधार पर हम 

उसको अन्य विधाओं से अलग कर सकें। 

आत्मकथा की परिभाषाओं से उसकी विधा का 

पता चलता है। पर इसको और अधिक स्पष्ट 

करने के लिए हम आत्मकथा के तत्वों के बारे में 

विस्तार से चर्चा करेंगे। विभिन्न विद्वानों ने 

आत्मकथा के अनेक तत्व बतलाए हैं।

1. वर्ण्य विषय

2. चरित्र-चित्रण

3. देशकाल

4. उद्देश्य

5. भाषा-शैली

वर्ण्य विषय

आत्मकथा में इस तत्व को प्रमुख रूप में स्वीकार 

किया गया है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन 

की महत्वपूर्ण घटनाओं और विषयों का वर्णन 

करता है। लेखक द्वारा आत्मकथा में वर्णित 

विषय में सत्यता का होना जरूरी है। आत्मकथा 

लेखक का वर्ण्य विषय काल्पनिक नहीं वरन् 

यथार्थ पर आधारित होना चाहिए। आत्मकथा 

लेखक अपने जीवन की घटनाओं के साथ-साथ 

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक 

परिस्थितियों का भी वर्णन करता है। आत्मकथा 

लेखक को इस बात का भी ध्यान रखना होता 

है कि आत्मकथा में अनावश्यक आत्मविस्तार 

तथा शील संकोच न आने पाए। अतः आत्मकथा 

के वर्ण्य विषय में सच्चाई और ईमानदारी का 

होना आवश्यक है। अन्य महत्वपूर्ण गुण जो कि 

वर्ण्य विषय को रोचक बनाता है वह है 

संक्षिप्तता। आवश्यकता से अधिक विस्तार विषय 

को नीरस बना देता है। अतः आत्मकथा में 

रोचकता, स्पष्टवादिता, यथार्थता, सत्यता, 

स्वभाविकता एवं संक्षिप्तता होनी चाहिए जिससे 

आत्मकथा श्रेष्ठ होती है।

चरित्र-चित्रण 

आत्मकथा साहित्य का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है 

चरित्र-चित्रण। इसका सम्बन्ध पात्रों से होता है। 

आत्मकथा लेखन में आत्मकथाकार ही खुद 

प्रमुख पात्र होता है। अतः आत्मकथा लेखक खुद 

के चरित्र के सभी पक्षों का विश्लेषण भी 

आत्मकथा में करता है। आत्मकथाकार के लिए 

यह नितांत आवश्यक है कि वह निष्पक्ष एवं 

निर्दाेष भाव से आत्मविवेचन करें। स्पष्ट है कि 

आत्मकथाकार को गुण दोषों का विवेचन सत्यता 

के धरातल पर करना चाहिए। उसके 

आत्मप्रकाशन में किसी तरह का मोह नहीं होना 

चाहिए। इस तरह की आत्मकथा ही सच्ची 

आत्मकथा है। प्रायः आत्मकथाकार अपने 

व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिए उन व्यक्तियों 

का भी वर्णन करता है जिनका उसके जीवन पर 

प्रभाव पड़ा अथवा जिन व्यक्तियों से उसका 

संबंध रहा है। हरिवंष राय बच्चन ने अपनी 

आत्मकथा में अपने पिता जी के स्वभाव का भी 

वर्णन किया है। उनके सम्बन्ध में कहा है - 

‘मेरे पिता की अपने लड़कों के बारे में कोई 

महत्वाकांक्षा न थी। मेरे मैट्रिकुलेशन में फेल 

होने के बाद अगर उनकी चलती तो मुझे नौकरी 

करने को बाध्य कर देते।’ स्पष्ट है कि लेखक 

प्रसंगानुसार उन सभी लोगों का वर्णन करता है 

जिनका उससे सम्बन्ध रहा है। जिससे उसके 

खुद के व्यक्तित्व को समझने में सहायता मिलती 

है।

देशकाल

आत्मकथा में सजीवता लाने के लिए इसमें 

देशकाल का होना आवश्यक माना गया है। देश 

काल का असर प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व पर 

पड़ता है। इससे उसकी उन सामाजिक, 

राजनीतिक, धार्मिक, साहित्यिक प्रभाव क्षेत्र का 

पता चलता है जिससे वह आता है। इस प्रकार 

गौण रूप में तत्कालीन परिस्थितियों का पता भी 

चलता है।

भाषा-शैली 

आत्मकथा में भाषा शैली का अपना एक 

महत्वपूर्ण स्थान है। संप्रेषणीयता के लिए भाषा 

शैली का अच्छा होना बहुत जरूरी है। शैली 

अनुभूत विषयवस्तु को सजाने के उन तरीकों का 

नाम है, जो विषयवस्तु की अभिव्यक्ति को सुंदर 

एवं प्रभावपूर्ण बनाती है। इसमें असामान्य 

अधिकार के अभाव में लेखक की सफलता संभव 

नहीं। आत्मकथा की शैली में प्रभावोत्पादकता 

का होना अति आवश्यक है। इसी के कारण 

आत्मकथा पाठक के मन में अपना प्रभाव डाल 

पाती है। इसलिए लेखक को निःसंकोच अपने 

जीवन का वर्णन करना चाहिए, जिसका पाठक 

के ऊपर प्रभाव पड़ता है। लेखक को जीवन के 

उत्थान-पतन तथा गुण-दोषों का विवेचन इस 

प्रकार करना चाहिए कि वह पाठक को रूचिकर 

लगे। लेखक को अपने समस्त जीवन का वर्णन 

इस प्रकार करना चाहिए जिससे अनावश्यक 

विस्तार भी न हो और साथ में गठित भी हो। 

क्रमानुसार वर्णन अधिक रोचक होता है। 

आत्मकथाएँ विभिन्न शैलियों में लिखी जाती हैं। 

ये शैलियां आत्मनिवेदनात्मक, भावात्मक, 

विचारात्मक, वर्णनात्मक, ऐतिहासिक तथा हास्य 

प्रधान आदि हैं।

अतः कहा जा सकता है कि आत्मकथा में 

प्रभावोत्पादकता, लाघवता, निःसंकोच 

आत्मविश्लेषण, सुसंगठितता तथा स्पष्टता आदि 

गुणों को होना चाहिए। आत्मकथा में जहाँ तक 

भाषा की बात है, भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन 

होती है। आत्मकथा में भाषा को भावानुकूल 

और विषयानुकूल होना चाहिए। लेखक की भाषा 

को शुद्ध, स्पष्ट, परिष्कृत और परिमार्जित होना 

चाहिए जिससे वह पाठकों को प्रभावित कर 

सकता है। भाषा को श्रेष्ठ बनाने के लिए शब्दों 

का चयन विषय एवं भावों के अनुकूल होना 

चाहिए तथा भाषा का प्रयोग पात्रों एवं परिवेश 

के अनुरूप होना चाहिए। 

हिन्दी की कुछ प्रमुख आत्मकथाएं


आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर

आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों  के उत्तर



प्रष्न -1. आत्मकथा की परिभाषा 

लिखिए?

उत्तर-1- आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में 

‘आटोबायोग्राफी’ 

शब्द प्रचलित है। जब लेखक स्वयं के जीवन का 

क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है, तो उसे 

आत्मकथा कहा जाता है। आत्म कथा में स्वयं 

की अनुभूति होती है। इसमें लेखक उन तमाम 

बातों का विवरण देता है, जो बातें उसके जीवन 

में घटी होती हैं। आत्मकथा में लेखक अपने 

अन्तर्जगत को बहिर्जगत के सामने प्रस्तुत करता 

है, इसमें आत्मविश्लेषण होता है।

प्रष्न-2. आत्मकथा की विषेषताएं 

बताएं?

उत्तर-2- आत्मकथा की विशेषताएं

1. आत्मविश्लेषण- आत्मकथा में लेखक खुद 

का विश्लेषण करता है। अपनी अच्छाइयों और 

बुराइयों का विश्लेषण करता है। इसमें लेखक 

उन तथ्यों को भी उजागर करता है जिससे 

उसके जीवन में सकारात्मक या नकारात्मक 

प्रभाव पड़ा। आत्मकथा लेखन को काफी हिम्मत 

का काम माना जाता है। क्योंकि हर व्यक्ति में 

इतना साहस नहीं होता कि वह अपनी 

कमजोरियों को समाज के सामने रख सके, 

शायद इसीलिए हिंदी में आत्मकथा लेखन का 

उद्भव काफी बाद में हुआ।

2. आत्मालोचन- आत्मलोचन आत्मकथा की 

काफी महत्वपूर्ण विशेषता है। आत्मकथा लेखक 

खुद को काफी करीब से देखता है तथा अपने 

सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं का काफी 

निकटता से अवलोकन करता है। जिन घटनाओं 

ने उसके जीवन को प्रभावित किया या उसके 

जीवन के विकास में योगदान दिया, उन्हें 

उद्घाटित करता है।

3. लेखक का समाज से परिचय- आत्मकथा में 

लेखक का समाज से परिचय भी होता है। 

समाज लेखक की आत्मकथा को पढ़कर उसके 

जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। 

इससे समाज का लेखक के जीवन की उन 

घटनाओं और तथ्यों से परिचय होता है, जिससे 

समाज आज तक अनभिज्ञ था। इसमें बहुत बार 

वो बातें सामने आती हैं जिनके बारे में किसी 

को पता नहीं होता। इन बातों का परिचय 

आत्मकथा से ही होता है। आत्मकथाएं बहुत बार 

समाज को प्रेरणा प्रदान करने का काम भी 

करती हैं। समाज जब उन महान व्यक्तियों की 

आत्मकथा पड़ता है, जिन्होंने समाज के लिए 

अपना जीवन न्यौछावर कर दिया या जिन्होंने 

तमाम संघर्षों के बाद अपने जीवन में सफलता 

पाई, इस प्रकार की आत्मकथाओं से समाज को 

प्रेरणा मिलती है, जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा 

और मार्गदर्शन का काम करती हैं।

4. घटनाओं का विवरण- आत्मकथा में लेखक 

अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण भी 

प्रस्तुत करता है। उस के साथ जो घटनाएं होती 

हैं, लेखक अपनी आत्मकथा में उसका 

सिलसिलेवार विवरण देता है। आत्मकथा उसके 

जीवन की घटनाओं को बयाँ करती है।

5. वास्तविक जीवन से परिचय- आत्मकथा 

लेखक के जीवन से वास्तविक परिचय कराती 

है। क्योंकि उसमें उन बातों का भी विवरण 

होता है, जिन बातों से पाठक वर्ग अनभिज्ञ होता 

है। क्योंकि हर आदमी के जीवन में वे बातें 

होती हैं, जो बस उसी से संबंधित होती हैं। उन 

बातों को लेखक अपनी आत्मकथा में उकेरता 

है। इसलिए आत्मकथा पाठक वर्ग को लेखक के 

वास्तविक जीवन से परिचय कराती है।

प्रष्न-3 आत्मकथा के तत्वों के बारे 

में बताएं?

उत्तर-3- आत्मकथा के तत्व

किसी भी विधा को समझने के लिए उसके तत्वों 

को समझना आवश्यक है। जिसके आधार पर हम 

उसको अन्य विधाओं से अलग कर सकें। 

आत्मकथा की परिभाषाओं से उसकी विधा का 

पता चलता है। पर इसको और अधिक स्पष्ट 

करने के लिए हम आत्मकथा के तत्वों के बारे में 

विस्तार से चर्चा करेंगे। विभिन्न विद्वानों ने 

आत्मकथा के अनेक तत्व बतलाए हैं।

1. वर्ण्य विषय

2. चरित्र-चित्रण

3. देशकाल

4. उद्देश्य

5. भाषा-शैली

वर्ण्य विषय

आत्मकथा में इस तत्व को प्रमुख रूप में स्वीकार 

किया गया है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन 

की महत्वपूर्ण घटनाओं और विषयों का वर्णन 

करता है। लेखक द्वारा आत्मकथा में वर्णित 

विषय में सत्यता का होना जरूरी है। आत्मकथा 

लेखक का वर्ण्य विषय काल्पनिक नहीं वरन् 

यथार्थ पर आधारित होना चाहिए। आत्मकथा 

लेखक अपने जीवन की घटनाओं के साथ-साथ 

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक 

परिस्थितियों का भी वर्णन करता है। आत्मकथा 

लेखक को इस बात का भी ध्यान रखना होता 

है कि आत्मकथा में अनावश्यक आत्मविस्तार 

तथा शील संकोच न आने पाए। अतः आत्मकथा 

के वर्ण्य विषय में सच्चाई और ईमानदारी का 

होना आवश्यक है। अन्य महत्वपूर्ण गुण जो कि 

वर्ण्य विषय को रोचक बनाता है वह है 

संक्षिप्तता। आवश्यकता से अधिक विस्तार विषय 

को नीरस बना देता है। अतः आत्मकथा में 

रोचकता, स्पष्टवादिता, यथार्थता, सत्यता, 

स्वभाविकता एवं संक्षिप्तता होनी चाहिए जिससे 

आत्मकथा श्रेष्ठ होती है।

चरित्र-चित्रण 

आत्मकथा साहित्य का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है 

चरित्र-चित्रण। इसका सम्बन्ध पात्रों से होता है। 

आत्मकथा लेखन में आत्मकथाकार ही खुद 

प्रमुख पात्र होता है। अतः आत्मकथा लेखक खुद 

के चरित्र के सभी पक्षों का विश्लेषण भी 

आत्मकथा में करता है। आत्मकथाकार के लिए 

यह नितांत आवश्यक है कि वह निष्पक्ष एवं 

निर्दाेष भाव से आत्मविवेचन करें। स्पष्ट है कि 

आत्मकथाकार को गुण दोषों का विवेचन सत्यता 

के धरातल पर करना चाहिए। उसके 

आत्मप्रकाशन में किसी तरह का मोह नहीं होना 

चाहिए। इस तरह की आत्मकथा ही सच्ची 

आत्मकथा है। प्रायः आत्मकथाकार अपने 

व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिए उन व्यक्तियों 

का भी वर्णन करता है जिनका उसके जीवन पर 

प्रभाव पड़ा अथवा जिन व्यक्तियों से उसका 

संबंध रहा है। हरिवंष राय बच्चन ने अपनी 

आत्मकथा में अपने पिता जी के स्वभाव का भी 

वर्णन किया है। उनके सम्बन्ध में कहा है - 

‘मेरे पिता की अपने लड़कों के बारे में कोई 

महत्वाकांक्षा न थी। मेरे मैट्रिकुलेशन में फेल 

होने के बाद अगर उनकी चलती तो मुझे नौकरी 

करने को बाध्य कर देते।’ स्पष्ट है कि लेखक 

प्रसंगानुसार उन सभी लोगों का वर्णन करता है 

जिनका उससे सम्बन्ध रहा है। जिससे उसके 

खुद के व्यक्तित्व को समझने में सहायता मिलती 

है।

देशकाल

आत्मकथा में सजीवता लाने के लिए इसमें 

देशकाल का होना आवश्यक माना गया है। देश 

काल का असर प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व पर 

पड़ता है। इससे उसकी उन सामाजिक, 

राजनीतिक, धार्मिक, साहित्यिक प्रभाव क्षेत्र का 

पता चलता है जिससे वह आता है। इस प्रकार 

गौण रूप में तत्कालीन परिस्थितियों का पता भी 

चलता है।

भाषा-शैली 

आत्मकथा में भाषा शैली का अपना एक 

महत्वपूर्ण स्थान है। संप्रेषणीयता के लिए भाषा 

शैली का अच्छा होना बहुत जरूरी है। शैली 

अनुभूत विषयवस्तु को सजाने के उन तरीकों का 

नाम है, जो विषयवस्तु की अभिव्यक्ति को सुंदर 

एवं प्रभावपूर्ण बनाती है। इसमें असामान्य 

अधिकार के अभाव में लेखक की सफलता संभव 

नहीं। आत्मकथा की शैली में प्रभावोत्पादकता 

का होना अति आवश्यक है। इसी के कारण 

आत्मकथा पाठक के मन में अपना प्रभाव डाल 

पाती है। इसलिए लेखक को निःसंकोच अपने 

जीवन का वर्णन करना चाहिए, जिसका पाठक 

के ऊपर प्रभाव पड़ता है। लेखक को जीवन के 

उत्थान-पतन तथा गुण-दोषों का विवेचन इस 

प्रकार करना चाहिए कि वह पाठक को रूचिकर 

लगे। लेखक को अपने समस्त जीवन का वर्णन 

इस प्रकार करना चाहिए जिससे अनावश्यक 

विस्तार भी न हो और साथ में गठित भी हो। 

क्रमानुसार वर्णन अधिक रोचक होता है। 

आत्मकथाएँ विभिन्न शैलियों में लिखी जाती हैं। 

ये शैलियां आत्मनिवेदनात्मक, भावात्मक, 

विचारात्मक, वर्णनात्मक, ऐतिहासिक तथा हास्य 

प्रधान आदि हैं।

अतः कहा जा सकता है कि आत्मकथा में 

प्रभावोत्पादकता, लाघवता, निःसंकोच 

आत्मविश्लेषण, सुसंगठितता तथा स्पष्टता आदि 

गुणों को होना चाहिए। आत्मकथा में जहाँ तक 

भाषा की बात है, भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन 

होती है। आत्मकथा में भाषा को भावानुकूल 

और विषयानुकूल होना चाहिए। लेखक की भाषा 

को शुद्ध, स्पष्ट, परिष्कृत और परिमार्जित होना 

चाहिए जिससे वह पाठकों को प्रभावित कर 

सकता है। भाषा को श्रेष्ठ बनाने के लिए शब्दों 

का चयन विषय एवं भावों के अनुकूल होना 

चाहिए तथा भाषा का प्रयोग पात्रों एवं परिवेश 

के अनुरूप होना चाहिए। 

प्रष्न-4 बनारसी दास जैन की 

आत्मकथा का नाम लिखिए?

उत्तर-4-अर्द्धकथानक

प्रष्न-5 ‘सिंहावलोकन’ किसकी 

आत्मकथा है और कितने खंडों में है?

उत्तर-5-यषपाल, तीन खंडों में

प्रष्न-6 हरिवंष राय बच्चन की 

आत्मकथाओं के नाम लिखिए?

उत्तर-6-क्या भूलूं क्या याद करूं, 

नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, 

दस द्वार से सोपान तक 

प्रष्न-7 ‘मैं क्रांतिकारी कैसे बना’ किसकी आत्मकथा है ?

उत्तर-7-रामविलास षुक्ल

प्रष्न-8 पदुमलाल पन्नालाल बख्षी 

की आत्मकथा का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष बताएं?

उत्तर-8-मेरी अपनी कथा-1958

प्रष्न-9 किन्हीं तीन महिला 

लेखिकाओं के द्वारा लिखी 

आत्मकथाओं के नाम उनके प्रकाषन 

वर्ष के साथ लिखिए? 

उत्तर-9-बू़ंद बावडी-पदमा 

सचदेवा-1999, लगता नहीं है दिल 

मेरा-कृष्णा अग्निहोत्री-1997, 

हादेस-रमणिका गुप्ता-2005

प्रष्न-10 राधेष्याम कथावाचक की 

आत्मकथा-‘मेरा नाटक काल’ कब 

प्रकाषित हुई?

उत्तर-10-1957

प्रष्न-11 डॉ. देवराज की 

आत्मकथाआंे के नाम लिखिए?

उत्तर-11-बचपन के दो दिन, यौवन 

के द्वार पर

प्रष्न-12 ‘साठ वर्ष: एक रेखांकन’ 

आत्मकथा किसने लिखी है?

उत्तर-12-सुमित्रानंदन पंत

प्रष्न-13 मैत्रयी पुष्पा की आत्मकथा 

का नाम लिखिए?

उत्तर-13- कस्तूरी कुण्डल बसै, 

गुड़िया भीतर गुड़िया

प्रष्न-14 ‘अन्या से अन्नया’ आत्मकथा 

की लेखिका का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष लिखिए?

उत्तर-14- प्रभा खेतान-2007

प्रष्न-15 किन्ही दो दलित 

आत्मकथाओं एवं उनके लेखकों के 

नाम लिखिए?

उत्तर-15-जूठन-ओमप्रकाष 

वाल्मीकि, अपने अपने 

पिंजरे-मोहनदास नैमिषराय

1 मीनू- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

2 सरोज- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

3 सीमोन- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

4 सरीता- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

5 ज्योति कुमरी- बी.ए.-3, सीपीडी, 

जैन कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

6 सतनामो- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक


 
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