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Monday, February 14, 2022

आत्मकथा अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं तत्व

 आत्मकथा 



अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं तत्व

आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में ‘आटोबायोग्राफी’ 

शब्द प्रचलित है। जब लेखक स्वयं के जीवन का 

क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है, तो उसे 

आत्मकथा कहा जाता है। आत्म कथा में स्वयं 

की अनुभूति होती है। इसमें लेखक उन तमाम 

बातों का विवरण देता है, जो बातें उसके जीवन 

में घटी होती हैं। आत्मकथा में लेखक अपने 

अन्तर्जगत को बहिर्जगत के सामने प्रस्तुत करता 

है, इसमें आत्मविश्लेषण होता है। हिंदी साहित्य 

में आत्मकथा एक अपेक्षाकृत आधुनिक विधा है। 

आत्मकथा सत्य पर आधारित होती है, क्योंकि 

लेखक उसमें अपने दोषों को भी निर्ममता से 

उजागर करता है। हालॉकि कौंन कितना अपने 

दोषों को उजागर करता है यह बात तो लेखक 

की ईमानदारी पर ही निर्भर करती है। 

आत्मकथा में लेखक अपने जीवन के बारे में 

लिखता है तथा समाज के सामने स्वयं को 

प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करता है। जिससे समाज 

उसके जीवन के पहलुओं से परिचित होता है। 

आत्मकथा विधा के कई पयार्यवाची नाम भी 

मिलते हैं। आत्मकथा को परिभाषित करने से 

पहले हमको इस शब्द की उत्पत्ति एवं अर्थ को 

जान लेना चाहिए। ‘‘आत्म यह शब्द आत्मन 

शब्द से उत्पन्न हुआ है। इस का अर्थ लिया 

जाता है ‘स्वयं का’ आत्मचरित, आत्मकथा, 

आत्मकथन इन शब्दों का सामान्यतः एक ही अर्थ 

लिया जाता है। ‘‘अंग्रेजी के ंनजवइपवहतंचील 

को ही हिन्दी में आत्मकथा या आत्मवृत्त कहा 

जाता है। ‘स्वयं’ द्वारा लिखा गया जीवन चरित्र, 

जीवनी, आपबीती, आत्मकहानी आदि।

आत्मकथा की अवधारणा पर अनेक विद्वानों ने 

अपने विचार रखे हैं इन विचारों के आधार पर 

यह कहा जाता है कि जो आत्मकथाकार होता है 

वह अपने जीवन की प्रमुख घटनाओं, मानवीय 

अनुभूतियों, भावों विचारों तथा कार्यकलापों को 

निष्पक्षता एवं स्पष्टता से आत्मकथा में समाहित 

करता है। इसमें उसके जीवन की उचित एवं 

अनुचित घटनाओं का सच्चा चित्रण होता है। 

इसमें लेखक स्वयं के जीवन की स्मृतियों को 

प्रस्तुत करता है, जो आत्मनिरीक्षण, आत्मज्ञान 

तथा आत्म-न्याय के आधार पर होती हैं। 

इस़लिए आत्मकथा को हम सम्पूर्ण व्यक्तित्व के 

उद्घाटन की विधा के रूप में भी स्वीकार करते 

हैं।

आत्मकथा लेखन में लेखक के द्वारा कही गयी 

बातों पर विश्वास करते हुए उसको सच माना 

जाता है, क्योंकि उसके लिए लेखक स्वयं साक्षी 

एवं जिम्मेदार होता है। आत्मकथा लेखन 

आत्मकथाकार के जीवन के व्यक्तित्व उद्घाटन, 

ऐतिहासिक तत्वों की प्रामाणिकता तथा उद्देश्य 

के कारण महान होता है। आत्मकथा का उद्देश्य 

लेखक द्वारा स्वयं का आत्मनिर्माण करना, 

आत्मपरीक्षण करना तथा उसके साथ-साथ 

अतीत की स्मृतियों को पुनर्जीवित करना होता 

है। आत्मकथा लेखक इसके द्वारा आत्मॉकन, 

आत्मपरिष्कार तथा आत्मोन्नति भी करना चाहता 

है। इसका लाभ अन्य लोगों को भी मिलता है। 

इससे अन्य पाठक भी कुछ प्रेरणा ग्रहण कर 

सकते हैं।

आत्मकथा की विशेषताएं

1. आत्मविश्लेषण- आत्मकथा में लेखक खुद 

का विश्लेषण करता है। अपनी अच्छाइयों और 

बुराइयों का विश्लेषण करता है। इसमें लेखक 

उन तथ्यों को भी उजागर करता है जिससे 

उसके जीवन में सकारात्मक या नकारात्मक 

प्रभाव पड़ा। आत्मकथा लेखन को काफी हिम्मत 

का काम माना जाता है। क्योंकि हर व्यक्ति में 

इतना साहस नहीं होता कि वह अपनी 

कमजोरियों को समाज के सामने रख सके, 

शायद इसीलिए हिंदी में आत्मकथा लेखन का 

उद्भव काफी बाद में हुआ।

2. आत्मालोचन- आत्मलोचन आत्मकथा की 

काफी महत्वपूर्ण विशेषता है। आत्मकथा लेखक 

खुद को काफी करीब से देखता है तथा अपने 

सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं का काफी 

निकटता से अवलोकन करता है। जिन घटनाओं 

ने उसके जीवन को प्रभावित किया या उसके 

जीवन के विकास में योगदान दिया, उन्हें 

उद्घाटित करता है।

3. लेखक का समाज से परिचय- आत्मकथा में 

लेखक का समाज से परिचय भी होता है। 

समाज लेखक की आत्मकथा को पढ़कर उसके 

जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। 

इससे समाज का लेखक के जीवन की उन 

घटनाओं और तथ्यों से परिचय होता है, जिससे 

समाज आज तक अनभिज्ञ था। इसमें बहुत बार 

वो बातें सामने आती हैं जिनके बारे में किसी 

को पता नहीं होता। इन बातों का परिचय 

आत्मकथा से ही होता है। आत्मकथाएं बहुत बार 

समाज को प्रेरणा प्रदान करने का काम भी 

करती हैं। समाज जब उन महान व्यक्तियों की 

आत्मकथा पड़ता है, जिन्होंने समाज के लिए 

अपना जीवन न्यौछावर कर दिया या जिन्होंने 

तमाम संघर्षों के बाद अपने जीवन में सफलता 

पाई, इस प्रकार की आत्मकथाओं से समाज को 

प्रेरणा मिलती है, जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा 

और मार्गदर्शन का काम करती हैं।

4. घटनाओं का विवरण- आत्मकथा में लेखक 

अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण भी 

प्रस्तुत करता है। उस के साथ जो घटनाएं होती 

हैं, लेखक अपनी आत्मकथा में उसका 

सिलसिलेवार विवरण देता है। आत्मकथा उसके 

जीवन की घटनाओं को बयाँ करती है।

5. वास्तविक जीवन से परिचय- आत्मकथा 

लेखक के जीवन से वास्तविक परिचय कराती 

है। क्योंकि उसमें उन बातों का भी विवरण 

होता है, जिन बातों से पाठक वर्ग अनभिज्ञ होता 

है। क्योंकि हर आदमी के जीवन में वे बातें 

होती हैं, जो बस उसी से संबंधित होती हैं। उन 

बातों को लेखक अपनी आत्मकथा में उकेरता 

है। इसलिए आत्मकथा पाठक वर्ग को लेखक के 

वास्तविक जीवन से परिचय कराती है।

आत्मकथा के तत्व

किसी भी विधा को समझने के लिए उसके तत्वों 

को समझना आवश्यक है। जिसके आधार पर हम 

उसको अन्य विधाओं से अलग कर सकें। 

आत्मकथा की परिभाषाओं से उसकी विधा का 

पता चलता है। पर इसको और अधिक स्पष्ट 

करने के लिए हम आत्मकथा के तत्वों के बारे में 

विस्तार से चर्चा करेंगे। विभिन्न विद्वानों ने 

आत्मकथा के अनेक तत्व बतलाए हैं।

1. वर्ण्य विषय

2. चरित्र-चित्रण

3. देशकाल

4. उद्देश्य

5. भाषा-शैली

वर्ण्य विषय

आत्मकथा में इस तत्व को प्रमुख रूप में स्वीकार 

किया गया है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन 

की महत्वपूर्ण घटनाओं और विषयों का वर्णन 

करता है। लेखक द्वारा आत्मकथा में वर्णित 

विषय में सत्यता का होना जरूरी है। आत्मकथा 

लेखक का वर्ण्य विषय काल्पनिक नहीं वरन् 

यथार्थ पर आधारित होना चाहिए। आत्मकथा 

लेखक अपने जीवन की घटनाओं के साथ-साथ 

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक 

परिस्थितियों का भी वर्णन करता है। आत्मकथा 

लेखक को इस बात का भी ध्यान रखना होता 

है कि आत्मकथा में अनावश्यक आत्मविस्तार 

तथा शील संकोच न आने पाए। अतः आत्मकथा 

के वर्ण्य विषय में सच्चाई और ईमानदारी का 

होना आवश्यक है। अन्य महत्वपूर्ण गुण जो कि 

वर्ण्य विषय को रोचक बनाता है वह है 

संक्षिप्तता। आवश्यकता से अधिक विस्तार विषय 

को नीरस बना देता है। अतः आत्मकथा में 

रोचकता, स्पष्टवादिता, यथार्थता, सत्यता, 

स्वभाविकता एवं संक्षिप्तता होनी चाहिए जिससे 

आत्मकथा श्रेष्ठ होती है।

चरित्र-चित्रण 

आत्मकथा साहित्य का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है 

चरित्र-चित्रण। इसका सम्बन्ध पात्रों से होता है। 

आत्मकथा लेखन में आत्मकथाकार ही खुद 

प्रमुख पात्र होता है। अतः आत्मकथा लेखक खुद 

के चरित्र के सभी पक्षों का विश्लेषण भी 

आत्मकथा में करता है। आत्मकथाकार के लिए 

यह नितांत आवश्यक है कि वह निष्पक्ष एवं 

निर्दाेष भाव से आत्मविवेचन करें। स्पष्ट है कि 

आत्मकथाकार को गुण दोषों का विवेचन सत्यता 

के धरातल पर करना चाहिए। उसके 

आत्मप्रकाशन में किसी तरह का मोह नहीं होना 

चाहिए। इस तरह की आत्मकथा ही सच्ची 

आत्मकथा है। प्रायः आत्मकथाकार अपने 

व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिए उन व्यक्तियों 

का भी वर्णन करता है जिनका उसके जीवन पर 

प्रभाव पड़ा अथवा जिन व्यक्तियों से उसका 

संबंध रहा है। हरिवंष राय बच्चन ने अपनी 

आत्मकथा में अपने पिता जी के स्वभाव का भी 

वर्णन किया है। उनके सम्बन्ध में कहा है - 

‘मेरे पिता की अपने लड़कों के बारे में कोई 

महत्वाकांक्षा न थी। मेरे मैट्रिकुलेशन में फेल 

होने के बाद अगर उनकी चलती तो मुझे नौकरी 

करने को बाध्य कर देते।’ स्पष्ट है कि लेखक 

प्रसंगानुसार उन सभी लोगों का वर्णन करता है 

जिनका उससे सम्बन्ध रहा है। जिससे उसके 

खुद के व्यक्तित्व को समझने में सहायता मिलती 

है।

देशकाल

आत्मकथा में सजीवता लाने के लिए इसमें 

देशकाल का होना आवश्यक माना गया है। देश 

काल का असर प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व पर 

पड़ता है। इससे उसकी उन सामाजिक, 

राजनीतिक, धार्मिक, साहित्यिक प्रभाव क्षेत्र का 

पता चलता है जिससे वह आता है। इस प्रकार 

गौण रूप में तत्कालीन परिस्थितियों का पता भी 

चलता है।

भाषा-शैली 

आत्मकथा में भाषा शैली का अपना एक 

महत्वपूर्ण स्थान है। संप्रेषणीयता के लिए भाषा 

शैली का अच्छा होना बहुत जरूरी है। शैली 

अनुभूत विषयवस्तु को सजाने के उन तरीकों का 

नाम है, जो विषयवस्तु की अभिव्यक्ति को सुंदर 

एवं प्रभावपूर्ण बनाती है। इसमें असामान्य 

अधिकार के अभाव में लेखक की सफलता संभव 

नहीं। आत्मकथा की शैली में प्रभावोत्पादकता 

का होना अति आवश्यक है। इसी के कारण 

आत्मकथा पाठक के मन में अपना प्रभाव डाल 

पाती है। इसलिए लेखक को निःसंकोच अपने 

जीवन का वर्णन करना चाहिए, जिसका पाठक 

के ऊपर प्रभाव पड़ता है। लेखक को जीवन के 

उत्थान-पतन तथा गुण-दोषों का विवेचन इस 

प्रकार करना चाहिए कि वह पाठक को रूचिकर 

लगे। लेखक को अपने समस्त जीवन का वर्णन 

इस प्रकार करना चाहिए जिससे अनावश्यक 

विस्तार भी न हो और साथ में गठित भी हो। 

क्रमानुसार वर्णन अधिक रोचक होता है। 

आत्मकथाएँ विभिन्न शैलियों में लिखी जाती हैं। 

ये शैलियां आत्मनिवेदनात्मक, भावात्मक, 

विचारात्मक, वर्णनात्मक, ऐतिहासिक तथा हास्य 

प्रधान आदि हैं।

अतः कहा जा सकता है कि आत्मकथा में 

प्रभावोत्पादकता, लाघवता, निःसंकोच 

आत्मविश्लेषण, सुसंगठितता तथा स्पष्टता आदि 

गुणों को होना चाहिए। आत्मकथा में जहाँ तक 

भाषा की बात है, भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन 

होती है। आत्मकथा में भाषा को भावानुकूल 

और विषयानुकूल होना चाहिए। लेखक की भाषा 

को शुद्ध, स्पष्ट, परिष्कृत और परिमार्जित होना 

चाहिए जिससे वह पाठकों को प्रभावित कर 

सकता है। भाषा को श्रेष्ठ बनाने के लिए शब्दों 

का चयन विषय एवं भावों के अनुकूल होना 

चाहिए तथा भाषा का प्रयोग पात्रों एवं परिवेश 

के अनुरूप होना चाहिए। 

हिन्दी की कुछ प्रमुख आत्मकथाएं


आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर

आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों  के उत्तर



प्रष्न -1. आत्मकथा की परिभाषा 

लिखिए?

उत्तर-1- आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में 

‘आटोबायोग्राफी’ 

शब्द प्रचलित है। जब लेखक स्वयं के जीवन का 

क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है, तो उसे 

आत्मकथा कहा जाता है। आत्म कथा में स्वयं 

की अनुभूति होती है। इसमें लेखक उन तमाम 

बातों का विवरण देता है, जो बातें उसके जीवन 

में घटी होती हैं। आत्मकथा में लेखक अपने 

अन्तर्जगत को बहिर्जगत के सामने प्रस्तुत करता 

है, इसमें आत्मविश्लेषण होता है।

प्रष्न-2. आत्मकथा की विषेषताएं 

बताएं?

उत्तर-2- आत्मकथा की विशेषताएं

1. आत्मविश्लेषण- आत्मकथा में लेखक खुद 

का विश्लेषण करता है। अपनी अच्छाइयों और 

बुराइयों का विश्लेषण करता है। इसमें लेखक 

उन तथ्यों को भी उजागर करता है जिससे 

उसके जीवन में सकारात्मक या नकारात्मक 

प्रभाव पड़ा। आत्मकथा लेखन को काफी हिम्मत 

का काम माना जाता है। क्योंकि हर व्यक्ति में 

इतना साहस नहीं होता कि वह अपनी 

कमजोरियों को समाज के सामने रख सके, 

शायद इसीलिए हिंदी में आत्मकथा लेखन का 

उद्भव काफी बाद में हुआ।

2. आत्मालोचन- आत्मलोचन आत्मकथा की 

काफी महत्वपूर्ण विशेषता है। आत्मकथा लेखक 

खुद को काफी करीब से देखता है तथा अपने 

सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं का काफी 

निकटता से अवलोकन करता है। जिन घटनाओं 

ने उसके जीवन को प्रभावित किया या उसके 

जीवन के विकास में योगदान दिया, उन्हें 

उद्घाटित करता है।

3. लेखक का समाज से परिचय- आत्मकथा में 

लेखक का समाज से परिचय भी होता है। 

समाज लेखक की आत्मकथा को पढ़कर उसके 

जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। 

इससे समाज का लेखक के जीवन की उन 

घटनाओं और तथ्यों से परिचय होता है, जिससे 

समाज आज तक अनभिज्ञ था। इसमें बहुत बार 

वो बातें सामने आती हैं जिनके बारे में किसी 

को पता नहीं होता। इन बातों का परिचय 

आत्मकथा से ही होता है। आत्मकथाएं बहुत बार 

समाज को प्रेरणा प्रदान करने का काम भी 

करती हैं। समाज जब उन महान व्यक्तियों की 

आत्मकथा पड़ता है, जिन्होंने समाज के लिए 

अपना जीवन न्यौछावर कर दिया या जिन्होंने 

तमाम संघर्षों के बाद अपने जीवन में सफलता 

पाई, इस प्रकार की आत्मकथाओं से समाज को 

प्रेरणा मिलती है, जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा 

और मार्गदर्शन का काम करती हैं।

4. घटनाओं का विवरण- आत्मकथा में लेखक 

अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण भी 

प्रस्तुत करता है। उस के साथ जो घटनाएं होती 

हैं, लेखक अपनी आत्मकथा में उसका 

सिलसिलेवार विवरण देता है। आत्मकथा उसके 

जीवन की घटनाओं को बयाँ करती है।

5. वास्तविक जीवन से परिचय- आत्मकथा 

लेखक के जीवन से वास्तविक परिचय कराती 

है। क्योंकि उसमें उन बातों का भी विवरण 

होता है, जिन बातों से पाठक वर्ग अनभिज्ञ होता 

है। क्योंकि हर आदमी के जीवन में वे बातें 

होती हैं, जो बस उसी से संबंधित होती हैं। उन 

बातों को लेखक अपनी आत्मकथा में उकेरता 

है। इसलिए आत्मकथा पाठक वर्ग को लेखक के 

वास्तविक जीवन से परिचय कराती है।

प्रष्न-3 आत्मकथा के तत्वों के बारे 

में बताएं?

उत्तर-3- आत्मकथा के तत्व

किसी भी विधा को समझने के लिए उसके तत्वों 

को समझना आवश्यक है। जिसके आधार पर हम 

उसको अन्य विधाओं से अलग कर सकें। 

आत्मकथा की परिभाषाओं से उसकी विधा का 

पता चलता है। पर इसको और अधिक स्पष्ट 

करने के लिए हम आत्मकथा के तत्वों के बारे में 

विस्तार से चर्चा करेंगे। विभिन्न विद्वानों ने 

आत्मकथा के अनेक तत्व बतलाए हैं।

1. वर्ण्य विषय

2. चरित्र-चित्रण

3. देशकाल

4. उद्देश्य

5. भाषा-शैली

वर्ण्य विषय

आत्मकथा में इस तत्व को प्रमुख रूप में स्वीकार 

किया गया है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन 

की महत्वपूर्ण घटनाओं और विषयों का वर्णन 

करता है। लेखक द्वारा आत्मकथा में वर्णित 

विषय में सत्यता का होना जरूरी है। आत्मकथा 

लेखक का वर्ण्य विषय काल्पनिक नहीं वरन् 

यथार्थ पर आधारित होना चाहिए। आत्मकथा 

लेखक अपने जीवन की घटनाओं के साथ-साथ 

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक 

परिस्थितियों का भी वर्णन करता है। आत्मकथा 

लेखक को इस बात का भी ध्यान रखना होता 

है कि आत्मकथा में अनावश्यक आत्मविस्तार 

तथा शील संकोच न आने पाए। अतः आत्मकथा 

के वर्ण्य विषय में सच्चाई और ईमानदारी का 

होना आवश्यक है। अन्य महत्वपूर्ण गुण जो कि 

वर्ण्य विषय को रोचक बनाता है वह है 

संक्षिप्तता। आवश्यकता से अधिक विस्तार विषय 

को नीरस बना देता है। अतः आत्मकथा में 

रोचकता, स्पष्टवादिता, यथार्थता, सत्यता, 

स्वभाविकता एवं संक्षिप्तता होनी चाहिए जिससे 

आत्मकथा श्रेष्ठ होती है।

चरित्र-चित्रण 

आत्मकथा साहित्य का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है 

चरित्र-चित्रण। इसका सम्बन्ध पात्रों से होता है। 

आत्मकथा लेखन में आत्मकथाकार ही खुद 

प्रमुख पात्र होता है। अतः आत्मकथा लेखक खुद 

के चरित्र के सभी पक्षों का विश्लेषण भी 

आत्मकथा में करता है। आत्मकथाकार के लिए 

यह नितांत आवश्यक है कि वह निष्पक्ष एवं 

निर्दाेष भाव से आत्मविवेचन करें। स्पष्ट है कि 

आत्मकथाकार को गुण दोषों का विवेचन सत्यता 

के धरातल पर करना चाहिए। उसके 

आत्मप्रकाशन में किसी तरह का मोह नहीं होना 

चाहिए। इस तरह की आत्मकथा ही सच्ची 

आत्मकथा है। प्रायः आत्मकथाकार अपने 

व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिए उन व्यक्तियों 

का भी वर्णन करता है जिनका उसके जीवन पर 

प्रभाव पड़ा अथवा जिन व्यक्तियों से उसका 

संबंध रहा है। हरिवंष राय बच्चन ने अपनी 

आत्मकथा में अपने पिता जी के स्वभाव का भी 

वर्णन किया है। उनके सम्बन्ध में कहा है - 

‘मेरे पिता की अपने लड़कों के बारे में कोई 

महत्वाकांक्षा न थी। मेरे मैट्रिकुलेशन में फेल 

होने के बाद अगर उनकी चलती तो मुझे नौकरी 

करने को बाध्य कर देते।’ स्पष्ट है कि लेखक 

प्रसंगानुसार उन सभी लोगों का वर्णन करता है 

जिनका उससे सम्बन्ध रहा है। जिससे उसके 

खुद के व्यक्तित्व को समझने में सहायता मिलती 

है।

देशकाल

आत्मकथा में सजीवता लाने के लिए इसमें 

देशकाल का होना आवश्यक माना गया है। देश 

काल का असर प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व पर 

पड़ता है। इससे उसकी उन सामाजिक, 

राजनीतिक, धार्मिक, साहित्यिक प्रभाव क्षेत्र का 

पता चलता है जिससे वह आता है। इस प्रकार 

गौण रूप में तत्कालीन परिस्थितियों का पता भी 

चलता है।

भाषा-शैली 

आत्मकथा में भाषा शैली का अपना एक 

महत्वपूर्ण स्थान है। संप्रेषणीयता के लिए भाषा 

शैली का अच्छा होना बहुत जरूरी है। शैली 

अनुभूत विषयवस्तु को सजाने के उन तरीकों का 

नाम है, जो विषयवस्तु की अभिव्यक्ति को सुंदर 

एवं प्रभावपूर्ण बनाती है। इसमें असामान्य 

अधिकार के अभाव में लेखक की सफलता संभव 

नहीं। आत्मकथा की शैली में प्रभावोत्पादकता 

का होना अति आवश्यक है। इसी के कारण 

आत्मकथा पाठक के मन में अपना प्रभाव डाल 

पाती है। इसलिए लेखक को निःसंकोच अपने 

जीवन का वर्णन करना चाहिए, जिसका पाठक 

के ऊपर प्रभाव पड़ता है। लेखक को जीवन के 

उत्थान-पतन तथा गुण-दोषों का विवेचन इस 

प्रकार करना चाहिए कि वह पाठक को रूचिकर 

लगे। लेखक को अपने समस्त जीवन का वर्णन 

इस प्रकार करना चाहिए जिससे अनावश्यक 

विस्तार भी न हो और साथ में गठित भी हो। 

क्रमानुसार वर्णन अधिक रोचक होता है। 

आत्मकथाएँ विभिन्न शैलियों में लिखी जाती हैं। 

ये शैलियां आत्मनिवेदनात्मक, भावात्मक, 

विचारात्मक, वर्णनात्मक, ऐतिहासिक तथा हास्य 

प्रधान आदि हैं।

अतः कहा जा सकता है कि आत्मकथा में 

प्रभावोत्पादकता, लाघवता, निःसंकोच 

आत्मविश्लेषण, सुसंगठितता तथा स्पष्टता आदि 

गुणों को होना चाहिए। आत्मकथा में जहाँ तक 

भाषा की बात है, भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन 

होती है। आत्मकथा में भाषा को भावानुकूल 

और विषयानुकूल होना चाहिए। लेखक की भाषा 

को शुद्ध, स्पष्ट, परिष्कृत और परिमार्जित होना 

चाहिए जिससे वह पाठकों को प्रभावित कर 

सकता है। भाषा को श्रेष्ठ बनाने के लिए शब्दों 

का चयन विषय एवं भावों के अनुकूल होना 

चाहिए तथा भाषा का प्रयोग पात्रों एवं परिवेश 

के अनुरूप होना चाहिए। 

प्रष्न-4 बनारसी दास जैन की 

आत्मकथा का नाम लिखिए?

उत्तर-4-अर्द्धकथानक

प्रष्न-5 ‘सिंहावलोकन’ किसकी 

आत्मकथा है और कितने खंडों में है?

उत्तर-5-यषपाल, तीन खंडों में

प्रष्न-6 हरिवंष राय बच्चन की 

आत्मकथाओं के नाम लिखिए?

उत्तर-6-क्या भूलूं क्या याद करूं, 

नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, 

दस द्वार से सोपान तक 

प्रष्न-7 ‘मैं क्रांतिकारी कैसे बना’ किसकी आत्मकथा है ?

उत्तर-7-रामविलास षुक्ल

प्रष्न-8 पदुमलाल पन्नालाल बख्षी 

की आत्मकथा का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष बताएं?

उत्तर-8-मेरी अपनी कथा-1958

प्रष्न-9 किन्हीं तीन महिला 

लेखिकाओं के द्वारा लिखी 

आत्मकथाओं के नाम उनके प्रकाषन 

वर्ष के साथ लिखिए? 

उत्तर-9-बू़ंद बावडी-पदमा 

सचदेवा-1999, लगता नहीं है दिल 

मेरा-कृष्णा अग्निहोत्री-1997, 

हादेस-रमणिका गुप्ता-2005

प्रष्न-10 राधेष्याम कथावाचक की 

आत्मकथा-‘मेरा नाटक काल’ कब 

प्रकाषित हुई?

उत्तर-10-1957

प्रष्न-11 डॉ. देवराज की 

आत्मकथाआंे के नाम लिखिए?

उत्तर-11-बचपन के दो दिन, यौवन 

के द्वार पर

प्रष्न-12 ‘साठ वर्ष: एक रेखांकन’ 

आत्मकथा किसने लिखी है?

उत्तर-12-सुमित्रानंदन पंत

प्रष्न-13 मैत्रयी पुष्पा की आत्मकथा 

का नाम लिखिए?

उत्तर-13- कस्तूरी कुण्डल बसै, 

गुड़िया भीतर गुड़िया

प्रष्न-14 ‘अन्या से अन्नया’ आत्मकथा 

की लेखिका का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष लिखिए?

उत्तर-14- प्रभा खेतान-2007

प्रष्न-15 किन्ही दो दलित 

आत्मकथाओं एवं उनके लेखकों के 

नाम लिखिए?

उत्तर-15-जूठन-ओमप्रकाष 

वाल्मीकि, अपने अपने 

पिंजरे-मोहनदास नैमिषराय

1 मीनू- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

2 सरोज- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

3 सीमोन- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

4 सरीता- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

5 ज्योति कुमरी- बी.ए.-3, सीपीडी, 

जैन कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक

6 सतनामो- बी.ए.-3, सीपीडी, जैन 

कॉलेज, तिजारा, अलवर, 

राजस्थान-15 में 15 अंक


आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न

 आत्मकथा संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न 



प्रष्न -1. आत्मकथा की परिभाषा 

लिखिए?

प्रष्न-2. आत्मकथा की विषेषताएं 

बताएं?

प्रष्न-3 आत्मकथा के तत्वों के बारे 

में बताएं?

प्रष्न-4 बनारसी दास जैन की 

आत्मकथा का नाम लिखिए?

प्रष्न-5 ‘सिंहावलोकन’ किसकी 

आत्मकथा है और कितने खंडों में है?

प्रष्न-6 हरिवंष राय बच्चन की 

आत्मकथाओं के नाम लिखिए?

प्रष्न-7 ‘मैं क्रांतिकारी कैसे बना’ किसकी आत्मकथा है ?

प्रष्न-8 पदुमलाल पन्नालाल बख्षी 

की आत्मकथा का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष बताएं?

प्रष्न-9 किन्हीं तीन महिला 

लेखिकाओं के द्वारा लिखी 

आत्मकथाओं के नाम उनके प्रकाषन 

वर्ष के साथ लिखिए? 

प्रष्न-10 राधेष्याम कथावाचक की 

आत्मकथा-‘मेरा नाटक काल’ कब 

प्रकाषित हुई?

प्रष्न-11 डॉ. देवराज की 

आत्मकथाआंे के नाम लिखिए?

प्रष्न-12 ‘साठ वर्ष: एक रेखांकन’ 

आत्मकथा किसने लिखी है?

प्रष्न-13 मैत्रयी पुष्पा की आत्मकथा 

का नाम लिखिए?

प्रष्न-14 ‘अन्या से अन्नया’ आत्मकथा 

की लेखिका का नाम एवं प्रकाषन 

वर्ष लिखिए?

प्रष्न-15 किन्ही दो दलित 

आत्मकथाओं एवं उनके लेखकों के 

नाम लिखिए?



आरोप पत्र-क्या है, किसे कहते हैं. कैसे लिखें



 

हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-दो

 हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 

आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-दो


प्रश्न 31. हिंदी साहित्य का इतिहास किसने 

लिखा?

उत्तर - आचार्य रामचंद्र शुक्ल

प्रश्न 32. त्रिपिटक किनका महाग्रंथ है?

उत्तर -  बौद्ध धर्म का।

प्रश्न 33. कौटिल्य ने किस ग्रंथ की रचना की 

थी?

उत्तर - अर्थशास्त्र।

प्रश्न 34. आधुनिक हिंदी भाषा का उद्भव 

किससे माना जाता है?

उत्तर - अपभ्रंश के द्वारा

प्रश्न 35. अपभ्रंश का दुलारा छंद कौन सा है?

उत्तर - दोहा चौपाई।

प्रश्न 36. श्रावकाचार किसकी रचना है?

उत्तर - आचार्य समन्तभद्र।

प्रश्न 37. महामुद्रा किसे कहते हैं?

उत्तर - महामुद्रा बौद्ध धर्म के साधकों द्वारा की 

जाने वाली एक कठिन साधना है। जिसमें 

स्त्रियों का उपभोग किया जाता था।

प्रश्न 38. विजयपाल रासो किसकी रचना है?

उत्तर - नल्लसिंह भाट

प्रश्न 39. खुम्माण रासो के रचयिता कौन थे?

उत्तर - दलपति विजय।

प्रश्न 40. संदेश रासो के रचयिता क्या है नाम 

बताइए।

उत्तर - अब्दुर्रहमान।

प्रश्न 41. उपदेश रसायन रास के रचयिता के 

नाम बताइए

उत्तर - श्री जिनदत्त सूरी।

प्रश्न 42. वीरगाथा काल की प्रमुख प्रवृत्तियों का 

वर्णन कीजिए।

उत्तर - चाटुकारिता - इस काल में कवि धन, 

उपहार एवं सम्मान के लालच में आश्रयदाता 

राजाओं की चाटुकारिता की प्रवृत्ति पायी जाती 

थी जो की उस समय की रचनाओं में स्पष्ट रूप 

से देखने को मिलती है।

कल्पना की प्रधानता - इस काल के कवियों में 

राष्ट्रीय भक्ति का अभाव था लेकिन उनमें 

कल्पना करने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा मात्रा में 

व्याप्त थी।

आंखोदेखी रचना - इस काल के कवि केवल 

वीर रस की रचना ही नहीं किया करते थे बल्कि 

वे युद्ध के स्थान पर जाकर वहां कि स्थिति को 

देखकर उनका वैसा ही वर्णन किया करते थे।

प्रश्न 43. आदिकाल के सांस्कृतिक परिवेश को 

समझाइए

उत्तर - हर्षवर्धन के समय हिंदू संस्कृति की 

उन्नति अपने शिखर पर थी। सभी कलाओं में 

धार्मिक छाप देखी जा सकती थी। मुसलमानों 

के आगमन के साथ ही भारतीय संस्कृति पर 

मुस्लिम प्रभाव भी देखा जाने लगा था, हिंदू 

मुस्लिम साथ रहते हुए भी एक दूसरे को शंका 

की दृष्टि से देखते थे किंतु उत्सव और 

सांस्कृतिक प्रमुख पर्वों में हिंदू संस्कृति का 

प्रभाव अधिक था। इस प्रकार जहां एक और 

परंपराओं का मिलाजुला रूप उभर कर सामने 

आ रहा था वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति 

और साहित्य के लिए सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार हो 

रही थी। इस प्रकार का सुखद परिवेश उस 

समय देखने को मिलता है।

प्रश्न 44. सिद्ध साहित्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर - सिद्ध साहित्य का तात्पर्य वज्रयानी 

परंपरा के उन सिद्ध आचार्य के साहित्य से है 

जो अपभ्रंश तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं 

और जिन्होंने बौद्ध तांत्रिक सिद्धांतों को मान्यता 

दी है। शैव नाथपंथियों को भी सिद्ध कहा जाता 

था जो उन्हीं के समकालीन थे। किंतु बाद में 

शैव  योगियों के लिए नाथ और बौद्ध तांत्रिकों 

के लिए सिद्ध कहा जाने लगा। सिद्धों की 

रचनाएं प्रायः दोहा कोश और चर्यापदों के रूप 

में मिलती है। दोहा कोश दोहों से युक्त 

चतुष्पदियों की कड़क शैली में मिलते हैं।  कुछ 

दोहे टिकाओं में उपलब्ध हैं और कुछ 

दोहागीतियां बौद्ध तंत्रों और साधनाओं में मिलते 

हैं। चर्यापद बौद्ध तांत्रिक चर्या के समय गाए 

जाने वाले पद हैं जो विभिन्न सिद्धाचार्यों के 

द्वारा लिखे गए हैं।

सिद्धों का संबंध बौद्ध धर्म की ब्रजयानी शाखा 

से है।  यह भारत के पूर्वी भाग में सक्रिय थे।  

इनकी संख्या 84 मानी जाती है जिनमें सरहप्पा, 

शबरप्पा, लुइप्पा, डोम्भिप्पा, कुक्कुरिप्पा आदि 

मुख्य हैं।  सरहप्पा प्रथम सिद्ध कवि थे।  

उन्होंने ब्राह्मणवाद, जातिवाद और बाह्यचारों पर 

प्रहार किया।  देहवाद का महिमा मंडन किया 

और सहज साधन पर बल दिया।  यह महासुख 

वाद द्वारा ईश्वरत्व की प्राप्ति पर बल देते हैं।

प्रश्न 45. रासो साहित्य से आप क्या समझते हैं?

उत्तर - हिंदी साहित्य में रास या रासक का 

अर्थ लास्य से है जो नृत्य का एक भेद है।  

अतः इसी अर्थ के आधार पर गीत नृत्य परक 

रचनाएँ रास के नाम से जानी जाती हैं। रासो  

या  राउस  में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, 

छप्पर, कुंडलियां पद्धटिका आदि छंद प्रयुक्त होते 

हैं इस कारण ऐसी रचनाएं  रासो  के नाम से 

जानी जाती हैं।

रासो गानयुक्त परम्परा से विकसित होते होते 

उपरूपक और  उपरूपक से वीर रस से 

पद्यात्मक प्रबंधों में परिवर्तित हो गया है। इस 

रासो काव्य में युद्ध वर्णन से भरी हुई रचना हैं।

प्रश्न 46. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर 

प्रकाश डालिए।

उत्तर - हिंदी साहित्य के इतिहास के काल 

विभाजन के नामकरण को देखा जाए तो इसे 

नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा आचार्य रामचंद्र 

के द्वारा किये गए काल विभाजन को स्वीकार 

किया गया और उन्होंने इसे चार भागों में बांटा 

था। आदिकाल प्रथम भाग है तथा शेष क्रमशः 

भक्तिकाल , रीतिकाल और आधुनिक काल हैं। 

और इसी प्रकार के काल विभाजन को इस सभा 

ने मान्य किया।

काल विभाजन के संबंध में विद्वानों के मत

जार्ज ग्रियरसन - इन्होंने ही सबसे पहले काल 

विभाजन का प्रयास किया और इन्होंने आदिकाल 

को चारण काल का नाम दिया और इसका 

आरम्भिक समय 700 से 1300 ई. तक माना है।

मिश्रबंधुओं के अनुसार - मिश्रबंधुओं ने इस 

काल को आरम्भिक काल का नाम दिया और 

यह ग्रियरसन के काल विभाजन से कहीं अधिक 

प्रोढ़ था। इन्होंने इसे आरम्भिक काल का नाम 

दिया था। इसके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 

इसे 1920 में वीरगाथा काल का नाम दिया और 

यह आज भी उपयोग में लाया जाता है।



हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर

हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 

आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-एक


यूजीसी नेट/जेआरएफ एवं अन्य हिन्दी साहित्य 

की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए

प्रश्न-1 -हिन्दी काव्य के इतिहास को कितने 

काल-खण्डों में विभाजित किया जाता है? उनके 

नाम लिखिए।

उत्तर-चार

1. आदिकाल (वीरगाथाकाल) - सन् 993 ई० 

से सन् 1318 ई० तक।

2. पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल) - सन् 1318 ई० 

से सन् 1643 ई० तक।

3. उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल) - सन् 1643 ई० 

से सन् 1843 ई० तक।

4. आधुनिककाल (गद्यकाल) - सन् 1843 ई० 

से अब तक।

प्रश्न 2-कविता के बाह्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-

1. लय,

2. तुक,

3. छन्द,

4. शब्द-योजना,

5. चित्रात्मक भाषा तथा

6. अलंकार।

प्रश्न 3-कविता के आन्तरिक तत्त्व कौन-कौन से हैं?

उत्तर-

1. अनुभूति की व्यापकता,

2. कल्पना की उड़ान,

3. रसात्मकता और सौन्दर्य बोध तथा

4. भावों का उदात्तीकरण।

प्रश्न 4-प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य में अन्तर 

स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-प्रबन्ध काव्य में ऐसी धारावाहिक कथा 

होती है, जिसमें किसी घटना या कार्य का 

काव्यात्मक वर्णन होता है, किन्तु मुक्तक काव्य में 

प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है, उनका कथा रूप में 

सूत्रबद्ध होना अनिवार्य नहीं।

प्रश्न 5-हिन्दी पद्य-साहित्य के इतिहास के 

विभिन्न कालों के नाम लिखिए।

उत्तर-

1. वीरगाथाकाल ( आदिकाल),

2. भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल),

3. रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) एवं

4. आधुनिककाल।

प्रश्न 6-काव्य के कितने भेद होते हैं?

उत्तर-काव्य के दो भेद होते हैं

1. श्रव्य काव्य और

2. दृश्य काव्य।

प्रश्न 7-प्रबन्ध काव्य के कितने भेद होते हैं?

उत्तर-

प्रबन्ध काव्य के दो भेद होते हैं

1. महाकाव्य और

2. खण्डकाव्य।

प्रश्न 8-महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर बताएं।

उत्तर-महाकाव्य की कथा में जीवन की सर्वांगीण झाँकी होती है, जबकि खण्डकाव्य में जीवन के एक पक्ष का चित्रण होता है। महाकाव्य की विस्तृत कथावस्तु पर अनेक खण्डकाव्य लिखे जा सकते हैं।

प्रश्न 9-दो महाकाव्यों के नाम लिखिए ।

उत्तर-दो महाकाव्यों के नाम हैं

1. श्रीरामचरितमानस और

2. कामायनी।

प्रश्न 10-दो खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।

उत्तर-दो खण्डकाव्यों के नाम हैं

1. जयद्रथ-वध और

2. हल्दीघाटी।

प्रश्न 11-हिन्दी का प्रथम कवि किसे माना जाता 

है?

उत्तर-कुछ विद्वान सरहपा को हिन्दी का प्रथम 

कवि मानते हैं। उनका रचना-काल 769 ई० से 

प्रारम्भ हुआ। जबकि कुछ विद्वान स्वयंभू को 

हिन्दी को प्रथम कवि मानते हैं।

प्रश्न 12-हिन्दी-साहित्य का आदिकाल किस 

साम्राज्य की समाप्ति के समय से प्रारम्भ होता 

है?

उत्तर-वर्द्धन साम्राज्य की समाप्ति के समय से 

हिन्दी साहित्य का आदिकाल प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 13-हिन्दी के आदिकाल का समय निर्देश 

कीजिए और हिन्दी के प्रथम कवि का नाम 

बताइए।

उत्तर-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार 

आदिकाल का समय 993 ई० से 1318 ई० तक 

माना जाता है। सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि 

माना जाता है।

प्रश्न 14. हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य किसे 

कहा जाता है।

उत्तर - पृथ्वीराज रासो।

प्रश्न 15-आदिकाल (वीरगाथाकाल) की प्रमुख 

विशेषताएँ बताइए।

या

आदिकालीन हिन्दी-साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों 

पर प्रकाश डालिए।

या

आदिकाल (वीरगाथाकाल) की किन्हीं दो प्रमुख 

काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।

या

आदिकाल के योगदान की किन्हीं दो विशेषताओं 

का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-विशेषताएँ - (1) आदिकाल में अधिकांश 

रासो ग्रन्थ लिखे गये; जैसे-पृथ्वीराज रासो, 

परमाल रासो आदि। इनमें आश्रयदाताओं की 

अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा है। (2) वीर और श्रृंगार 

रस की प्रधानता है। (3) युद्धों का सुन्दर और 

सजीव वर्णन किया गया है। (4) काव्यभाषा के 

रूप में डिंगल और पिंगल का प्रयोग हुआ है। 

(5) काव्य-शैलियों में प्रबन्ध और गीति शैलियों 

का प्रयोग मिलता है। (6) सामूहिक राष्ट्रीयता 

की भावना का अभाव रहा है।

प्रश्न 16-आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख 

कवियों और उनकी कृतियों के नाम बताइए।

या

वीरगाथाकाल के किन्हीं दो प्रमुख काव्यों 

(रचनाओं) के नाम लिखिए।

उत्तर-आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवि 

और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं - चन्दबरदायी 

(पृथ्वीराज रासो), नरपति-नाल्ह (बीसलदेव 

रासो), दलपति विजय (खुमान रासो), जगनिक 

(परमाल रासो या आल्हखण्ड), विद्यापति 

(पदावली), अब्दुल रहमान (सन्देश रासक), 

स्वयंभू (पउमचरिउ), धनपाल (भविसयत्तकहा), 

जोइन्दु (परमात्मप्रकाश), पुष्पदन्त (उत्तरपुराण) 

एवं अमीर खुसरो की फुटकर रचनाएँ।

प्रश्न 17-वीरगाथाकाल (आदिकाल) में साहित्य 

रचना की प्रमुख धाराओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-इस काल की तीन प्रमुख काव्यधाराएँ 

निम्नलिखित हैं

1. संस्कृत काव्यधारा,

2. प्राकृत एवं अपभ्रंश काव्यधारा तथा

3. हिन्दी काव्यधारा।

प्रश्न 18-आदिकाल के विभिन्न नाम बताइए।

या

‘वीरगाथाकाल के लिए प्रयुक्त दो अतिरिक्त नामों 

का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-वीरगाथाकाल, अपभ्रंशकाल, सन्धिकाल, 

आविर्भावकाल, चारणकाल, बीजवपनकाल एवं 

सिद्ध-सामन्त युग आदि।

प्रश्न 19-वीरगाथाकाल के चार प्रमुख कवियों के 

नाम बताइए।

या

आदिकाल के किन्हीं दो कवियों (रचनाकारों) के 

नाम लिखिए।

उत्तर-चन्दबरदायी, नरपति नाल्ह, दलपति विजय 

एवं जगनिक।

प्रश्न 20-आदिकाल की चार प्रमुख कृतियों के 

नाम बताइए।

या

दो रासो काव्यों के नाम लिखिए।

उत्तर-पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, परमाल 

रासो (आल्हखण्ड) एवं विद्यापति पदावली।

प्रश्न 21-वीरगाथाकाल में रचनाएँ 

कौन-कौन-से काव्य -पदों में लिखी गयीं?

उत्तर-प्रबन्धकाव्य और वीर गीतों के रूप में।

प्रश्न 22-वीरगाथाकाल की रचनाओं में कौन-सी 

भाषा प्रयुक्त हुई है?

या

रासो ग्रन्थों में किन दो भाषाओं का प्रयोग 

किया गया है?

उत्तर-डिंगल और पिंगल।

प्रश्न 23. देवताओं की लिपि किसे कहा जाता 

है?

उत्तर - देवनागरी लिपि।

प्रश्न 24-आदिकाल के साहित्य को कितने वर्गों 

में विभाजित किया जा सकता है?

उत्तर-पाँच वर्गों में - (1) सिद्ध साहित्य, (2) 

जैन साहित्य, (3) नाथ साहित्य, (4) रासो 

साहित्य, (5) लौकिक साहित्य,

प्रश्न 25-जैन साहित्य का सबसे अधिक 

लोकप्रिय रूप किन ग्रन्थों में मिलता है?

उत्तर-जैन साहित्य को सर्वाधिक लोकप्रिय रूप 

‘रास ग्रन्थों में मिलता है।

प्रश्न 26-नाथ साहित्य के प्रणेता कौन थे? नाथ 

साहित्य के दो कवियों के नाम लिखिए।

उत्तर-नाथ साहित्य के प्रणेता मत्स्येन्द्र नाथ थे। 

इस साहित्य के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं - 

गोरखनाथ, तथा जलन्धर।।

प्रश्न 27. संसार की सबसे प्राचीन भाषा का नाम 

क्या है?

उत्तर - संस्कृत।

प्रश्न 28-आदिकाल के सिद्ध साहित्य और जैन 

साहित्य के एक-एक प्रमुख कवि का नाम 

लिखिए।

उत्तर-सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं - 

सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा आदि 

जैन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-आचार्य देवसेन, 

मुनिंशमलिभद्र सूरि, विजयसेन सूरि, जिनधर्म 

सूरि आदि।

प्रश्न 29-गोरखनाथ के गुरु का क्या नाम था?

उत्तर-गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ 

(मछन्दरनाथ) था।

प्रश्न 29. नाथ संप्रदाय का प्रवर्तक किसे माना 

जाता है?

उत्तर - आदिनाथ।

प्रश्न 30. हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का 

पहला सफल प्रयास किसने किया ?

उत्तर - जॉर्ज ग्रियर्सन।


Wednesday, January 26, 2022

‘दिग्दर्शक’ के दर्शन के लिए नहीं उमडे़ दर्शक

 

दिग्दर्शक’ के दर्शन के लिए नहीं उमडे़ दर्शक

यह समीक्षा मात्र इस नाटक की समीक्षा नहीं है अपितु अलवर रंगमंच की समीक्षा है। क्योंकि इस नाटक एवं इन कलाकरों के बहाने अनेक बातों पर टिप्पणी इस समीक्षा में है।


अलवर के हारूमल तोलानी ऑडिटोरियम में 21 जनवरी 2022 को दिग्दर्शक नाटक का मंचन किया गया। लगभग 50 मिनट की अवधि का यह नाटक प्रियम जानी द्वारा लिखा गया है और प्रियंका खांडेकर ने इसे निर्देशित किया। तीन पुरुष पात्रीय नाटक ‘दिग्दर्शक’ नाटक और फिल्म के अभिनेताओं को केंद्र में रखते हुए, परिवार की जिम्मेदारी भी एक कलाकार के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि उसके लिए थिएटर या फिल्म में काम करना, इस बात को केन्द्र में रखकर लिखा गया है।

अलवर में हारूमल तोलानी ऑडिटोरियम बनना निश्चित रूप से अलवर के लिए एक सुखद कलात्मक संदेश है और नव तथा पुरातन सभी कलाकार, कला प्रेमी, साहित्य जगत के लोग यहां समय अंतराल पर आ रहे हैं और इस गैर सरकारी ऑडिटोरियम में होने वाली प्रस्तुतियों के लिए उत्साहवर्धन कर रहे हैं। सरकार जहां पर कलात्मक रूप को बढ़ावा देने के लिए कमजोर साबित हुई है, वहीं हारूमल तोलानी एक बेहतर विकल्प के रूप में अलवर कलाजगत के लिए साबित हो रहा है। अलवर में प्रताप ऑडिटोरियम जैसा विषाल, भव्य और सुंदर सरकारी ऑडिटोरियम होने के बाद भी गैर सरकारी ऑडिटोरियम हारूमल तोलानी का चुनाव क्यों? इसकी वजह है प्रताप ऑडिटोरियम की दर बहुत महंगी है। इस कारण अलवर के कलाकार एवं अलवर में होने वाली नाट्य एवं अन्य कलात्मक-साहित्यिक प्रस्तुतियों के लिए अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस कारण हारूमल तोलानी एक बेहतर विकल्प है।

अब सवाल यह है कि इसमें लगातार प्रस्तुतियां और अच्छी प्रस्तुतियां होनी चाहिएं। 21 जनवरी को होने वाली नाट्य प्रस्तुति दिग्दर्शक आलेख के रूप में निश्चित रूप से एक बेहद ही अच्छा नाटक कहा जा सकता है। एक बहुत ही सामान्य सी कथा के ताने-बाने को आलेख के रूप में रचने में लेखक सफल हुए हैं। एक व्यक्ति जो नाटक का, रंगमंच का कलाकार होता है वह फिल्मी दुनिया का बड़ा स्टार बन जाता है और बड़ा स्टार बनने के बाद वह अपने नाट्य गुरु के पास एक बार आता है और उनसे बातचीत करते हुए पूछता है कि आप मुझसे नाराज क्यों हैं तथा आपको सिनेमा से नफरत क्यों हैं? नाट्य गुरु उसे पहले तो जवाब नहीं देता है। फिर वह शर्त रखता है कि मैं तुमसे नाराज नहीं हूं लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी इस बात का जवाब तब दूंगा जब तुम मेरी बात का जवाब दोगे कि तुम मुझे छोड़कर गए क्यों? तुम थिएटर छोड़कर फिल्मों में क्यों गए? तो वह कलाकार बताता है आपने एक थिएटर कलाकार की भूमिका तो बेहतर तरीके से निभाई परंतु एक पिता की भूमिका निभाने में कहीं न कहीं आप कमजोर साबित हुए। आपके बेटे को एक पिता के रूप में आपका प्रेम नहीं मिल सका। वह उन तमाम चीजों से वंचित रहा जिसके कारण कि उसका भविष्य और उसका संवेदनात्मक, भावनात्मक विकास बेहतर हो सकता था। उसी ने ही मुझे प्रेरित किया कि मेरे पिताजी के तुम बहुत ही पसंदीदा कलाकार हो। अतः तुम उन्हें धोखा दे दो और नाटक छोड़कर फिल्मों में चले जाओ और फिल्मों में अधिक पैसा एवं प्रतिष्ठा भी है। तुम वहां सफल भी हो सकते हो और शायद तुम्हारे कारण मुझे मेरा पिता मिल जायेगा। यह सुनकर नाट्य गुरु को बहुत दुख होता है। वह कहता है कि मैं तुम्हारी फिल्में देखता हूं लेकिन मैं चाहता था कि एक अच्छा होनहार थिएटर में काम करने वाला व्यक्ति जिससे दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें, वह यदि थिएटर में होता तो निश्चित रूप से थिएटर का, कला का और ज्यादा भविष्य संवर सकता था। बेहतर हो सकता था। नाट्य गुरू इस बात पर दुख प्रकट करता है कि एक अच्छा पिता वह नहीं बन सका। बाद में दोनों खुष होते हैं कि दोनों ने ही अपना कार्य किया। लेकिन कुछ छूट भी गया।

नाटक में एक जगह कुछ संवाद हैं कि ‘थिएटर में आप इतना ऊंचा बोलो कि सभी दर्शक सुन सकें, इतना सही उच्चारण हो कि भाषा और किरदार के साथ न्याय हो सके, इस तरह से चलो कि वहां पर वह चाल आप की नहीं बल्कि उस किरदार की लगे, मंच पर उस समय ऐसा व्यवहार करो कि वहां पर आपको नहीं लोग उस किरदार के रूप में आपको पहचानें।’ लेकिन जब यही सारी चीजें स्वयं कलाकार न करता हुआ दिखाई देता हो तो उस नाटक के साथ ही अन्याय नहीं, रंगमंच के साथ, कला के साथ एवं नाटक देखने आए दर्शकों के साथ भी अन्याय है। यह बात इस नाटक में दिखाई दी।

नाटक में दर्शकों का अभाव एक सबसे बड़ी समस्या रही है लेकिन यह अभाव है क्यों? जो दर्शक हमारे पास आज किसी भी कारण से आ गया है, क्या हम उसे उस 1 घंटे में ऐसा कुछ दे पाते हैं जिससे कि वह पुनः आने के लिए प्रेरित हो, लालायित हो, बेचैन हो या मजबूर हो? कलाकार के पास इन सवालों के जवाब यदि हैं तो शायद दर्शक नाटक देखने आयेगा। एक नाटक अभिनेता के रूप में अक्सर ये कमियां अनेक कलाकारों के रूप में दिखाई देती हैं। विशेष रूप से अलवर के कलाकारों के संदर्भ में बात करें तो।

लगातार नाट्य प्रस्तुतियां करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है लेकिन अच्छी प्रस्तुतियां करना बड़ी बात है। हां यह जरूर है कि लगातार प्रस्तुतियां भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कुछ लोगों को प्रेरित करती हैं, वह भी एक प्रेरणा का संदेश है। परंतु यदि वह कमजोर रहती है तो वह कहीं न कहीं थिएटर को, कला को, दर्शकों को भी कमजोर करती है। कलाकार की कलात्मक प्रस्तुतियां इतनी प्रभावी होनी चाहिए कि एक बार उस कला में रुचि रखने वाला व्यक्ति देखे तो वह पुनः देखने के लिए लालायित हो और दोबारा आपके नाम से उस कला को देखने के लिए वह आए तथा अन्य लोगों को भी लाए। सवाल यह है कि यह कैसे हो? तो यह होगा परिश्रम के साथ, डेडीकेशन के साथ। हमारी तकनीकी चीजें अगर किसी रूप से बहुत प्रभावी नहीं हैं तो उनकी खामियां कहीं न कहीं नजरअंदाज की जा सकती हैं। जैसे उदाहरण के लिए हमारे पास कॉस्टयूम प्रॉपर नहीं है, लाइट प्रॉपर नहीं है, साउंड की व्यवस्था प्रॉपर नहीं है, स्टेज पर जो प्रॉपर्टी चाहिए वह नहीं है या मेकअप प्रॉपर नहीं है तो ये सारी कमियां कहीं न कहीं एक दर्शक नजरअंदाज कर सकता है। हालांकि ये सभी रंगमंच के अंग हैं और इनके बिना रंगमंच, अभिनय अधूरा है, नाटक अधूरा है। लेकिन फिर भी मुख्य रूप से कलाकार का कार्य सबसे प्रमुख है। यदि वह अपने अभिनय में, अपनी कला में, अपने कार्य में कहीं पर भी कमजोर साबित होता है तो वह एक दर्शक को ज्यादा बडी कमी के रूप में अखरता है। अतः अलवर के निर्देशकों को इस ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है। कई बार किसी सामान्य दर्शक की या नाटक में रुचि रखने वाले दर्शक की एक सामान्य टिप्पणी नाटक को देखने के बाद होती है कि ‘मजा नहीं आया’। तो प्रस्तुति देने वाले कलाकारों को या नाटक से जुड़े हुए, उस प्रस्तुति से जुड़े हुए लोगों को यह टिप्पणी थोड़ी सी अच्छी नहीं लगती है। लेकिन इस टिप्पणी का अर्थ यह जरूर है कि कहीं न कहीं वह व्यक्ति अपनी जिन अपेक्षाओं को, अपनी जिन आकांक्षाओं को लेकर के आया था उनकी पूर्ति नहीं हुई। क्योंकि जो प्रस्तुति आप दे रहे हैं उसके साथ उसका जुड़ाव उस रूप में नहीं हो पाया जिस रूप में आप करना चाहते थे। क्योंकि यदि आप उस रूप में एक दर्शक का जुड़ाव करते तो शायद उसके मुंह से यह टिप्पणी नहीं निकलती और वह आपकी कला के प्रति, नाटक के प्रति चाहे बहुत प्रफुल्लित नहीं होता लेकिन प्रेरित होता और उसके मन में जिज्ञासा और अपेक्षाएं जन्म लेती कि शायद एक अलग तरह का कलात्मक अनुभव रहा यह। जिसको जीने का, समझने का, देखने का, करने का भी अपना एक अलहदा आनंद है और वह उसे बार-बार देखने के लिए प्रेरित होता और अन्य लोगों को प्रेरित भी करता। (इसमें हम उन दर्षकों को नहीं गिन रहे हैं जो 12 साल से छोटे हैं या जिन्होंने नाटक के बारे कुछ भी न सुना, पढा हो।) अलवर के नाट्य निर्देशकों को, अलवर के कलाकारों को, अलवर के कला और साहित्य प्रेमियों को इस ओर ध्यान देने की शायद कुछ अधिक आवश्यकता है।

कुणाल सिंह, निखिल कुमार, योगेन्द्र चौहान के द्वारा यह नाटक अभिनीत किया गया। कुणाल सिंह की बात करें तो एक समर्पित कलाकार तो कुणाल सिंह हैं, लेकिन अच्छे अभिनेता के रूप में अभी कुणाल सिंह की प्रस्तुति आनी शेष है। इन तीनों कलाकारों में कुणाल सिंह ही सबसे अनुभवी कलाकार हैं। फिर भी कुणाल सिंह की प्रस्तुति काफी कमजोर रही। हालांकि पूर्व की तुलना में कुणाल में सुधार है लेकिन कुणाल से और अपेक्षाएं थीं और हैं। मंच पर नाटक में अभिनय के रूप में निखिल कुमार और योगेन्द्र चौहान दोनों ही कलाकारों का यह पहला प्रयास था। एक नाटक में अभिनय करने के रूप में देखा जाए तो पहले प्रयास में ये काफी सफल रहे। इन बच्चों ने काफी मेहनत की। इनके निर्देशक ने इनसे काफी मेहनत करवाई होगी या जिससे भी इन्होंने प्रेरणात्मक रूप से इन किरदारों के लिए जो काम किया वह सराहनीय कहा जा सकता है। यूं हर काम में हमेशा कोई न कोई गुंजाइश रहती है। संपूर्ण अपने आप में कोई नहीं होता। लेकिन फिर भी प्रेरणा देने का काम, प्रभाव डालने का काम इन्होंने किया। निखिल कुमार और योगेन्द्र चौहान नवोदित कलाकार होने के बावजूद भी इनका प्रयास एक सराहनीय और बढ़ते कदम की ओर कहा जा सकता है। कुणाल को जहां तक मैं जानता हूं उसका तीसरा या चौथा नाटक है यह और पिछले कई वर्षों से लगातार वह नाटक कर रहे हैं। वह बात अलग है कुछ परिस्थितियों के कारण उन्होंने बीच में नाटक छोड़ दिया था। एक दूरी बना ली थी और कुछ व्यक्तिगत कारणों से, समस्याओं से जूझ रहे थे और उन समस्याओं से निकल करके नाटक करना भी अपने आप में एक बड़ा काम है लेकिन जब आप मंच पर होते हो, तो एक दर्शक चाहे वह नवीन हो या पुराना, वह आपको उस पात्र के रूप में देखता है, आपसे जुड़ी हुई समस्याओं के रूप में आपको नहीं देखता है। और वही दर्शक आपको उस मंच पर प्रस्तुति के लिए प्रेरित करने वाले निर्देशक को या मंच पीछे काम करने वाले अन्य लोगों को भी उसी रूप में देखता है। उसमें कहीं पर भी कमी नजर आती है तो व्यक्तिगत रूप से आपकी, आपके निर्देशक की, नाट्य टीम की वह सबसे पहली कमी है। ये बातें सिर्फ इस प्रस्तुति पर या इस प्रस्तुति से जुडे कलाकारों पर ही लागु नहीं होती है अपितु अन्य प्रस्तुतियों और कलाकारों पर भी लागु होती हैं।

हालांकि हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती हैं। वह एक अलग बात है लेकिन जो लगभग चार-पांच वर्षों से या इससे अधिक नाटक से जुड़े हुए हैं। नाटक के अनेक पक्षों पर काम कर चुके हैं, वे जब बार-बार गलतियां करते हों तो शायद उन्हें वे गलतियां गलतियां न लगती होंगी या वे उन गलतियों में या ऐसा करने के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें यही सबसे उच्चतम और बेहतर श्रेणी लगती हो। या फिर यह कह सकते हैं कि उनका एक तरह से कंफर्ट जोन बन जाता है यह, और इस कंफर्ट जोन में रहने के कारण उन्हें यह लगता है कि अच्छा कर रहे हैं, बेहतर कर रहे हैं। लेकिन एक दर्शक को वह कमी खलती है। उससे बाहर निकलने की आवश्यकता है।

आज की तारीख में सोशल मीडिया, यूटयूब का तेज गति से चलने वाला जमाना है। यदि इंटरेस्ट नहीं आता है तो व्यक्ति तुरंत चैनल बदल देता है या उसे फॉरवर्ड कर देता है। सड़क पर तमाशा दिखाने वाले मदारी की अभिव्यक्ति में, उसके प्रस्तुतीकरण में यदि उतनी चुंबकीय क्षमता नहीं होगी जैसे कि वह चलते हुए व्यक्ति को न रोक सके तो उसकी कला को कोई नहीं देखेगा। यह भी सत्य बात है कि हजारों लोग चलते हैं लेकिन मुश्किल से 50 लोग उसकी कला को देखने के लिए रुकते हैं। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हम हर व्यक्ति को एक दर्शक के रूप में पाएं। या हर व्यक्ति को नाटक देखने या दिखाने के लिए मजबूर करें। या जो दर्शक हमारे पास आ गया है, उससे अपेक्षा रखें कि वह सारी चीजों को उसी रूप में समझेगा जिस रूप में हम बताना चाहते हैं। क्योंकि हमारे पास जो दर्शक आया है वह अलग-अलग उम्र का, अलग-अलग क्षेत्र का, अलग-अलग वर्ग का है। लेकिन इतना हम ध्यान रखें हमारे पास जो दर्शक आ गया है, उसके कॉन्शियस या सबकॉन्शियस में यह बात अवश्य जानी चाहिए की नाट्य कला अन्य कलाओं से कैसे पृथक है, उसका जो आनंद है वह कहीं अन्य नहीं है। वह आनंद मनोरंजनात्मक रूप से, संदेशात्मक रूप से या कलात्मक रूप से उस तक पहुंचना चाहिए। उसका उससे जुड़ाव होना चाहिए। चाहे आंशिक रूप से ही सही। यह जुड़ाव जब उस दर्शक के साथ होने लग जाएगा तो पूर्णतः नहीं लेकिन कहीं न कहीं यह दर्शक एक नाटक का दर्शक, आपका दर्शक बन जाएगा और अन्य दर्शकों को शायद प्रेरित भी करने लगेगा नाटक देखने के लिए।

तकनीकी निर्देशन किया अलवर के वरिष्ठ कलाकार अविनाश सिंह ने। तकनीकी पक्ष से इस नाटक में दो या तीन फैड आउट पर्याप्त थे। क्योंकि नाटक की कथा में दो या तीन मोड़ थोड़े से अलग हैं जो कहानी को बदलते हैं। लेकिन उसके बावजूद भी जो प्रकाश व्यवस्था थी, जिसमें फैड आउट था वह बहुत बार अनावश्यक थी। कहीं न कहीं वह प्रस्तुति को अप्रभावित करती रही। दूसरी बात प्रकाश व्यवस्था का संचालन और कलाकारों का मंच पर आना-जाना इसमें भी तालमेल की कमी दिखाई दी। फैड आउट या किसी दृश्य का समापन या प्रकाष व्यवस्था उस प्रस्तुति में जीवंतता लाते हैं। नए दृश्य के साथ जोड़ने की उत्सुकता पैदा करते हैं। कहानी में आगे क्या घटित होगा इसके लिए दर्शक को उत्साहित करते हैं, प्रेरित करते हैं, जानने के लिए। लेकिन वही फैड आउट यदि आपको बात करने के लिए, आपको इरिटेट करने के लिए कहानी के जुड़ाव में बाधा उत्पन्न करने के लिए बाधक के रुप में दिखाई दे तो कहीं न कहीं अनावश्यक है।

नाटक या कोई भी कला एक दिन में प्रमुख या बेहतर या प्रखरता नहीं ला सकती। प्रतिदिन सीखने की कला है यह। उसे दिन प्रतिदिन सीखते जाते हैं तो उसमें धीरे-धीरे सुधार होता जाता है और यह अपेक्षा भी नहीं है कि एक ही दिन में सब कुछ बेहतर हो जाए लेकिन अनेक सालों से काम करने के बाद भी बार बार उन्हीं कमियों की पुनरावृति दिखाई दे तो सवाल उठता है। इस प्रस्तुति में कुछ कमियां नजर आईं और इस प्रस्तुति के माध्यम से कुछ अन्य कमियां जो व्यक्तिगत रूप से मुझे अनुभव हुई और अन्य लोगों से बात करने के बाद जो उनको भी कमियां लगीं उनको मैंने समीक्षात्मक रूप से यहां प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह समीक्षा थोड़ी सी कड़वी हो सकती है लेकिन इसका जो भाव है वह कहीं पर भी कड़वाहट पैदा नहीं करेगा, ऐसी मुझे आशा है। लगभग 6 माह बाद अलवर में प्रस्तुति देखने का एक अवसर मिला तो उससे भी मुझे थोड़ी आशा ज्यादा हो गई थी कि अच्छी और बेहतर प्रस्तुतियां होंगी। फिर भी ‘दिग्दर्शन’ नाटक की पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई।

प्रस्तुति-प्रदीप प्रसन्न

ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर, तहसील-किशनगढ बास, जिला-अलवर, राजस्थान पिन-301405, मोबाईल-9460142690, 8619238014, मेल- pradeepbas@gmail.com

 

 
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