Monday, February 14, 2022
हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-दो
हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-दो
प्रश्न 31. हिंदी साहित्य का इतिहास किसने
लिखा?
उत्तर - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
प्रश्न 32. त्रिपिटक किनका महाग्रंथ है?
उत्तर - बौद्ध धर्म का।
प्रश्न 33. कौटिल्य ने किस ग्रंथ की रचना की
थी?
उत्तर - अर्थशास्त्र।
प्रश्न 34. आधुनिक हिंदी भाषा का उद्भव
किससे माना जाता है?
उत्तर - अपभ्रंश के द्वारा
प्रश्न 35. अपभ्रंश का दुलारा छंद कौन सा है?
उत्तर - दोहा चौपाई।
प्रश्न 36. श्रावकाचार किसकी रचना है?
उत्तर - आचार्य समन्तभद्र।
प्रश्न 37. महामुद्रा किसे कहते हैं?
उत्तर - महामुद्रा बौद्ध धर्म के साधकों द्वारा की
जाने वाली एक कठिन साधना है। जिसमें
स्त्रियों का उपभोग किया जाता था।
प्रश्न 38. विजयपाल रासो किसकी रचना है?
उत्तर - नल्लसिंह भाट
प्रश्न 39. खुम्माण रासो के रचयिता कौन थे?
उत्तर - दलपति विजय।
प्रश्न 40. संदेश रासो के रचयिता क्या है नाम
बताइए।
उत्तर - अब्दुर्रहमान।
प्रश्न 41. उपदेश रसायन रास के रचयिता के
नाम बताइए
उत्तर - श्री जिनदत्त सूरी।
प्रश्न 42. वीरगाथा काल की प्रमुख प्रवृत्तियों का
वर्णन कीजिए।
उत्तर - चाटुकारिता - इस काल में कवि धन,
उपहार एवं सम्मान के लालच में आश्रयदाता
राजाओं की चाटुकारिता की प्रवृत्ति पायी जाती
थी जो की उस समय की रचनाओं में स्पष्ट रूप
से देखने को मिलती है।
कल्पना की प्रधानता - इस काल के कवियों में
राष्ट्रीय भक्ति का अभाव था लेकिन उनमें
कल्पना करने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा मात्रा में
व्याप्त थी।
आंखोदेखी रचना - इस काल के कवि केवल
वीर रस की रचना ही नहीं किया करते थे बल्कि
वे युद्ध के स्थान पर जाकर वहां कि स्थिति को
देखकर उनका वैसा ही वर्णन किया करते थे।
प्रश्न 43. आदिकाल के सांस्कृतिक परिवेश को
समझाइए
उत्तर - हर्षवर्धन के समय हिंदू संस्कृति की
उन्नति अपने शिखर पर थी। सभी कलाओं में
धार्मिक छाप देखी जा सकती थी। मुसलमानों
के आगमन के साथ ही भारतीय संस्कृति पर
मुस्लिम प्रभाव भी देखा जाने लगा था, हिंदू
मुस्लिम साथ रहते हुए भी एक दूसरे को शंका
की दृष्टि से देखते थे किंतु उत्सव और
सांस्कृतिक प्रमुख पर्वों में हिंदू संस्कृति का
प्रभाव अधिक था। इस प्रकार जहां एक और
परंपराओं का मिलाजुला रूप उभर कर सामने
आ रहा था वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति
और साहित्य के लिए सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार हो
रही थी। इस प्रकार का सुखद परिवेश उस
समय देखने को मिलता है।
प्रश्न 44. सिद्ध साहित्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर - सिद्ध साहित्य का तात्पर्य वज्रयानी
परंपरा के उन सिद्ध आचार्य के साहित्य से है
जो अपभ्रंश तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं
और जिन्होंने बौद्ध तांत्रिक सिद्धांतों को मान्यता
दी है। शैव नाथपंथियों को भी सिद्ध कहा जाता
था जो उन्हीं के समकालीन थे। किंतु बाद में
शैव योगियों के लिए नाथ और बौद्ध तांत्रिकों
के लिए सिद्ध कहा जाने लगा। सिद्धों की
रचनाएं प्रायः दोहा कोश और चर्यापदों के रूप
में मिलती है। दोहा कोश दोहों से युक्त
चतुष्पदियों की कड़क शैली में मिलते हैं। कुछ
दोहे टिकाओं में उपलब्ध हैं और कुछ
दोहागीतियां बौद्ध तंत्रों और साधनाओं में मिलते
हैं। चर्यापद बौद्ध तांत्रिक चर्या के समय गाए
जाने वाले पद हैं जो विभिन्न सिद्धाचार्यों के
द्वारा लिखे गए हैं।
सिद्धों का संबंध बौद्ध धर्म की ब्रजयानी शाखा
से है। यह भारत के पूर्वी भाग में सक्रिय थे।
इनकी संख्या 84 मानी जाती है जिनमें सरहप्पा,
शबरप्पा, लुइप्पा, डोम्भिप्पा, कुक्कुरिप्पा आदि
मुख्य हैं। सरहप्पा प्रथम सिद्ध कवि थे।
उन्होंने ब्राह्मणवाद, जातिवाद और बाह्यचारों पर
प्रहार किया। देहवाद का महिमा मंडन किया
और सहज साधन पर बल दिया। यह महासुख
वाद द्वारा ईश्वरत्व की प्राप्ति पर बल देते हैं।
प्रश्न 45. रासो साहित्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर - हिंदी साहित्य में रास या रासक का
अर्थ लास्य से है जो नृत्य का एक भेद है।
अतः इसी अर्थ के आधार पर गीत नृत्य परक
रचनाएँ रास के नाम से जानी जाती हैं। रासो
या राउस में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा,
छप्पर, कुंडलियां पद्धटिका आदि छंद प्रयुक्त होते
हैं इस कारण ऐसी रचनाएं रासो के नाम से
जानी जाती हैं।
रासो गानयुक्त परम्परा से विकसित होते होते
उपरूपक और उपरूपक से वीर रस से
पद्यात्मक प्रबंधों में परिवर्तित हो गया है। इस
रासो काव्य में युद्ध वर्णन से भरी हुई रचना हैं।
प्रश्न 46. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर
प्रकाश डालिए।
उत्तर - हिंदी साहित्य के इतिहास के काल
विभाजन के नामकरण को देखा जाए तो इसे
नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा आचार्य रामचंद्र
के द्वारा किये गए काल विभाजन को स्वीकार
किया गया और उन्होंने इसे चार भागों में बांटा
था। आदिकाल प्रथम भाग है तथा शेष क्रमशः
भक्तिकाल , रीतिकाल और आधुनिक काल हैं।
और इसी प्रकार के काल विभाजन को इस सभा
ने मान्य किया।
काल विभाजन के संबंध में विद्वानों के मत
जार्ज ग्रियरसन - इन्होंने ही सबसे पहले काल
विभाजन का प्रयास किया और इन्होंने आदिकाल
को चारण काल का नाम दिया और इसका
आरम्भिक समय 700 से 1300 ई. तक माना है।
मिश्रबंधुओं के अनुसार - मिश्रबंधुओं ने इस
काल को आरम्भिक काल का नाम दिया और
यह ग्रियरसन के काल विभाजन से कहीं अधिक
प्रोढ़ था। इन्होंने इसे आरम्भिक काल का नाम
दिया था। इसके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने
इसे 1920 में वीरगाथा काल का नाम दिया और
यह आज भी उपयोग में लाया जाता है।
हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर
हिन्दी साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
आदिकाल के -प्रष्न-उत्तर-भाग-एक
यूजीसी नेट/जेआरएफ एवं अन्य हिन्दी साहित्य
की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए
प्रश्न-1 -हिन्दी काव्य के इतिहास को कितने
काल-खण्डों में विभाजित किया जाता है? उनके
नाम लिखिए।
उत्तर-चार
1. आदिकाल (वीरगाथाकाल) - सन् 993 ई०
से सन् 1318 ई० तक।
2. पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल) - सन् 1318 ई०
से सन् 1643 ई० तक।
3. उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल) - सन् 1643 ई०
से सन् 1843 ई० तक।
4. आधुनिककाल (गद्यकाल) - सन् 1843 ई०
से अब तक।
प्रश्न 2-कविता के बाह्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
1. लय,
2. तुक,
3. छन्द,
4. शब्द-योजना,
5. चित्रात्मक भाषा तथा
6. अलंकार।
प्रश्न 3-कविता के आन्तरिक तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
1. अनुभूति की व्यापकता,
2. कल्पना की उड़ान,
3. रसात्मकता और सौन्दर्य बोध तथा
4. भावों का उदात्तीकरण।
प्रश्न 4-प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य में अन्तर
स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-प्रबन्ध काव्य में ऐसी धारावाहिक कथा
होती है, जिसमें किसी घटना या कार्य का
काव्यात्मक वर्णन होता है, किन्तु मुक्तक काव्य में
प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है, उनका कथा रूप में
सूत्रबद्ध होना अनिवार्य नहीं।
प्रश्न 5-हिन्दी पद्य-साहित्य के इतिहास के
विभिन्न कालों के नाम लिखिए।
उत्तर-
1. वीरगाथाकाल ( आदिकाल),
2. भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल),
3. रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) एवं
4. आधुनिककाल।
प्रश्न 6-काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर-काव्य के दो भेद होते हैं
1. श्रव्य काव्य और
2. दृश्य काव्य।
प्रश्न 7-प्रबन्ध काव्य के कितने भेद होते हैं?
उत्तर-
प्रबन्ध काव्य के दो भेद होते हैं
1. महाकाव्य और
2. खण्डकाव्य।
प्रश्न 8-महाकाव्य और खण्डकाव्य में अन्तर बताएं।
उत्तर-महाकाव्य की कथा में जीवन की सर्वांगीण झाँकी होती है, जबकि खण्डकाव्य में जीवन के एक पक्ष का चित्रण होता है। महाकाव्य की विस्तृत कथावस्तु पर अनेक खण्डकाव्य लिखे जा सकते हैं।
प्रश्न 9-दो महाकाव्यों के नाम लिखिए ।
उत्तर-दो महाकाव्यों के नाम हैं
1. श्रीरामचरितमानस और
2. कामायनी।
प्रश्न 10-दो खण्डकाव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-दो खण्डकाव्यों के नाम हैं
1. जयद्रथ-वध और
2. हल्दीघाटी।
प्रश्न 11-हिन्दी का प्रथम कवि किसे माना जाता
है?
उत्तर-कुछ विद्वान सरहपा को हिन्दी का प्रथम
कवि मानते हैं। उनका रचना-काल 769 ई० से
प्रारम्भ हुआ। जबकि कुछ विद्वान स्वयंभू को
हिन्दी को प्रथम कवि मानते हैं।
प्रश्न 12-हिन्दी-साहित्य का आदिकाल किस
साम्राज्य की समाप्ति के समय से प्रारम्भ होता
है?
उत्तर-वर्द्धन साम्राज्य की समाप्ति के समय से
हिन्दी साहित्य का आदिकाल प्रारम्भ होता है।
प्रश्न 13-हिन्दी के आदिकाल का समय निर्देश
कीजिए और हिन्दी के प्रथम कवि का नाम
बताइए।
उत्तर-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार
आदिकाल का समय 993 ई० से 1318 ई० तक
माना जाता है। सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि
माना जाता है।
प्रश्न 14. हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य किसे
कहा जाता है।
उत्तर - पृथ्वीराज रासो।
प्रश्न 15-आदिकाल (वीरगाथाकाल) की प्रमुख
विशेषताएँ बताइए।
या
आदिकालीन हिन्दी-साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों
पर प्रकाश डालिए।
या
आदिकाल (वीरगाथाकाल) की किन्हीं दो प्रमुख
काव्य-प्रवृत्तियाँ लिखिए।
या
आदिकाल के योगदान की किन्हीं दो विशेषताओं
का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-विशेषताएँ - (1) आदिकाल में अधिकांश
रासो ग्रन्थ लिखे गये; जैसे-पृथ्वीराज रासो,
परमाल रासो आदि। इनमें आश्रयदाताओं की
अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा है। (2) वीर और श्रृंगार
रस की प्रधानता है। (3) युद्धों का सुन्दर और
सजीव वर्णन किया गया है। (4) काव्यभाषा के
रूप में डिंगल और पिंगल का प्रयोग हुआ है।
(5) काव्य-शैलियों में प्रबन्ध और गीति शैलियों
का प्रयोग मिलता है। (6) सामूहिक राष्ट्रीयता
की भावना का अभाव रहा है।
प्रश्न 16-आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख
कवियों और उनकी कृतियों के नाम बताइए।
या
वीरगाथाकाल के किन्हीं दो प्रमुख काव्यों
(रचनाओं) के नाम लिखिए।
उत्तर-आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवि
और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं - चन्दबरदायी
(पृथ्वीराज रासो), नरपति-नाल्ह (बीसलदेव
रासो), दलपति विजय (खुमान रासो), जगनिक
(परमाल रासो या आल्हखण्ड), विद्यापति
(पदावली), अब्दुल रहमान (सन्देश रासक),
स्वयंभू (पउमचरिउ), धनपाल (भविसयत्तकहा),
जोइन्दु (परमात्मप्रकाश), पुष्पदन्त (उत्तरपुराण)
एवं अमीर खुसरो की फुटकर रचनाएँ।
प्रश्न 17-वीरगाथाकाल (आदिकाल) में साहित्य
रचना की प्रमुख धाराओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-इस काल की तीन प्रमुख काव्यधाराएँ
निम्नलिखित हैं
1. संस्कृत काव्यधारा,
2. प्राकृत एवं अपभ्रंश काव्यधारा तथा
3. हिन्दी काव्यधारा।
प्रश्न 18-आदिकाल के विभिन्न नाम बताइए।
या
‘वीरगाथाकाल के लिए प्रयुक्त दो अतिरिक्त नामों
का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-वीरगाथाकाल, अपभ्रंशकाल, सन्धिकाल,
आविर्भावकाल, चारणकाल, बीजवपनकाल एवं
सिद्ध-सामन्त युग आदि।
प्रश्न 19-वीरगाथाकाल के चार प्रमुख कवियों के
नाम बताइए।
या
आदिकाल के किन्हीं दो कवियों (रचनाकारों) के
नाम लिखिए।
उत्तर-चन्दबरदायी, नरपति नाल्ह, दलपति विजय
एवं जगनिक।
प्रश्न 20-आदिकाल की चार प्रमुख कृतियों के
नाम बताइए।
या
दो रासो काव्यों के नाम लिखिए।
उत्तर-पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, परमाल
रासो (आल्हखण्ड) एवं विद्यापति पदावली।
प्रश्न 21-वीरगाथाकाल में रचनाएँ
कौन-कौन-से काव्य -पदों में लिखी गयीं?
उत्तर-प्रबन्धकाव्य और वीर गीतों के रूप में।
प्रश्न 22-वीरगाथाकाल की रचनाओं में कौन-सी
भाषा प्रयुक्त हुई है?
या
रासो ग्रन्थों में किन दो भाषाओं का प्रयोग
किया गया है?
उत्तर-डिंगल और पिंगल।
प्रश्न 23. देवताओं की लिपि किसे कहा जाता
है?
उत्तर - देवनागरी लिपि।
प्रश्न 24-आदिकाल के साहित्य को कितने वर्गों
में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर-पाँच वर्गों में - (1) सिद्ध साहित्य, (2)
जैन साहित्य, (3) नाथ साहित्य, (4) रासो
साहित्य, (5) लौकिक साहित्य,
प्रश्न 25-जैन साहित्य का सबसे अधिक
लोकप्रिय रूप किन ग्रन्थों में मिलता है?
उत्तर-जैन साहित्य को सर्वाधिक लोकप्रिय रूप
‘रास ग्रन्थों में मिलता है।
प्रश्न 26-नाथ साहित्य के प्रणेता कौन थे? नाथ
साहित्य के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर-नाथ साहित्य के प्रणेता मत्स्येन्द्र नाथ थे।
इस साहित्य के दो प्रमुख कवियों के नाम हैं -
गोरखनाथ, तथा जलन्धर।।
प्रश्न 27. संसार की सबसे प्राचीन भाषा का नाम
क्या है?
उत्तर - संस्कृत।
प्रश्न 28-आदिकाल के सिद्ध साहित्य और जैन
साहित्य के एक-एक प्रमुख कवि का नाम
लिखिए।
उत्तर-सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं -
सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा आदि
जैन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-आचार्य देवसेन,
मुनिंशमलिभद्र सूरि, विजयसेन सूरि, जिनधर्म
सूरि आदि।
प्रश्न 29-गोरखनाथ के गुरु का क्या नाम था?
उत्तर-गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ
(मछन्दरनाथ) था।
प्रश्न 29. नाथ संप्रदाय का प्रवर्तक किसे माना
जाता है?
उत्तर - आदिनाथ।
प्रश्न 30. हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का
पहला सफल प्रयास किसने किया ?
उत्तर - जॉर्ज ग्रियर्सन।
Wednesday, January 26, 2022
‘दिग्दर्शक’ के दर्शन के लिए नहीं उमडे़ दर्शक
‘दिग्दर्शक’
के दर्शन के लिए नहीं उमडे़ दर्शक
यह समीक्षा मात्र इस नाटक की समीक्षा नहीं है अपितु अलवर रंगमंच की समीक्षा है। क्योंकि इस नाटक एवं इन कलाकरों के बहाने अनेक बातों पर टिप्पणी इस समीक्षा में है।
अलवर के हारूमल तोलानी ऑडिटोरियम में 21
जनवरी 2022 को दिग्दर्शक नाटक का मंचन किया गया। लगभग 50 मिनट की अवधि
का यह नाटक प्रियम जानी द्वारा लिखा गया है और प्रियंका खांडेकर ने इसे निर्देशित
किया। तीन पुरुष पात्रीय नाटक ‘दिग्दर्शक’ नाटक और फिल्म के अभिनेताओं को केंद्र
में रखते हुए, परिवार की जिम्मेदारी भी एक कलाकार के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि
उसके लिए थिएटर या फिल्म में काम करना, इस बात को केन्द्र में रखकर लिखा गया
है।
अलवर में हारूमल तोलानी ऑडिटोरियम बनना
निश्चित रूप से अलवर के लिए एक सुखद कलात्मक संदेश है और नव तथा पुरातन सभी कलाकार,
कला
प्रेमी, साहित्य जगत के लोग यहां समय अंतराल पर आ रहे हैं और इस गैर सरकारी
ऑडिटोरियम में होने वाली प्रस्तुतियों के लिए उत्साहवर्धन कर रहे हैं। सरकार जहां
पर कलात्मक रूप को बढ़ावा देने के लिए कमजोर साबित हुई है, वहीं हारूमल तोलानी
एक बेहतर विकल्प के रूप में अलवर कलाजगत के लिए साबित हो रहा है। अलवर में प्रताप
ऑडिटोरियम जैसा विषाल, भव्य और सुंदर सरकारी ऑडिटोरियम होने के बाद भी गैर सरकारी ऑडिटोरियम
हारूमल तोलानी का चुनाव क्यों? इसकी वजह है प्रताप ऑडिटोरियम की दर
बहुत महंगी है। इस कारण अलवर के कलाकार एवं अलवर में होने वाली नाट्य एवं अन्य
कलात्मक-साहित्यिक प्रस्तुतियों के लिए अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस
कारण हारूमल तोलानी एक बेहतर विकल्प है।
अब सवाल यह है कि इसमें लगातार
प्रस्तुतियां और अच्छी प्रस्तुतियां होनी चाहिएं। 21 जनवरी को होने
वाली नाट्य प्रस्तुति दिग्दर्शक आलेख के रूप में निश्चित रूप से एक बेहद ही अच्छा
नाटक कहा जा सकता है। एक बहुत ही सामान्य सी कथा के ताने-बाने को आलेख के रूप में
रचने में लेखक सफल हुए हैं। एक व्यक्ति जो नाटक का, रंगमंच का
कलाकार होता है वह फिल्मी दुनिया का बड़ा स्टार बन जाता है और बड़ा स्टार बनने के
बाद वह अपने नाट्य गुरु के पास एक बार आता है और उनसे बातचीत करते हुए पूछता है कि
आप मुझसे नाराज क्यों हैं तथा आपको सिनेमा से नफरत क्यों हैं? नाट्य
गुरु उसे पहले तो जवाब नहीं देता है। फिर वह शर्त रखता है कि मैं तुमसे नाराज नहीं
हूं लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी इस बात का जवाब तब दूंगा जब तुम मेरी बात का जवाब
दोगे कि तुम मुझे छोड़कर गए क्यों? तुम थिएटर छोड़कर फिल्मों में क्यों गए?
तो
वह कलाकार बताता है आपने एक थिएटर कलाकार की भूमिका तो बेहतर तरीके से निभाई परंतु
एक पिता की भूमिका निभाने में कहीं न कहीं आप कमजोर साबित हुए। आपके बेटे को एक
पिता के रूप में आपका प्रेम नहीं मिल सका। वह उन तमाम चीजों से वंचित रहा जिसके
कारण कि उसका भविष्य और उसका संवेदनात्मक, भावनात्मक विकास बेहतर हो सकता था। उसी
ने ही मुझे प्रेरित किया कि मेरे पिताजी के तुम बहुत ही पसंदीदा कलाकार हो। अतः
तुम उन्हें धोखा दे दो और नाटक छोड़कर फिल्मों में चले जाओ और फिल्मों में अधिक
पैसा एवं प्रतिष्ठा भी है। तुम वहां सफल भी हो सकते हो और शायद तुम्हारे कारण मुझे
मेरा पिता मिल जायेगा। यह सुनकर नाट्य गुरु को बहुत दुख होता है। वह कहता है कि
मैं तुम्हारी फिल्में देखता हूं लेकिन मैं चाहता था कि एक अच्छा होनहार थिएटर में
काम करने वाला व्यक्ति जिससे दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें, वह यदि थिएटर
में होता तो निश्चित रूप से थिएटर का, कला का और ज्यादा भविष्य संवर सकता था।
बेहतर हो सकता था। नाट्य गुरू इस बात पर दुख प्रकट करता है कि एक अच्छा पिता वह
नहीं बन सका। बाद में दोनों खुष होते हैं कि दोनों ने ही अपना कार्य किया। लेकिन
कुछ छूट भी गया।
नाटक में एक जगह कुछ संवाद हैं कि
‘थिएटर में आप इतना ऊंचा बोलो कि सभी दर्शक सुन सकें, इतना सही
उच्चारण हो कि भाषा और किरदार के साथ न्याय हो सके, इस तरह से चलो
कि वहां पर वह चाल आप की नहीं बल्कि उस किरदार की लगे, मंच पर उस समय
ऐसा व्यवहार करो कि वहां पर आपको नहीं लोग उस किरदार के रूप में आपको पहचानें।’
लेकिन जब यही सारी चीजें स्वयं कलाकार न करता हुआ दिखाई देता हो तो उस नाटक के साथ
ही अन्याय नहीं, रंगमंच के साथ, कला के साथ एवं नाटक देखने आए दर्शकों
के साथ भी अन्याय है। यह बात इस नाटक में दिखाई दी।
नाटक में दर्शकों का अभाव एक सबसे बड़ी
समस्या रही है लेकिन यह अभाव है क्यों? जो दर्शक हमारे पास आज किसी भी कारण से
आ गया है, क्या हम उसे उस 1 घंटे में ऐसा कुछ दे पाते हैं जिससे
कि वह पुनः आने के लिए प्रेरित हो, लालायित हो, बेचैन हो या
मजबूर हो? कलाकार के पास इन सवालों के जवाब यदि हैं तो शायद दर्शक नाटक देखने
आयेगा। एक नाटक अभिनेता के रूप में अक्सर ये कमियां अनेक कलाकारों के रूप में
दिखाई देती हैं। विशेष रूप से अलवर के कलाकारों के संदर्भ में बात करें तो।
लगातार नाट्य प्रस्तुतियां करना कोई
बहुत बड़ी बात नहीं है लेकिन अच्छी प्रस्तुतियां करना बड़ी बात है। हां यह जरूर है
कि लगातार प्रस्तुतियां भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कुछ लोगों को
प्रेरित करती हैं, वह भी एक प्रेरणा का संदेश है। परंतु यदि वह कमजोर रहती है तो वह
कहीं न कहीं थिएटर को, कला को, दर्शकों को भी कमजोर करती है। कलाकार की कलात्मक प्रस्तुतियां इतनी
प्रभावी होनी चाहिए कि एक बार उस कला में रुचि रखने वाला व्यक्ति देखे तो वह पुनः
देखने के लिए लालायित हो और दोबारा आपके नाम से उस कला को देखने के लिए वह आए तथा
अन्य लोगों को भी लाए। सवाल यह है कि यह कैसे हो? तो यह होगा
परिश्रम के साथ, डेडीकेशन के साथ। हमारी तकनीकी चीजें अगर किसी रूप से बहुत प्रभावी
नहीं हैं तो उनकी खामियां कहीं न कहीं नजरअंदाज की जा सकती हैं। जैसे उदाहरण के
लिए हमारे पास कॉस्टयूम प्रॉपर नहीं है, लाइट प्रॉपर नहीं है, साउंड
की व्यवस्था प्रॉपर नहीं है, स्टेज पर जो प्रॉपर्टी चाहिए वह नहीं
है या मेकअप प्रॉपर नहीं है तो ये सारी कमियां कहीं न कहीं एक दर्शक नजरअंदाज कर
सकता है। हालांकि ये सभी रंगमंच के अंग हैं और इनके बिना रंगमंच, अभिनय
अधूरा है, नाटक अधूरा है। लेकिन फिर भी मुख्य रूप से कलाकार का कार्य सबसे
प्रमुख है। यदि वह अपने अभिनय में, अपनी कला में, अपने कार्य में
कहीं पर भी कमजोर साबित होता है तो वह एक दर्शक को ज्यादा बडी कमी के रूप में
अखरता है। अतः अलवर के निर्देशकों को इस ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है। कई
बार किसी सामान्य दर्शक की या नाटक में रुचि रखने वाले दर्शक की एक सामान्य
टिप्पणी नाटक को देखने के बाद होती है कि ‘मजा नहीं आया’। तो प्रस्तुति देने वाले
कलाकारों को या नाटक से जुड़े हुए, उस प्रस्तुति से जुड़े हुए लोगों को यह
टिप्पणी थोड़ी सी अच्छी नहीं लगती है। लेकिन इस टिप्पणी का अर्थ यह जरूर है कि कहीं
न कहीं वह व्यक्ति अपनी जिन अपेक्षाओं को, अपनी जिन आकांक्षाओं को लेकर के आया था
उनकी पूर्ति नहीं हुई। क्योंकि जो प्रस्तुति आप दे रहे हैं उसके साथ उसका जुड़ाव उस
रूप में नहीं हो पाया जिस रूप में आप करना चाहते थे। क्योंकि यदि आप उस रूप में एक
दर्शक का जुड़ाव करते तो शायद उसके मुंह से यह टिप्पणी नहीं निकलती और वह आपकी कला
के प्रति, नाटक के प्रति चाहे बहुत प्रफुल्लित नहीं होता लेकिन प्रेरित होता और
उसके मन में जिज्ञासा और अपेक्षाएं जन्म लेती कि शायद एक अलग तरह का कलात्मक अनुभव
रहा यह। जिसको जीने का, समझने का, देखने का, करने का भी अपना एक अलहदा आनंद है और वह उसे बार-बार देखने के लिए
प्रेरित होता और अन्य लोगों को प्रेरित भी करता। (इसमें हम उन दर्षकों को नहीं गिन
रहे हैं जो 12 साल से छोटे हैं या जिन्होंने नाटक के बारे कुछ भी न सुना, पढा
हो।) अलवर के नाट्य निर्देशकों को, अलवर के कलाकारों को, अलवर
के कला और साहित्य प्रेमियों को इस ओर ध्यान देने की शायद कुछ अधिक आवश्यकता है।
कुणाल सिंह, निखिल कुमार,
योगेन्द्र
चौहान के द्वारा यह नाटक अभिनीत किया गया। कुणाल सिंह की बात करें तो एक समर्पित
कलाकार तो कुणाल सिंह हैं, लेकिन अच्छे अभिनेता के रूप में अभी
कुणाल सिंह की प्रस्तुति आनी शेष है। इन तीनों कलाकारों में कुणाल सिंह ही सबसे
अनुभवी कलाकार हैं। फिर भी कुणाल सिंह की प्रस्तुति काफी कमजोर रही। हालांकि पूर्व
की तुलना में कुणाल में सुधार है लेकिन कुणाल से और अपेक्षाएं थीं और हैं। मंच पर
नाटक में अभिनय के रूप में निखिल कुमार और योगेन्द्र चौहान दोनों ही कलाकारों का
यह पहला प्रयास था। एक नाटक में अभिनय करने के रूप में देखा जाए तो पहले प्रयास
में ये काफी सफल रहे। इन बच्चों ने काफी मेहनत की। इनके निर्देशक ने इनसे काफी
मेहनत करवाई होगी या जिससे भी इन्होंने प्रेरणात्मक रूप से इन किरदारों के लिए जो
काम किया वह सराहनीय कहा जा सकता है। यूं हर काम में हमेशा कोई न कोई गुंजाइश रहती
है। संपूर्ण अपने आप में कोई नहीं होता। लेकिन फिर भी प्रेरणा देने का काम,
प्रभाव
डालने का काम इन्होंने किया। निखिल कुमार और योगेन्द्र चौहान नवोदित कलाकार होने
के बावजूद भी इनका प्रयास एक सराहनीय और बढ़ते कदम की ओर कहा जा सकता है। कुणाल को
जहां तक मैं जानता हूं उसका तीसरा या चौथा नाटक है यह और पिछले कई वर्षों से
लगातार वह नाटक कर रहे हैं। वह बात अलग है कुछ परिस्थितियों के कारण उन्होंने बीच
में नाटक छोड़ दिया था। एक दूरी बना ली थी और कुछ व्यक्तिगत कारणों से, समस्याओं
से जूझ रहे थे और उन समस्याओं से निकल करके नाटक करना भी अपने आप में एक बड़ा काम
है लेकिन जब आप मंच पर होते हो, तो एक दर्शक चाहे वह नवीन हो या पुराना,
वह
आपको उस पात्र के रूप में देखता है, आपसे जुड़ी हुई समस्याओं के रूप में
आपको नहीं देखता है। और वही दर्शक आपको उस मंच पर प्रस्तुति के लिए प्रेरित करने
वाले निर्देशक को या मंच पीछे काम करने वाले अन्य लोगों को भी उसी रूप में देखता
है। उसमें कहीं पर भी कमी नजर आती है तो व्यक्तिगत रूप से आपकी, आपके
निर्देशक की, नाट्य टीम की वह सबसे पहली कमी है। ये बातें सिर्फ इस प्रस्तुति पर
या इस प्रस्तुति से जुडे कलाकारों पर ही लागु नहीं होती है अपितु अन्य
प्रस्तुतियों और कलाकारों पर भी लागु होती हैं।
हालांकि हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं
होती हैं। वह एक अलग बात है लेकिन जो लगभग चार-पांच वर्षों से या इससे अधिक नाटक
से जुड़े हुए हैं। नाटक के अनेक पक्षों पर काम कर चुके हैं, वे जब बार-बार
गलतियां करते हों तो शायद उन्हें वे गलतियां गलतियां न लगती होंगी या वे उन
गलतियों में या ऐसा करने के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें यही सबसे उच्चतम
और बेहतर श्रेणी लगती हो। या फिर यह कह सकते हैं कि उनका एक तरह से कंफर्ट जोन बन
जाता है यह, और इस कंफर्ट जोन में रहने के कारण उन्हें यह लगता है कि अच्छा कर
रहे हैं, बेहतर कर रहे हैं। लेकिन एक दर्शक को वह कमी खलती है। उससे बाहर
निकलने की आवश्यकता है।
आज की तारीख में सोशल मीडिया, यूटयूब
का तेज गति से चलने वाला जमाना है। यदि इंटरेस्ट नहीं आता है तो व्यक्ति तुरंत
चैनल बदल देता है या उसे फॉरवर्ड कर देता है। सड़क पर तमाशा दिखाने वाले मदारी की
अभिव्यक्ति में, उसके प्रस्तुतीकरण में यदि उतनी चुंबकीय क्षमता नहीं होगी जैसे कि वह
चलते हुए व्यक्ति को न रोक सके तो उसकी कला को कोई नहीं देखेगा। यह भी सत्य बात है
कि हजारों लोग चलते हैं लेकिन मुश्किल से 50 लोग उसकी कला
को देखने के लिए रुकते हैं। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हम हर व्यक्ति को एक
दर्शक के रूप में पाएं। या हर व्यक्ति को नाटक देखने या दिखाने के लिए मजबूर करें।
या जो दर्शक हमारे पास आ गया है, उससे अपेक्षा रखें कि वह सारी चीजों को
उसी रूप में समझेगा जिस रूप में हम बताना चाहते हैं। क्योंकि हमारे पास जो दर्शक
आया है वह अलग-अलग उम्र का, अलग-अलग क्षेत्र का, अलग-अलग
वर्ग का है। लेकिन इतना हम ध्यान रखें हमारे पास जो दर्शक आ गया है, उसके
कॉन्शियस या सबकॉन्शियस में यह बात अवश्य जानी चाहिए की नाट्य कला अन्य कलाओं से
कैसे पृथक है, उसका जो आनंद है वह कहीं अन्य नहीं है। वह आनंद मनोरंजनात्मक रूप से,
संदेशात्मक
रूप से या कलात्मक रूप से उस तक पहुंचना चाहिए। उसका उससे जुड़ाव होना चाहिए। चाहे
आंशिक रूप से ही सही। यह जुड़ाव जब उस दर्शक के साथ होने लग जाएगा तो पूर्णतः नहीं
लेकिन कहीं न कहीं यह दर्शक एक नाटक का दर्शक, आपका दर्शक बन
जाएगा और अन्य दर्शकों को शायद प्रेरित भी करने लगेगा नाटक देखने के लिए।
तकनीकी निर्देशन किया अलवर के वरिष्ठ
कलाकार अविनाश सिंह ने। तकनीकी पक्ष से इस नाटक में दो या तीन फैड आउट पर्याप्त
थे। क्योंकि नाटक की कथा में दो या तीन मोड़ थोड़े से अलग हैं जो कहानी को बदलते
हैं। लेकिन उसके बावजूद भी जो प्रकाश व्यवस्था थी, जिसमें फैड आउट
था वह बहुत बार अनावश्यक थी। कहीं न कहीं वह प्रस्तुति को अप्रभावित करती रही।
दूसरी बात प्रकाश व्यवस्था का संचालन और कलाकारों का मंच पर आना-जाना इसमें भी
तालमेल की कमी दिखाई दी। फैड आउट या किसी दृश्य का समापन या प्रकाष व्यवस्था उस
प्रस्तुति में जीवंतता लाते हैं। नए दृश्य के साथ जोड़ने की उत्सुकता पैदा करते
हैं। कहानी में आगे क्या घटित होगा इसके लिए दर्शक को उत्साहित करते हैं, प्रेरित
करते हैं, जानने के लिए। लेकिन वही फैड आउट यदि आपको बात करने के लिए, आपको
इरिटेट करने के लिए कहानी के जुड़ाव में बाधा उत्पन्न करने के लिए बाधक के रुप में
दिखाई दे तो कहीं न कहीं अनावश्यक है।
नाटक या कोई भी कला एक दिन में प्रमुख
या बेहतर या प्रखरता नहीं ला सकती। प्रतिदिन सीखने की कला है यह। उसे दिन प्रतिदिन
सीखते जाते हैं तो उसमें धीरे-धीरे सुधार होता जाता है और यह अपेक्षा भी नहीं है
कि एक ही दिन में सब कुछ बेहतर हो जाए लेकिन अनेक सालों से काम करने के बाद भी बार
बार उन्हीं कमियों की पुनरावृति दिखाई दे तो सवाल उठता है। इस प्रस्तुति में कुछ
कमियां नजर आईं और इस प्रस्तुति के माध्यम से कुछ अन्य कमियां जो व्यक्तिगत रूप से
मुझे अनुभव हुई और अन्य लोगों से बात करने के बाद जो उनको भी कमियां लगीं उनको
मैंने समीक्षात्मक रूप से यहां प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह समीक्षा थोड़ी सी
कड़वी हो सकती है लेकिन इसका जो भाव है वह कहीं पर भी कड़वाहट पैदा नहीं करेगा,
ऐसी
मुझे आशा है। लगभग 6 माह बाद अलवर में प्रस्तुति देखने का एक अवसर मिला तो उससे भी मुझे
थोड़ी आशा ज्यादा हो गई थी कि अच्छी और बेहतर प्रस्तुतियां होंगी। फिर भी ‘दिग्दर्शन’
नाटक की पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई।
प्रस्तुति-प्रदीप प्रसन्न
ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर, तहसील-किशनगढ
बास, जिला-अलवर, राजस्थान पिन-301405, मोबाईल-9460142690,
8619238014, मेल- pradeepbas@gmail.com


