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Wednesday, May 17, 2017

Try to fill empty vacuum : खाली वैक्यूम को भरने की कोशिश

खाली वैक्यूम को भरने की कोशिश
रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के द्वारा तीन दिवसीय ग्रीष्म नाट्य उत्सव’ 12 से 14 मई 2017 महावर ऑडिटोरियम अलवर में आयोजित किया गया। इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव में चार नाटक मंचित किए गए। इस नाट्य उत्सव में सबसे ज्यादा कमी खली दर्शकों की।


बहुत पहले मैंने एक जगह पढ़ा था कि नाटक करने वाले एवं उसको पसंद करने वाले हमेशा ही संख्यात्मक दृष्टि से बहुत ही कम लोग रहे हैं। यह संख्या लगभग हर काल में ऐसी ही रही है। पूर्व की तुलना में अब जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। उसके अनुपात में भी कला के प्रेमी उतने नहीं बढ़ रहे, जितने बढ़ने चाहिए। फिर भी वे बिल्कुल नहीं है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन जितने हैं वे अलग-अलग वर्गों में बंटे हुए हैं। कोई भी कला प्रस्तुत करना या उससे जुड़ना, प्रारंभिक रूप में उसके प्रति जुनून, लगाव, प्रेम या समाज में परिवर्तन लाना आदि हो सकता है लेकिन धीरे-धीरे बाद में वह व्यवसायिक, पैसे कमाना, प्रसिद्धि प्राप्त करना या किसी माध्यम से कोई सरकारी या गैर सरकारी संस्था विभाग से योजनाएं ले करके अपने काम को आगे बढ़ाना आदि हो जाता है या हो सकता है। कला के संवर्धन में सरकारें अक्सर उदासीन रही हैं। किन्तु यह भी नहीं कहा जा सकता कि सरकारें कला को प्रोत्साहन नहीं दे रही हैं। हां यह बात अलग है कि अनेक तरह की कलाओं को पोषित करने वाली छोटी छोटी संस्थाओं को बंद कर दिया गया है या उनको मिलने वाली परियोजना, वित्त विभाग से लाभ, बजट इत्यादि की कटौती कर दी गई है। बहुत पूर्व से ही इसी तरह की स्थिति या मानसिकता सरकारों की देखी जा सकती है। फिर भी कला को करने वाले, उसको पसंद करने वाले लोग उसका निर्वहन कर रहे हैं और सरकार से या अन्य जगह से सहयोग लेकर इन कलाओं को साध रहे हैं। क्योंकि जीवन यापन करने के लिए पैसों की बहुत आवश्यकता होती है, जरूरी भी है। अतः किसी न किसी माध्यम से व्यक्ति उनका अर्जन करेगा। अपने परिवार का पालन पोषण करेगा। बहुत सारे लोग अपने परिवार का पालन करने के लिए अनेक माध्यम से पैसे कमाते हैं और उन माध्यमों के अंदर भी वे अनेक प्रकार के झूठ, प्रपंच, बेईमानी, घोटाले, भ्रष्टाचार इत्यादि का उपयोग करते हैं तो यह गलत होता है। क्योंकि किसी भी प्रकार का व्यवसाय लगभग-लगभग बुरा नहीं है। समाज की बहू आयामिता के आधार पर उस की आवश्यकता है। परंतु उस व्यवसाय कि यह मानसिकता बन जाए कि सिर्फ मेरे लाभ के लिए किसी की भी हानि हो, तो इस तरह का व्यवसाय गलत है। इस तरह की व्यवसायीकरण की सोच, असंगत, अनैतिक आदि का प्रतिरोध करने के लिए कलाएं, साहित्यिक विधाएं एवं अनेक गतिविधियां एक प्रमुख प्रतिपक्ष की भूमिका निभाती हैं। उनका प्रतिपक्ष या प्रतिरोध किसी भी प्रकार से उनकी व्यक्तिगत रुप से अहित की कामना नहीं है। बल्कि जो उन की कार्यशैली या पद्धति है उस में बदलाव हो और अधिक से अधिक समाज को लाभ मिले ऐसा दृष्टिकोण होता है या होना चाहिए। इसी तरह से ही नाटक, संगीत, साहित्यिक, सांस्कृतिक या अन्य कला की विधाओं से जुड़े हुए लोग अपनी इन कलात्मक गतिविधियों का संवर्धन करने के लिए किसी न किसी प्रकार का सरकारी या गैर सरकारी सहयोग लेते हैं।


यह तो अमुमन देखा ही गया है कि कला को करने वाले लोग, प्रारंभ में कभी भी धनाढ्य वर्ग से नहीं रहे। हां वह बात अलहदा है कि उसको करते करते वे लोग प्रसिद्ध हो गए और पैसे वाले हो गए। किंतु मूलतः प्रारंभ में उनका ध्येय यह नहीं होता है। अर्थात कलाकार के पास अभाव की जिंदगी हो और वह फिर भी कला का संवर्धन या उससे प्रेम करता रहे तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि जिस तरह से एक अध्यापक अपनी अध्येतावृति से वेतन पाता है और साथ ही वह शिक्षा देकर समाज में एक बेहतर और सामाजिक कार्य भी करता है। ठीक उसी प्रकार से कलाकार भी अपनी कला की प्रस्तुति अपने शौक के लिए या समाज में परिवर्तन के लिए, असंगत के विरुद्ध बोलने के लिए करता है। किंतु वह यह भी अपेक्षा रखता है या रखनी चाहिए कि या तो इस कला के माध्यम से या किसी दूसरे माध्यम से जुड़कर वह अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए जीविकापार्जन करे। जिससे की उसका जीवन भी चल सके। अर्थात कहीं न कहीं से उसे वेतन मिलता रहे।


अलवर में अनेक समस्याएं हैं, जो साहित्यिक एवं कलात्मक गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं और सीधे-सीधे नाटक से जुड़ी हुई हैं। यहां सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी हुई अनेक संस्थाएं हैं, कलाकार भी हैं, दर्शक भी हैं। लेकिन जैसा की अनेक जगहों पर होता है कि संस्थाएं एवं कलाकार एक दूसरे से वैचारिक रूप से या व्यक्तिगत रुप से मतभेद या मनभेद रखती हैं। इसके बजाय इनके मध्य एक सुखद प्रतिस्पर्धा हो तो वह इन कलात्मक गतिविधियों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। परंतु यदि एक व्यक्ति या संस्था दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को विशिष्ट बनाने की कोशिश करे तो वहां अनेक तरह की दिक्कतें आती हैं। जहां तक मुझे लगता है ऐसी स्थिति किसी को ही ऊपर नहीं बढ़ने देती है। रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित ग्रीष्म नाट्य उत्सव में प्रस्तुत नाटकों एवं कलाकारों की समीक्षात्मक रुप से खूबियों एवं खामियों को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। किन्तु मूलतः यहां नाटक/रंगमंच के संवर्धन की बात है तो उसमें अलवर के रंगकर्मी, कला प्रेमी, साहित्यकार आदि की भूमिका प्रमुख होगी न कि आम दर्शक की। क्योंकि ग्रीष्म नाट्य उत्सव में इन सबकी उदासीनता कहीं न कहीं खली। जबकि ऐसी स्थिति में अलवर में एक सरकारी भव्य प्रेक्षागृह प्रताप ऑडिटोरियम निर्मित हो चुका है, परंतु वह बहुत अधिक दाम पर उपलब्ध होता है। अतः उसके लिए सिर्फ बातों से ही संघर्षरत दिखाई देने वाले अलवर के रंगकर्मी यह अपेक्षा करें कि वह उन्हें कम से कम दर में इसी तरह से उपलब्ध हो जायेगा, यह एक तरह से थियेटर या कला के प्रति बेईमानी लगती है। दूसरी बात, यदि खुदा न खासता प्रताप ऑडिटोरियम कम से कम दर पर या निःशुल्क उपलब्ध हो भी जाए, तो कम से कम लगभग पिछले दो वर्ष के कार्यक्रमों के प्रति अलवर के रंगकर्मियों या कला, साहित्यिक संस्थाओं की स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ संस्थाएं और कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो लगभग लगभग नाटक प्रस्तुति का हाल वैसा ही रहेगा जो अभी है। अर्थात प्रताप ऑडिटोरियम मिलने के बाद नाट्य प्रस्तुतियों में बढ़ोतरी हो जायेगी ऐसा अभी तो प्रतीत नहीं हो रहा। क्योंकि आमजन तो नाटक का दर्शक तक बनेगा जब उसके सामने नाट्य प्रस्तुतियों का सिलसिला लगातार चलेगा। सिनेमा या अन्य गतिविधियों की तुलना में उसके सामने नाटक एक बड़े विकल्प के रूप में होगा, तब वह उसे चुनेगा या उससे जुड़ेगा। क्योंकि आम दर्शक इसकी गहराई से वाकिफ नहीं है। मैं यहां निराशा की बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन जो यथार्थ स्थिति है, जो खाली वैक्यूम दिखाई दे रहा है, उसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह कड़वा भी हो सकता है और अनेक लोगों के लिए कष्टदाई भी, परंतु इस नासूर को निकाले बिना ही मर्ज ठीक होगी, ऐसी आशा और अपेक्षा करना संभवतः हम जिस काम को करने जा रहे हैं या कर रहे हैं उसके प्रति ही नहीं एक व्यक्ति के रुप में भी हमें बेईमानी महसूस होगी। यहां आम दर्शक की कला के प्रति जो रुचि या समर्पण की संख्या होती है, वह आनुपातिक रुप से लगभग कम है किंतु सवाल तो उन पर उठता है जो इस माध्यम से जुड़े हुए हैं, जो अपने आप को कला के प्रेमी, थियेटरिस्ट, नाटक करने वाले, रंगकर्मी, साहित्यकार, लेखक या कवि कहते हैं। वरिष्ठ ही नहीं बल्कि अब तो कनिष्ठ रंगकर्मी भी यह अपेक्षा करने लग गया है कि जब तक उसके पास व्यक्तिगत रुप से कोई बुलावा, संदेश, फोन, निमंत्रण पत्र इत्यादि नहीं आयेगा, वह नाटक देखने के लिए नहीं आयेगा। वह यह भी अपेक्षा करता है कि मैं तो रंगकर्मी हूं, साहित्यकार हूं इसलिए मुझे तो नाटक निःशुल्क देखने का अधिकार है और जो लोग नाटक प्रस्तुत कर रहे उन्हें दिखाना भी चाहिए।


पहली बात तो यह कि जिस तरह की उदासीनता या नकारात्मक दृष्टिकोण या नजरिया नाटक या कला के प्रति परिवारों का, समाज का, सरकारों का होता है वह नजरिया कम से कम उन लोगों का नहीं होना चाहिए जो इस माध्यम में किसी भी रुप से जुड़े हुए हैं। दूसरी बात जिस तरह से दूसरी गतिविधियां के लिए हम लोग पैसा खर्च करते हैं, समय पर जाते हैं, इसी तरह से नाटक के लिए भी हमें थोड़ा पैसा खर्च करना पड़ेगा और वह इसलिए कि यदि हम चाहते हैं कि नाटक से कुछ पैसा अर्जन हो, जिससे कि कलाकार भी एक ठीक-ठाक सा जीवन यापन कर सके, उसे वहां से पैसा मिल सके तो हमें स्वयं भी उसके लिए पहल करनी होगी। आम दर्शक की बात अलग है परंतु रंगकर्मी का, कला प्रेमी का कितना सहयोग और समर्पण है नाटक/रंगकर्म के संवर्धन में या कलाकारों की प्रगति में यह महत्वपूर्ण सवाल है। जो संस्थाएं अलवर में मॉडर्न थियेटर करती हैं वे अधिकतर निःशुल्क करती हैं या फिर करती ही नहीं हैं। अतः इस रिवाज को भी बदलना होगा। इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि हमेशा ही आप टिकिट से करें। लेकिन इस परंपरा को बदलना होगा ताकि थियेटर और थियेटर कलाकार को सम्मान मिल सके। कुछ स्थितियां इस तरह की भी हैं कि लोग अपेक्षा करते हैं कि हम अगर नाटक देखेंगे तो विशिष्ट व्यक्ति का देखेंगे, जो हमारे परिचित हैं। जिनसे वैचारिक और मत या मन भेद हमारे नहीं हैं। यह कोई बाधा नहीं है कि प्रतिदिन प्रत्येक प्रस्तुति में हर रंगकर्मी उपस्थित हो किंतु अपेक्षा तो की जा सकती है अधिक से अधिक उसकी उपस्थिति हो। यदि कोई दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य न आए तो। क्योंकि कुछ महत्त्वपूर्ण काम आने पर हम नाटक ही नहीं दूसरी भी गतिविधियों को छोड़ देते हैं। अतः किसी विशिष्ट महत्त्वपूर्ण कार्य की वजह से न आना कोई नाटक के प्रति प्रेम कम होना नहीं है। लेकिन आना भी नहीं और उसके बाद टीका टिप्पणी करना या फिर इसलिए नहीं आना कि हमें निमंत्रित पत्र नहीं दिया, हमारे पास पासनहीं पहुंचा, हमें फोन करके कहा नहीं गया या फिर हम तो बहुत ही वरिष्ठ और विशिष्ट हैं, अतः हमें जब तक विशिष्ट सम्मान नहीं दिया जाएगा तब तक हम नाटक देखने नहीं जायेंगे। इस तरह की सोच को रखना यह असंगत है। यह नाटक के प्रति प्रेम नहीं है। इस तरह की सोच को बदलना होगा। क्योंकि नाटक किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है और न ही हो सकता है। उसमें सहभागिता-सामाजिकता जरूरी है। अतः सबका योगदान चाहिए। आर्थिक सहयोग भी नाटक के लिए अपेक्षित है। नाटक बिना किसी सहयोग के नहीं हो सकता। अर्थात सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं से या व्यक्तियों से इसके लिए अपेक्षित सहयोग लिया जाता है। सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं से वित्तीय सहयोग तब तक लेने में कोई दिक्कत नहीं है जब तक कि वे हमारे सिद्धांत और हमारी कला में किसी प्रकार की विशिष्ट बाधा उत्पन्न न करें। लोगों को यह सोचना चाहिए कि यदि हम किसी कारणवस उस व्यक्ति की प्रस्तुति में शामिल नहीं हो सकते तो कोई बात नहीं, किन्तु कम से कम उसके संवर्धन में उसके विकास में बाधा तो उत्पन्न न करें। किसी का किसी भी कारण से किसी से भी मतभेद हो सकता है, लेकिन यह ध्यान रखें कि आप और वह एक ही माध्यम से जुड़े हुए हैं। इसलिए उसके विकास एवं संवर्धन के लिए तो हमें सकारात्मक होना चाहिए। उसमें आप नकारात्मक भूमिका तो कम से कम न ही निभाएं। यदि कोई नकारात्मक भूमिका निभाता है तो वह उस कला का संवर्धन नहीं करना चाहते हैं बल्कि उस की आड़ में व्यक्तिगत रुप से प्रसिद्धि या प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं।


इस तरह के अनेक सवाल ग्रीष्म नाट्य उत्सव के दौरान महसूस किए गए। ये सवाल कोई बाहर से पैदा नहीं हुए या कोई विदेश से नहीं आए, किसी दूसरे व्यक्ति ने धकेले नहीं हैं, ये हमने पैदा किये हैं। अतः इनका उत्तर और समाधान भी हमें खोजना होगा और जहां तक मैं समझता हूं इसका उत्तर और समाधान हम न जानते हों ऐसा नहीं है बल्कि जानबूझ कर हम उसे अनुत्तरित ही रहने देना चाहते हैं। क्योंकि पैसे, प्रसिद्धि, और प्रतिष्ठा की भूख ने जिस तरीके से अन्य लोगों को अंधा कर दिया उसी भीड़ में हम भी शामिल हो गए हैं। संभवतः इसीलिए हमने वही चश्मे लगा लिए हैं जिनकी दृष्टि से दूसरे लोग इस पूरे भौतिक संसार की सुख सुविधाओं को अपनाने और पाने की दृष्टि से देखते हैं। हम भी उसी तरह की आशाएं अपने मन में पाले हुए हैं और ऊपर से साहित्यकार, कलाकार, रंगकर्मी का मुखौटा पहन रखा है। यह मुखौटा नाटक के समय किसी विशेष प्रकार के किरदार को अभिनीत करने के लिए पहना जाता है तो निश्चित रुप से सार्थक है किंतु यदि व्यक्ति हमेशा स्वयं को छिपाकर अन्यत्र बनने की कोशिश करता है तो वह न कलाकार रहता है और न ही आम व्यक्ति।


रंग संस्कार थिएटर ग्रुप अपने आप में अकेली ऐसी संस्था है जो गत दो वर्षों से अलवर में निरंतर नाटक कर रही है। इस संस्था को संचालित करने वाले देशराज मीणा अकेले इस मुहिम में लगे हुए दिखाई देते हैं। कुछ दो चार लोग उनके विशिष्ट हैं जो उनका उत्सव या कार्यक्रम के समय सहयोग करते हैं। यह उन व्यक्तियों का देशराज के प्रति या उससे भी पहले मूलतः नाटक के प्रति विशिष्ट लगाव हो सकता है। कोई भी व्यक्ति जब प्रस्तुति देता है तो उसका श्रेय उसे तो मिलता ही है, लेकिन साथ ही हमें यह भी सोचने की आवश्यकता है कि हम जिस विधा से जुड़े हुए हैं, उसका संवर्धन यदि होता है तो किसी न किसी रूप में उसका श्रेय हमें भी मिलता है। अतः उस श्रेय को महसूस करते हुए अलवर में सक्रिय, साझा, सकारात्मक, सहयोगात्मक रंगकर्म सक्रिय हो, लगातार हो, उसकी प्रस्तुतियां हों और अलवर में ही नहीं बल्कि दूर दराज अनेक शहरों में भी अलवर की प्रस्तुतियों को सराहा जाये, इस तरह की शुरुआत की अपेक्षा जब तक हम लोग अपने सहयोगात्मक दृष्टिकोण से नहीं दिखाएंगे तब तक अलवर में नाटक/रंगकर्म का विकास संभव नहीं है। रंग संस्कार थियेटर ग्रुप अनेक आलोचना, नाउम्मीदों, नकारात्मक दृष्टिकोणों के बावजूद भी लगातार मंच पर सक्रिय है, यह बहुत बड़ी बात है। उसके पास कोई खजाना नहीं है लेकिन माद्दा, जुनून और हिम्मत है। इसलिए इसी वर्ष अगले माह 17-18 जून को फिर से एक नाट्य उत्सव करने जा रहा है। एक नई उम्मीद, आशा एवं सोच के साथ सभी लोग उत्साहित होकर सहयोग देंगे और अपने अपने स्तर पर भी कम से कम दो महा में एक नाटक प्रस्तुत करेंगे ऐसी आशा के साथ जय अलवर रंगकर्म।

प्रस्तुति-
डॉ. प्रदीप कुमार
ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर,
तहसील-किशनगढ़-बास, जिला-अलवर,
राजस्थान, पिन न. 301405, मोबाईल नं.-9460142690,
esy&pradeepbas@gmail.com CykWx&http://pradeepprasann.blogspot.in/2017/03/blog-post.html


Friday, May 5, 2017

Kabir's harshness is hidden in the sweetness : कबीर की कर्कशता में छुपी है मधुरता


‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे’ रमेश खत्री जी का यह पहला प्रकाशित नाटक है। इस नाटक का ताना बाना उन्होंने कबीर को केंद्र में रखते हुए बुना है। रमेश खत्री अपनी बात में कहते हैं कि ‘इस नाटक में कबीर के जीवन के अनेक स्तरों को पकड़ने की कोशिश की गई है।’ कबीर को लेकर विद्वानों में बहुत मतभेद हैं, उनके जन्म, जाति, धर्म, जन्म स्थान, रचना प्रक्रिया आदि को ले करके। यह बात सिर्फ कबीर पर ही लागू नहीं होती है। भारतीय दृष्टिकोण से अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी इन सभी ऊपर लिखित स्थितियों के बारे में प्रमाणिक, स्पष्ट और एक राय विद्वानों की नहीं है। इसके अनेक कारण हैं। जिनकी तह में जाना यहां विषयांतर होगा। किंतु यह बात सही है कि कबीर अपने समय के समाज सहित संस्कृति और परंपरा को जितना क्रांतिकारी रुप से कचोटते हैं उतना दूसरा रचनाकार नहीं। कबीर की भाषा और स्वभाव कई जगह पर अख्खड़ दिखाई देते हैं। ऐसा अक्खड़ रचनाकार उस समय में कोई और नहीं दिखाई देता। उसका एक बड़ा कारण यह है कि तात्कालिक समय की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक रुढ़िवादी परंपराओं पर चोट करने की सबसे ज्यादा हिमाकत जिस स्वभाव के अंतर्गत हो सकती है वह कबीर में दिखाई देती है। कबीर के दोहे, समाज सेवा तथा उनके जीवन के अनेक महत्त्वपूर्ण पक्षों को उठाते हुए रमेश खत्री बताते हैं कि कैसे कबीर, कबीर बनते हैं। वे एक सामाजिक फरिश्ता बनते हैं। एक साहित्यिक चेतना का व्यक्ति कवि से पहले कैसे समाज सुधारक बनता है। 
कबीर पर लिखना चुनौति है और नाटक लिखना और भी चुनौति है। इस चुनौति को स्वीकार किया रमेश खत्री ने। इस नाटक की भूमिका लिखी वरिष्ठ रंगकर्मी रणवीर सिंह जी ने। उन्होंने भूमिका में एक जगह लिखा-‘‘कबीर की जिंदगी पर नाटक लिखने के लिए हिम्मत चाहिए।’’ मुझे लगता है इसके पीछे यह मानसिकता रही होगी कि मूलतः नाटक का काम असंगत के प्रति प्रतिरोध पैदा करना है और हिन्दुस्तानी नाट्य परंपरा में यह प्रतिरोध का स्वर इसके जन्म से ही दिखाई देता है। रुढ़िवादी परंपराओं, आडंबरों तथा समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के प्रति आक्रोशमयी प्रतिरोधी आवाज जितना मुखर होके कबीर उठाते हैं वह अन्य के यहां नहीं दिखाई देती। इसीलिए कबीर की साखियां आज की परिस्थितियों में भी बहुत ज्यादा प्रासांगिक नजर आती हैं। किंतु कबीर का प्रासांगिक होना है, कबीर की महानता या उनके साहित्य की विशेषता है, ऐसा मैं नहीं मानता। कबीर प्रासांगिक इसलिए हैं कि हमारे विकास की चाल धीमी है। राजनीतिक षड्यंत्र, सामाजिक परिस्थितियां और धार्मिक घटाटोपांे के अंतरजाल में फंसा हुआ भारतीय समाज आज भी उन्हीं दायरो में कैद है, जिनके लिए कबीर अपने समय में लड़ रहे थे। यदि आज भी वही परिस्थिति या क्रूरता विद्यमान है तो यह कबीर की प्रासांगिकता या बुद्ध के लेखन की महानता नहीं बल्कि हमारे विकास के पैमाने पर एक जोरदार चांटा है। इस तरह के विषय के ऊपर लिखना और वह भी नाटक लिखना वास्तव में एक चुनौती और हिम्मत का काम है। 
‘मोको कहां ढूंढे रे बंदे’ को रमेश खत्री जी ने दस अंकों में विभाजित किया है। रमेश खत्री जी इस नाटक में अनेक जगह पर बहुत जल्दी में दिखाई देते हैं। जैसे इस नाटक में कबीर के पूरे जीवन दृश्य को दिखाना चाहते हैं। जिसके कारण दृश्य की अधिकता, पात्रों की अधिकता एवं इस तरह की स्थिति या घटनाएं पैदा हो गईं जो संभवतः मंचीय दृष्टिकोण से इस नाटक को खेलने में बाधा पैदा करती हैं। दूसरी बात अनेक जगह पर कथानक, संवाद एवं भाषा स्थिल हो गई है। तीसरी बात ‘मोको कहां ढूंढे़ रे बंदे’ नाटक में कबीर का चरित्र एक सशक्त पुंज की बजाए अनेक टुकड़ों में बिखरा हुआ नजर आता है, जिसके कारण कबीर का सूत्र जहां भी पाठक के साथ जुड़ने लगता है वह कुछ ही देर में बिखर जाता है। क्योंकि भाषा एवं संवाद इतने ताकतवर नहीं हैं कि वह बहुत देर तक दर्शक या पाठक को जोड़े रखंे। नाटक में छोटे-छोटे दृश्य एवं वर्तनी की अशुद्धि भी अनेक जगह पर खलती है। ये तमाम स्थितियां यह संकेत देती हैं कि रमेश खत्री जी बहुत जल्दबाजी में दिखाई देते हैं। वे बहुत कुछ इसी नाटक में कहना चाहते हैं। कबीर को संपूर्ण प्रस्तुत करने का लोभ, उनको अधिक लाभ नहीं देता।
‘मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे’ नाटक में कबीर के सामाजिक सरोकारों को एवं उनके द्वारा समाज के लिए किए जाने वाले भले कार्यों को रेखांकित किया गया है। जहां पर भी कबीर बेबसी, गरीबी, लाचारी, मासूमियत और भूख से व्याकुल बच्चे एवं परिवारों को देखते हैं तो उनका सहयोग करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। ‘‘न जाने कितने दिनों के भूखे थे बेचारे। किसी को भी इन बच्चों पर थोड़ी भी दया नहीं आई अम्मा। इनकी अम्मा तो भूख से ही मर गई......... बेचारी। नीमा-(व्यंग्य करते हुए) तेरे होते हुए किसी और को जरूरत भी क्या थी? तू है तो सही सभी पर दया करने वाला......... एक अकेला शहर भर में.............।’’ यह कबीर के कार्यों का वह लेखा जोखा है जो निस्संदेह कबीर को कवि से पहले एक समाज सेवी बनाता है। इसीलिए कबीर समाज से वर्ग, वर्ण को समाप्त करके मनुष्य और सिर्फ मनुष्य बने रहने की वकालत करते हैं। कबीर व्यक्तिगत नहीं सामाजिक हित के लिए किए जाने वाले कार्यों को प्रमुखता देते हैं और इसी कारण कबीर असंगति के विरुद्ध तत्काल कदम ही नहीं उठाते बल्कि उसके समाधान के लिए तत्पर हो जाते हैं। इसलिए रमेश खत्री कहते हैं-‘‘बस एक ही रास्ता है। ऐसी बानी बोलो जो सबकी समझ में आए........और ऐसे काम करो जो अधिक से अधिक लोगों की भलाई का हो......... जिससे सभी का हित हो........... सामुहिक हित।’’ सामान्यतः इस सामुहिक हित की वकालत आम जन नहीं करता, जो कि उनकी बड़ी पूंजी है। इस पूंजी को सहेज कर रखने के लिए एवं उसको ताकत के रूप में बचाए-बनाए रखने के लिए कबीर बार-बार इस सामाजिकता पर बल देते हैं। 
आज के समय में पर्यावरण का बहुत महत्त्व है। रमेश खत्री कबीर के माध्यम से धरती, वृक्ष और पर्यावरण के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं-‘‘यह पेड़ भी तो धरती मां का सिंगार ही है ना माई। इनकी हरियाली हमारा और पशु पक्षियों का जीवन है माई।’’ इनको बचाना और लगाना हम सब की जिम्मेदारी है। इस नाटक के शीर्षक के अनुरूप रमेश खत्री ‘मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे’ मैं तो तेरे पास में, हर जगह पर, हर दृष्टिकोण से अनेक स्थितियों पर, पक्षों और पहलुओं को रेखांकित करते हैं। उन पर अपनी पैनी दृष्टि से कबीर के चित्र को प्रस्तुत करते हैं। इसलिए पूरे नाटक में कबीर एक रंग में नहीं बल्कि विविध रंगों में रंगे हुए नजर आते हैं। यही कारण है कि कबीर किसी वर्ग, वर्ण, जाति या धर्म के कटघरे मंे खड़े नहीं होते बल्कि वे सभी के लिए समान हैं। नाटक में एक बुढ़िया कहती है-‘‘सच कहती हूं बेटा। तू न तो हिंदू है और न ही मुसलमान बल्कि इन दोनों से ऊपर तू एक इंसान है। एक ऐसा इंसान जो सबका ख्याल रखता है। सब से प्यार करता है। सबके भले की सोचता है हमेशा। बस इसलिए ही तू सच्चा इंसान है रे बेटा। यही सब जात पात से ऊपर है, इंसानियत ही आदमी को भगवान बनाती है, जाति पाती तो उसे हैवान बनाती है।’’ कबीर के व्यक्तित्व एवं चरित्र के माध्यम से रमेश खत्री जी समाज को एक पुंज में बने रहने की प्रेरणा देते हैं। क्योंकि कबीर का पूरा व्यक्तित्व ही इसी तरह का है। वह किसी खाके में बैठकर किसी एक का नहीं सब का होना चाहते हैं और सब का मनुष्य रूपी भगवान ही हो सकता है। स्वयं भगवान नहीं, क्योंकि भगवान को तो धर्म के आधार पर लोगों ने बांट दिया है। इसलिए जो सबका हो जाए वही विशिष्ट हो जाता है। वह कहीं पर भी दुख, संताप, पीड़ा, असामाजिक आडंबर, भेदभाव आदि देखता है तो दूसरे का दुख दर्द उसे अपना दुख दर्द लगता है। इसलिए कबीर कहते हैं-‘‘एक बेसहारा विधवा भिखारन और उसके साथ भूख से बिलबिलाते बच्चों की पीड़ा मुझसे देखी नहीं गई लोई..............। पैसे तो मेरे पास थे नहीं.........तो मैं भी क्या करता...........अब तुम ही बताओ..........तो मैंने अपनी चादर ही उस बनिए को दे दी और उनको आटा, दाल, चावल दिलवा दिये....।’’ यह व्यक्तित्व का वह पक्ष है जो सबके लिए सहज और समान है। किंतु रमेश खत्री कबीर के इसी व्यक्तित्व को इसलिए विशिष्ट और महत्त्व देते हैं क्योंकि असहज और सामान्य पक्ष गायब होता जा रहा है।
अनेक असामाजिक तत्व कबीर के द्वारा किये जाने वाले सामाजिक कार्याें का विरोध करते हैं। कबीर को एवं उनके द्वारा किये जाने वाले अच्छे कार्यों को तोड़ने के लिए समाज तथा व्यक्ति को वर्ग एवं वर्ण में बांटते हैं। परवेज, समसुल, बशीर और रघुनाथ इसी तरह के चरित्र हैं, जो हर दौर के कबीर के सामने खलनायक के रुप में प्रस्तुत होते हैं। रमेश खत्री इन खल चरित्रों पर कबीर के माध्यम से सीधा वार नहीं करवाते हैं बल्कि ये लोग जिस आम जन को तोड़ने का प्रयास करते हैं, उन्हीं के माध्यम से इनके परिवर्तन की वकालत करते हैं। इस तरीके में एक बेहतर समाधान है। क्योंकि जिस चेतना को जगाने का काम साहित्य करता है उसी चेतना की पक्षधरता रमेश खत्री करते हैं। जिसकी आवश्यकता आज के दौर में और भी अधिक है। कबीर के संदेशों का यही प्रभाव है। धर्मदास कहते हैं-‘‘ठीक है बाबा..........जैसा आप कह रहे हो हम करते हैं। चलो भाईयों, लग जाओ गरीबों की जान बचाने में, इससे बड़ा पुण्य तुम्हें कहीं भी नहीं मिलेगा।’’ धर्म ग्रंथों में दी गई पाप और पुण्य की परिभाषा को ठेंगा दिखाता हुआ यह संवाद निस्संदेह बहुत कम और छोटे शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने का प्रयास करता है। रमेश खत्री पूरे नाटक में बिखराव के रूप में ही सही किंतु अनेक जगह पर ऐसी सुक्तियां कहते हैं जो पाठक को विचार करने के लिए मजबूर करती हैं। यह इस नाटक की एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
नाटक के लिए कहानी चुनते वक्त यह जरूरी है कि उसका कथानक प्रभावी हो। कथानक को प्रभावी बनाने के लिए नायक और खलनायक की परिकल्पना की जाती है। ये चरित्र ही अपने विचारों से समाज को प्रेरणादाई बनाते हैं। इसीलिए रमेश खत्री कबीर के सामने प्रतिद्वंदी के रूप में इस तरह का समाज खड़ा करते हैं, जिसमें परवेज, समसुल, बशीर और रघुनाथ जैसे लोग दिखाई देते हैं। इस तरह के तथाकथित समाज के ठेकेदार जब समाज को बांटते हैं तो हर युग का कबीर अपने अंतर्मन से बडे़ खिन्न स्वर में यही बात कहता है-‘‘रैदास कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे यहां पर भी जाति.........धर्म, संप्रदाय और भाषा के नाम पर इस तरह से दीवारें खड़ी हो जायेंगी। इंसान और इंसान के बीच इतनी दूरी पैदा हो जायेगी। वह एक दूसरे से इतना दूर चला जायेगा..........कभी सोचा भी नहीं था। मैं तो यह सोच कर भी अचंभित हूं कि इंसान इस तरह से एक दूसरे का दुश्मन बन जायेगा। वह अपने ही भाईयों के साथ ऐसी घिनौनी हरकत करने लगेगा। मुझे तो यह भी अंदेशा है कि एक दिन ये लोग एक दूसरे का खून भी बहाने न लग जायें।’’ कबीर के चरित्र को घड़ने में रमेश खत्री जिस आशंका को याद करते हैं निस्संदेह वह चिंताजनक है और अनेक जगह पर अपनी सीमा लांघ भी चुकी है। अनेक वर्गों और कटघरों में बंटा हुआ इंसान इस आधुनिक और औपचारिक उपभोक्तावादी युग में जितना अपना सोच रहा है उतना दूसरे का नहीं। इसलिए बड़े ही आवेश और क्रोध के साथ रमेश खत्री कबीर से कहलाते हैं-‘‘तो फिर और क्या बांटना बाकी रह गया है राजा साहब............जो आप लोग आपस में मिलकर नहीं रह सकते........? आप लोगों ने जातियां बांटी, धर्म बांटे, जबानें बांटी..........यहां तक कि परमात्मा तक को बांट लिया आप लोगों ने........... अब तो बस इंसान को ही बांटना बाकी रह गया है तो उसे भी बांट लीजिए........ निकालिए अपनी-अपनी तलवारें और कर दीजिए हमारे दो टुकड़े। एक टुकड़ा मुसलमान कबीरदास हो जाएगा और दूसरा हिंदू कबीरदास.......... फिर चाहे तो जलाईये या फिर दफन कीजिए और तब सारी दुनिया जान जायेगी और देख लेगी कि जाति, धर्म, भाषा और यहां तक कि बड़े-बड़े दुश्मनों से भी हार न मानने वाला ये कबीरदास............हारा है तो सिर्फ अपने ही लोगों से.........सिर्फ अपने ही लोगों से.........हारा है।’’ ये सिर्फ कबीरदास के नहीं अपने युग के उस सच्चे आम व्यक्ति के शब्द हैं जो राजनीतिक शक्तियों के बीच में पिस कर हमेशा अपनों से ही परास्त हुआ है और उसकी पराजय किसी की जीत का सिरमौर नहीं बनी बल्कि सभी के लिए पराजय ही रही है। यह बात अलग है कि कुछ लोग उसे क्षणिक आनंद और जीत मानते हैं।
सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि अनेक पक्षों पर कबीर के चरित्र एवं जीवन के माध्यम से कटाक्ष करने वाला तथा सोचने के लिए मजबूर करने वाला यह नाटक ‘मोको कहां ढूंढे़ रे बंदे’ आज के युग की अनेक स्थितियों में प्रासांगिक नजर आता है। यह प्रासंगिकता निस्संदेह कबीर के विचारों के साथ-साथ उनके पद और दोहांे की भी है। जैसा की पूर्व में कहा गया है कि यह नाटक रंगमंचीय दृष्टिकोण से कुछ जगह पर बाधा उत्पन्न कर सकता है। परंतु इसे ठीक से थोड़ा संपादित करके और उचित निर्देशक के हाथों में जाकर एक अच्छी प्रस्तुति और अच्छे नाटक के रूप में खेला जा सकता है। आशा है कि यह खेला जाएगा। जिस तरह के सवाल ‘मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे’ के माध्यम से रमेश खत्री उठाते हैं वे इसी जमीन से खड़े हुए हैं, कोई आकाश से नहीं उतरे हैं। इसलिए उनका हल भी यहीं खोजना होगा, यहीं तलाश करना होगा, अन्यत्र जाकर नहीं। क्योंकि कबीरदास जी कहते हैं ‘मोको कहां ढूंढे़ रे बंदे’ मैं तो तेरे पास में, ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलाश में, खोजी हो तो तुरंत ही मिलिए पल भर की तलाश में।’ 

प्रस्तुति-
प्रदीप कुमार
ग्राम/पोस्ट-बास कृपाल नगर, 
तहसील-किशनगढ़-बास, जिला-अलवर,
राजस्थान, पिन न. 301405, मोबाईल नं.-9460142690, मेल-pradeepbas@gmail.com CykWx&http://pradeepprasann.blogspot.in/2017/03/blog-post.html

Friday, March 31, 2017

stores proformans are Memorial Made Theater Day : कहानियों की प्रस्तुतियों ने यादगार बनाया रंगमंच दिवस

कहानियों की प्रस्तुतियों ने यादगार बनाया रंगमंच दिवस

27 मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस। यह रंगकर्मियों के लिए ऐसा पर्व है, जिसे मंच पर अभिनीत एवं प्रस्तुत की जाने वाली अनेक विधाओं के माध्यम से रंगकर्मी एक विशिष्ट जश्न के रूप में पूरे विश्व में मनाते हैं। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में एवं अनेक विद्वानों ने भी नाटक को अनेक कलाओं का कुंभ कहा है। इसलिए नाटक अपने में अनेक कलाएं समाहित रखता है। अपनी संप्रेषणीयता के कारण एवं अन्य विधाओं की तुलना में नाटक अधिक प्रभावी होता है। अतः नाटक जब रंगमंच पर प्रस्तुत होता है तब विभिन्न कलाओं को अपने में समाहित रखता है। ऐसा ही एक प्रयोगात्मक कार्यक्रम कहानी रंगोत्सवके रूप में महावर ऑडिटोरियम, अलवर में विश्व रंगमंच दिवस के उपलक्ष पर आयोजित किया गया। कहानी रंगोत्सव कार्यक्रमके अंतर्गत छह कहानियां मंचित की गईं। पहली कहानी थी रवि बुले द्वारा लिखित हीरो: एक लव स्टोरी। इसे दलीप बैरागी ने प्रस्तुत किया था। हीरो: एक लव स्टोरीप्रेम कहानी है। एक ऐसी प्रेम कहानी जिसमें किस्सागोई के साथ साथ नाटकीयता की अनेक संभावनाएं उसके संवादों के मध्य छुपी हुई नजर आती है। कहानी के पाठ के साथ-साथ उसके प्रस्तुतीकरण में भी वह नाटकीयता नजर आती है। यह कहानी किशोरावस्था में होने वाले अनेक मानसिक एवं शारीरिक बदलावों के कारण मन पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाती है। जिसकी वजह से कहानी का नायक अनेक तरह के द्वंद्व तथा दुविधाओं से होकर गुजरता है। रवि बुल्ले का कहानी कहने का अंदाज ऐसा लगता है कि जैसे वह कहानी नहीं कह रहे हैं, बल्कि उसे प्रस्तुत कर रहे हैं। मंच पर दलीप बैरागी के अभिनय एवं उसके प्रस्तुतीकरण के अंदाज ने हीरो: एक लव स्टोरीको जीवंत कहानी बना दिया। प्रारंभ में यह कहानी त्रिकोणिए प्रेम कथाओं की तरह लगती है। कहानी का नायक अथवा लेखक स्वयं इस बात को महसूस करता है कि वह इस कहानी का हीरो है, लेकिन उसे कहानी के मध्य में ज्ञात होता है कि वह कहानी का हीरो नहीं सहनायक है। दलीप बैरागी अपनी अभिनय क्षमता के आधार पर कहानी को एक विशिष्ट आकार देते हैं। दलीप बैरागी अलवर के उत्साही युवा रंगकर्मी हैं। लेकिन अनेक वर्षों के अंतराल के बाद वे मंच पर दिखाई दिए हैं। संभवतः वे आगामी वर्षों में इस अंतराल की क्षति पूर्ति अपनी निरंतर एवं सार्थक प्रस्तुतियों के माध्यम से पूरी करेंगे, ऐसी आशा। कहानी में दुष्यंत कुमार की गजलों का प्रयोग एवं संगीत का प्रभाव भी दिलीप बैरागी को सहयोग प्रदान करता है। 
दूसरी कहानी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध कहानी भोलाराम का जीवमंचित की गई। इसे अपने सशक्त अभिनय से अंकुश शर्मा, क्रिश सारेश्वर, मदन मोहन एवं चित्रा सिंह ने सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया। भोलाराम का जीवसरकारी दफ्तरों के बाबुओं के काम के प्रति लापरवाही, छोटे छोटे काम के लिए रिश्वत लेना इस तरह के  भ्रष्टाचार को व्यक्त करती है। भोलाराम का जीवराजनीतिक एवं प्रशासनिक असंगतियों पर करारा व्यंग्य करती हुई मंच पर पात्रों की अदाकारी के कारण दर्शकों पर अपना पूरा प्रभाव डालती है। भोलाराम का जीव में मदन मोहन नारायण के रूप में गीत प्रस्तुत करते हैं और हारमोनियम बजाते हुए आते हैं और गीत भी बिल्कुल मॉडर्न स्टाइल में जस्ट जस्ट नारायणगाते हुए लोगों को प्रभावित करते थे। आज के आधुनिक रंगों का प्रभाव इस प्रस्तुति में देखा जा सकता है। अंकुश शर्मा इसके अंदर अपने निर्देशकीय के बल से अनेक संदर्भों को कल्पना के माध्यम से कुछ परिवर्तित करके उसके प्रस्तुतीकरण के पक्ष को प्रभावी बनाते हैं तथा दर्शक तुरंत जुडे़ इसके लिए उसमें आधुनिक टूल्स का प्रयोग भी वे करते हैं। जैसे यमराज और चित्रगुप्त के मध्य होने वाले आपसी संवादों मंे अंग्रेजी शब्दावली का प्रयोग, नारद का रेप स्टाइल में गीत गाते आना, बड़े बाबु का भोलपुरी पुट में बोलना इस तरह के प्रभाव तथा प्रयोग निश्चित रुप से नवीनीकरण तो लाते ही हैं साथ ही दर्शकों को आज की स्थिति से तुरंत जोड़ते भी हैं।
तीसरी कहानी नीलाभ पंडित जी द्वारा प्रस्तुत उन्मादीथी। यह कहानी फ्रेंच लेखक गाई द मोपासांकी लिखी हुई है। राजेन्द्र भट्ट ने इसका अनुवाद किया है। हिंसा के मनोविज्ञान की पड़ताल करने वाली उन्मादीएक गंभीर कहानी है। मनुष्य के अंदर हिंसा की मनोवृत्ति सदैव से विद्यमान रही है। कभी इस मनोवृत्ति के लिए नरबलि दी जाती थी, अब हम अपनी हिंसा की भूख को युद्ध से पूरा करते हैं। एक न्यायाधीश जिसने बहुत से लोगों को मृत्यु दंड दिया है, वह स्वयं हिंसा के मनोभावों से अपने को रोक नहीं पाता और एक हत्यारा बन जाता है। नीलाभ पंडित इस कहानी का वाचन अपनी चिरपरिचित बेस वाली आवाज में करते हैं तो कहानी एक नया रूप धारण करती है। निश्चित रुप से उनकी अपनी एक सैली का प्रभाव तो है ही जो उसके कथानक के पठन में दिखाई देता है। लेकिन वाचन के दम पर निलाभ पंडित इस कहानी को दर्शकों से बहुत देर तक नहीं जोड़ पाते हैं। इसका कारण यह भी था कि यह कहानी जिस जमीन की है, उससे भारतीय दर्शक सीधे सीधे नहीं जुड़ पाता है। दूसरा कारण-निलाभ पंडित जी इसका सिर्फ वाचन करते हैं, जो निसंदेह एक निरसता लाता है। 
चौथी कहानी गुलजार की लिखी हुई रावी पारथी। इस कहानी को अंकुश शर्मा, क्रिश सारेश्वर, मदन मोहन एवं चित्रा सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया। गुलजार की कहानी रावी पारभारत पाक विभाजन से हिंदुस्तान आए हुए मुहाजिरों के प्रमुख केंद्रों को ध्यान में रखते हुए उनके दर्द को गठित किया गया है। आजादी के समय हुए बंटवारे का दर्द और अपना सब कुछ खो देने की पीड़ा जिस तरह से दर्शन सिंह वहन करते हैं, वह मात्र उन्हीं की पीड़ा नहीं है बल्कि उस समय के अनेक लोगों की है। दर्शन सिंह पाकिस्तान को छोड़कर हिंदुस्तान में रहने आते हैं, तो वहां अपना सब कुछ छोड़ आते हैं। यहां तक की एक बच्चा भी। जिन बड़े बुजुर्गों ने इतना दर्द सह कर अपनी मेहनत के बल पर जो कुछ भी संजोया था, वह सब कुछ वहीं छूट जाता है। अपनी मातृभूमि-जन्म भूमि को भुलाना इतना आसान भी नहीं है। गुलजार निश्चित रुप से इस कहानी के माध्यम से संवदेना के भावों को बेहतरीन तरीके से प्र्रस्तुत करते हैं। उतने ही बेहतरीन अंदाज में मंच पर बंटवारे की त्रासदी, पारिवारिक पीड़ा, सब कुछ छूटने का दुख इन सबको कलाकार अपनी अभिनय क्षमता के बल पर प्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रस्तुत करते हैं। बंटवारे के दर्द को एक परिवार कैसे झेलता है, वही मुख्य रुप से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है। सबसे प्रमुख बात यह रही इस प्रस्तुति की कि क्रिश सारेश्वर ने दर्शन सिंह की भूमिका को मंच पर जीवंत रूप दे दिया। क्रिश सारेश्वर के पास संवाद नहीं थे लेकिन उसके भाव एक पल के लिए भी संवाद हीन नहीं हुए। वह अपने अभिनय से वह सब कुछ कह गया जो कि बोलने के बाद भी अंकुश शर्मा और मदन मोहन नहीं कह पाए। अभिनय की क्षमता बिना संवादों के किस तरह से आदमी को सम्मोहित करती है और उसका साधारणीकरण होता है इस बात को क्रिश सारेश्वर का अभिनय दर्शकों को महसूस करता है। यह सब स्वयं दर्शकों ने एवं उनकी आंखों से निकले आंसुओं ने बंया किया। अंकुश शर्मा एवं क्रिश सारेश्वर इससे पूर्व में अलवर में चार पांच प्रस्तुतियां दे चुके हैं। इसलिए वे अलवर के लिए अनजान नहीं हैं। अपनी कुशल निर्देशकीय परिकल्पना के माध्यम से अंकुश शर्मा इस प्रस्तुति को बेहतर बनाते हैं। मदन मोहन एक अच्छे कलाकार के साथ साथ एक अच्छे संगीतकार भी हैं। वे अपनी गायकी के बल पर भी इस प्रस्तुति को प्रभावी बनाते हैं। चित्रा सिंह की उपस्थिति प्रस्तुति को संबंल प्रदान करती है। 
पांचवी कहानी थी डॉ. प्रदीप कुमार की उसके इंतजार मेंउसके इंतजार मेंकहने को एक युवक की प्रेम कहानी है, लेकिन यह उस अकेले युवक की कहानी नहीं है, बल्कि अनेक लोगों की कहानी है। बस फर्क इतना है, उस युवक ने यह कहानी लिख दी है या कह दी है, बाकि कह नहीं पा रहे हैं। इसीलिए इसमें एक पूरा जीवन नजर आता है। उम्र का वह दौर जो सबसे ऊर्जावान होता है-युवावस्था। उसका अपना प्रभाव एवं उस प्रभाव से प्रभावित परिवेश। एक कवि हृदय, युवक जो प्रेम करता है, अपनी प्रेमिका से, अपने देश से, अपनी भाषा से, अपने हुनर से, अपने शोक से। लेकिन यह समाज उसे ऐसा करने से रोकता है, टोकता है। फिर भी वह नाउम्मीद नहीं है। समाज बदलेगा, उसका परिवार उसे समझेगा, बस आयेगी, उसकी कविताओं को एक पहचान मिलेगी, उसके काम को नाम मिलेगा, उसकी प्रेमिका उसे समझेगी, इसलिए आज भी वह बैठा है-उसके इंतजार मेंउसके इंतजार मेंकहानी में प्रदीप कुमार अपने मुक्तक एवं कविता के माध्यम से दर्शकों को काव्यात्मक रसानंद के साथ भी जोड़ते हैं। आज की अनेक समस्याओं पर बहुत ही गहरा कटाक्ष प्रदीप कुमार अपनी प्रस्तुती में इस अंदाज में करते हैं कि दर्शक मजबूर हो जाते हैं ताली बजाने के लिए।
छठी और अंतिम कहानी टिकटों का संग्रहदिनकर शर्मा ने प्रस्तुत की। दिनकर शर्मा झारखंड के रहने वाले हैं। एकल प्रस्तुतियां में आजकल पूरे देश में उनका एक बड़ा नाम है। पश्चिम बंगाल में उन्होंने अपनी अनेक एकल प्रस्तुतियां दी हैं। प्रेमचन्द्र की कहानी बड़े भाई साहबके तो वे लगभग 500 से अधिक शौ कर चुके हैं। टिकटों का संग्रहकारेल चापेक की कहानी है, जिसे निर्मल वर्मा ने अनुदित किया है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे बचपन में टिकट संग्रह करने का शोक रहा है। बचपन में एक ऐसी घटना घटती है जिससे उसका जीवन बदल जाता है। साठ साल की उम्र में उसके जीवन में फिर एक घटना घटती है लेकिन इस बार की घटना उसे गिरजाघर में वह सब करने के लिए बाध्य कर देती है जो वह नहीं करना चाहता है। साठ साल की उम्र में वह व्यक्ति अपने वर्तमान के साथ चर्च पहुंचता है और अपने जीवन के अनेक संस्मरण उसमें किशोरावस्था और युवावस्था के प्रस्तुत करता है। दिनकर शर्मा जी का जीवंत अभिनय इस प्रस्तुति को एक बेहतरीन बनाता है। निसंदेह एक संवेदनशील तथा गंभीर कहानी को दर्शकों से कैसे जोड़ा जाए यह दिनकर शर्मा अपने अभिनय के बल पर महसूस कराते हैं।
‘‘कहानी रंगोत्सव’’ कार्यक्रम को सूत्रबद्ध किया रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के निदेशक देशराज मीणा ने। देशराज मीणा बहुत ही जुनूनी रंगकर्मी हैं। वे अपने ग्रेजुएशन के दिनों से ही रंगकर्म में अपने विशिष्ट कार्य के माध्यम से अलवर में एक मुहीम चलाकर काम करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन बीच में कुछ अंतराल आने की वजह से थोड़ा विराम हो गया था, लेकिन 2015 से वे पुनः अलवर रंगमंच में सक्रिय हैं और उसके बाद लगातार प्रस्तुतियां दे रहे हैं। 2015 के बाद से लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह से अलवर में रंगकर्म उसी स्थिति में पहुंचे जो 1990 के आसपास हुआ करता था या देश के अनेक कोनों में आज भी होता है। उस कोशिश के लिए वे अनेक प्रकार की जद्दोजहद करते रहते हैं। उनके साथ अमित गोयल का जुड़ाव भी उनको बहुत उर्जा देता है। उनकी कलात्मक एवं सहयोगात्मक रूचि इस तरह के कार्यक्रमों को संबंल प्रदान करती है। देशराज मीणा जिस तरह से अलवर में लगातार रंगमंच को सक्रिय रखने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, संभवतः वह दिन दूर नहीं जब अलवर में सार्थक एवं निरंतर रंगकर्म होने लगे। इसके लिए प्रेक्षाग्रह वगैरा की समस्याओं के लिए भी अलवर रंगकर्मियों को एकजुट होकर मुहिम चलानी होगी। 27 मार्च 2017 का दिन विश्व रंगमंच दिवस के रूप में अलवर के लिए एक विशेष दिन रहा। इस अवसर पर अलवर जिले के अनेक वरिष्ठ रंगकर्मियों का सम्मान भी किया गया। जिन लोगों ने रंगकर्म के क्षेत्र में अपना विशिष्ट योगदान दिया है, उन्हें इस दिन सम्मान पत्र, सॉल एवं प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। जैसे-जिसमें गिरीराज जैमिनी, भगवत शर्मा, शशीभूषण जैन, अशोक राही, डॉ. वीरेन्द्र विद्रोही, राजेश शर्मा, महावीर सिंघल, जगदीश शर्मा, दौलत भारती, उमेशकांत वशिष्ठ, देवेन्द्र तिवारी, दलीप वैरागी, डॉ. प्रदीप कुमार, राजेन्द्र भारद्वाज, सतीश शर्मा, रमेश अग्रवाल, प्रकाश शर्मा, रामवतार पंडित, संदीप शर्मा आदि। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजर्षि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय, अलवर के कुलपति प्रो. भारतसिंह जी थे। इस अवसर पर अलवर के अनेक रंगकर्मी, कला प्रेमी, साहित्यकार एवं सुधी स्रोता उपस्थिति रहे जैसे-हरिशंकर गोयल, डॉ. जीवन सिंह मानवी, डॉ. विनय मिश्र, डॉ. छंगाराम मीणा, रेवती रमण शर्मा आदि। कार्यक्रम का संचालन प्रदीप कुमार, दलीप वैरागी एवं देशराज मीणा ने किया।



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Monday, January 23, 2017

Some muktak : कुछ मुक्तक


1 मेरे दिल का यह सपना है कि सपना टूट न जाए।
किसी थोड़ी सी अनबन से कोई रिश्ता छूट न जाए।
सभी को अपना बनाने की कभी हसरत नहीं मेरी।
मेरी कोशिश है कि कोई अपना अपने से रूठ न जाए।

2 दिल से निकली है दिल के लिए दुआ।
अभी तक तू किसी का क्यों न हुआ।
कब तक रहेगा मौन यूं अकेले तू,
किसी वीणा की तार सा झंकृत क्यों न हुआ।

3 नव कोपल नव दीप जले हैं नव लय के नव छंदों में।
नए राग के नए तराने बजने लगे अब अनुबंधों में।
हृदय हमारा वरण हो गया नव पल्लव की ज्योति में,
सप्तपदी से पहले ही हम बंध गए वचनों के प्रतिबंधों में।

4 नव वर्ष पर तुम्हारा आगत कर रहा हूँ।
मैं दिल का थाल सजा कर नवागत कर रहा हूँ।
तुम प्रीत के आचमन से करलो वरण हमारा।
हृदय की कुटी में तुम्हारा स्वागत कर रहा हूँ।

5 हमारा दिल भी तुम्हारी यादों में बेचैन रहता है।
न सोता है न जगता है तड़फता दिन रैन रहता है।
इस कड़वाहट के दौर में कौन किसकी सुनता है।
फिर भी तुम चले आए सुनने कोई तो मीठे बैन कहता है।

6 श्वेत धरा पर हरीतिमा की एक अनौखी चादर देखी।
तुम पर मर मिटने को आतुर लाखों आंखें आतुर देखी।
हम शर्मिंदा क्यों हैं जिंदा ऐसे ऐसे नायक देखे।
हल का हलईया मरता देखा भाषण देती खद्दर देखी।

7 वह एक रितु मन भावन थी, अब लगते सारे मौसम फीके।
वह मधु की मधुर अंजूरी थी अब लगते सौ सौ घट भी रीते।
सारे जग को अपना कहना भी लगता जब बेईमानी है,
सब कुछ जीत कर हार गए जब लगा की एक हृदय न जीते।

8 न चांद मिला न चांदनी हम तो लुट गए तारों की तलाश में।
एक भी नहीं खोज पाए वो जो निकले थे सारों की तलाश में।
वो खोजते हैं दुश्मनों को हर गली-मौहल्ले-घाटी-बस्ती में।
हम तो हमेशा, हर जगह, हर देश में रहे यारों की तलाश में।

Friday, July 5, 2013

Incarnation of Krishna - humorous satire : कृष्ण का अवतार -- हास्य व्यंग

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प्रदीप प्रसन्न 

Emergency satire - Humor satire article : आपातकाल व्यंग्य का --हास्य व्यंग्य लेख

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